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गंगा की अविरलता में बाधाएं

नदियां हमारी सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक हैं। इनके सम्मान के दिखावे के लिए हम नदियों किनारे आरती और उत्सवों का आयोजन करते हैं अपनी सेहत के लिए....
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Sep 27, 2018
Ganga
Ganga

नदियां हमारी सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक हैं। इनके सम्मान के दिखावे के लिए हम नदियों किनारे आरती और उत्सवों का आयोजन करते हैं अपनी सेहत के लिए तो अच्छे से अच्छे चिकित्सक की तलाश करते हैं लेकिन यह नहीं जानते कि नदियों की सेहत हमारी सेहत से जुड़ीं है। आज तो सबसे प्रदूषित नदी वाला शहर ही विकसित शहर कहलाता है। इसलिए निर्मलता के काम विकास के काम माने जाते हैं। अविरलता को विकास का पर्यायवाची नहीं माना जाता। इसलिए दिल्ली, कोलकाता व कानपुर जैसे प्रदूषित नदियों वाले शहर विकसित कहलाते हैं।

गंगा की अविरलता को हमारे समाज और सरकार ने विकास विरोधी मान लिया है। इसलिए हमारे सबसे बड़े नेता अब कहते हैं कि हमें विकास करना है। गंगा को निर्मल बनाना है। निर्मलता, अविरलता के बिना सम्भव नहीं है। अविरलता ही निर्मलता को बनाती और टिकाती है। फिर भी हम इसे भूल गये हैं। सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रीय हरित न्याय प्राधिकरण तथा भारत सरकार सभी एकमत होकर गंगा को पर्यावरणीय प्रवाह द्वारा अविरलता देने को सहमत हैं। दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में 18 सितम्बर को हुए 'गंगा सम्मेलन' में केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी गंगा को पर्यावरणीय प्रवाह देने के लिए 15 दिनों में रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है।

गंगा में अविरलता का अर्थ है कि गंगा में बिना किसी अवरोध के जलधारा प्रवाहित होती रहे। पर्यावरणीय प्रवाह नष्ट होने से नदियां मर जाती हैं। जब नदियां रास्ता बदलती हैं तो सभ्यताएं भी नष्ट हो जाती हैं। आज अविरलता की बाधाएं इसलिए हैं क्योंकि हमें अपनी संस्कृति और सभ्यता की चिंता नहीं केवल विकास की चिंता है। विकास, गंगा की अविरलता में बड़ा बाधक है। विकास की लालसा इसकी प्राचीन अविरलता को पुन: नहीं पाने देगी।

गंगा पर बांध बनाने वाली कम्पनियां हमें बिजली और अनाज का लालच देती हैं। यह तो हम गंगा की अविरलता से ही प्राप्त कर सकते हैं। नदी का अज्ञान हमें आज हमारी मां गंगा से ही अलग कर रहा है। गंगा को कहते मां हैं और इससे ही कमाई करते हैं। अविरलता की सबसे बड़ी बाधा ही इन बड़ी कंपनियों की कमाई है। अविरलता से इनकी कमाई पर रोक लग जाती है।

नए बांध बनने रुक जाते हैं। पावर कम्पनियां गंगा की अविरलता में दूसरी सबसे बड़ी बाधा है। गंगा की समग्रता को समझने में सबसे बड़ी अड़चन यह है कि हम गंगा को केवल जल प्रवाह मान बैठे हैं। गंगा केवल विशिष्ट गुणों वाले जल का प्रवाह ही नहीं बल्कि हमारे धार्मिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक व वैज्ञानिक सभ्यता का आधार है। लेकिन हम इन सबको भूलते जा रहे हैं। इसलिए अब कुम्भ हमारे लिए स्नान मात्र का अवसर इस मान्यता के कारण रह गया कि कुंभ स्नान करने से हमारे पाप धुल जाते हैं।

लेकिन हमारी यह समझ पूरी नहीं है। हम गंगा के प्रति केवल आरती और उत्सव करते हैं। चूंकि हमारा व्यवहार मां के आध्यात्मिक और वैज्ञानिक संबंधों को भूल गया है। इसलिए हम गंगा मां की अविरलता के अनुकूलन की दिशा में आगे नहीं बढ़ पा रहे। गंगा देश के लिए 'लिटमस पेपर' की तरह है। यही हमारे स्थायी और सनातन विकास का आधार हैं। अगर हमारी नदियां गंगा की तरह मरणासन्न हालत में हैं तो इसका अर्थ ये है कि हम विकास की लालच में अंधे हो गए हैं।

हमें अब गंगा की अविरलता समझ में नहीं आ रही। यदि हमने गंगा के विनाश की असली वजह को गंगा घाटी में प्राकृतिक संपदा का विनाश, मिट्टी का कटाव, और उस पर अतिक्रमण और भू-जल का अतिशोषण होने दिया तो फिर अविरलता की बात कैसे करेंगे? यह अतिक्रमण, प्रदूषण और गंगा के जल प्रवाह क्षेत्रों का शोषण हमारा गंगा के साथ अनुकूलन नहीं बल्कि जलवायु परिवर्तन का नकारात्मक कारण बन रहा है। इस कारण को बदलना है तो गंगा घाटी में प्राकृतिक खेती, प्रदूषण मुक्त उद्योग और गंगा के सतत प्रवाह को सम्मान देने की जरूरत है।

आज विकास के नाम पर गंगा नदी में हर जगह बन रहे बांध विनाश कर रहे हैं। खनन और जंगलों के कटान से गंगा क्षेत्र में जो जलवायु परिवर्तन हुआ उससे केदारनाथ में वर्ष 2013 में हुई अतिवृष्टि और सूखा दोनों हालात बन रहे हैं। इसकी वजह से कभी नदी प्रवाह कभी सूख जाता है तो कभी बाढ़ ये महाप्रलय कर देता है।

चार धाम सड़क योजना से गंगा में आने वाली मिट्टी, गिट्टी, पत्थर भी गंगा की अविरलता में बाधक है। बड़ी कंपनियां गंगा पर प्रदूषण मुक्त बिजली बनाने का स्वप्न दिखाती हैं। कभी गंगा के जल से सिंचाई का रास्ता। ये कभी भी मानवीय उपयोग किए हुए जल से खेती, बागवानी और अन्य उपयोग के रास्ते नहीं बताते। इसीलिए पवित्र गंगाजल हम गन्ने जैसी फसल में उपयोग करते है। जबकि यह तीसरी श्रेणी के जल में उगाया जा सकता है।

इस बाधा को न राज समझता है और न ही समाज। गंगा की अविरलता की बाधाएं दिन पर दिन बढ़ती जा रही हैं। इन बाधाओं को तोडऩा है तो हमें गंगा और भारत की छोटी-बड़ी नदियों को समझना और सहेजना होगा। नदियों को दूषित करने वालों के खिलाफ सत्याग्रह करना होगा। जल शोधन कर अपने जीवन को चलाना जब हम सीख जाएंगे तब ही गंगा की अविरलता की दिशा में आगे बढ़ेंगे।

राजेन्द्र सिंह

सामाजिक कार्यकर्ता

Published on:
27 Sept 2018 09:39 am