4 सितंबर 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

अधीर युवा मन श्रीकृष्ण से सीखे संतुलन का पाठ

आज की युवा पीढ़ी अध्ययन और कॅरियर के दबाव के चलते बहुत जल्दी तनावग्रस्त हो जाती है, अगर युवा अपने जीवन में धैर्य के साथ आध्यात्मिकता को शामिल करें तो उनके आगे बढऩे का मार्ग अपने आप प्रशस्त हो जाएगा।
3 min read
Google source verification

जयपुर

image

Opinion Desk

image

अमितासना दास

Sep 04, 2026

krishna

krishna

अध्यक्ष, गुप्त,(वृंदावन धाम)

अपने जादुई आकर्षण और सुरीली बांसुरी से सबका मन मोह लेने वाले, मोर मुकुटधारी, माखन चोर और जब बात हो धर्म और न्याय की तो कुरुक्षेत्र के युद्ध में धर्म की विजय करने के लिए अर्जुन का सारथी बनने वाले, वो हैं कृष्ण। एक तरफ असीम प्रेम समर्पण, माधुर्य और वात्सल्य और दूसरी तरफ धर्म, नैतिकता और न्याय, कृष्ण का जीवन यही दर्शाता है कि समय के अनुसार अपनी भूमिका में बदलाव करके उच्च जीवन के आदर्श स्थापित किए जा सकते हैं।

आज जन्माष्टमी है, कृष्ण का आविर्भाव दिवस, लगभग 5253 वर्ष पहले उन्होंने अपने अवतरण से ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए, जो आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उस समय थे। कुरुक्षेत्र में जैसे अर्जुन ने उनके आदेश का पालन करके युद्ध में विजय प्राप्त की। ठीक वैसे ही हमारी युवा पीढ़ी भी कृष्ण को आदर्श बनाकर अपने जीवन को सही दिशा दे सकती है और मुश्किलों पर विजय प्राप्त कर सकती है। बचपन से लेकर युवावस्था तक उन्होंने ऐसा आचरण किया जो आदर्श बन गया।

श्रीकृष्ण सबसे बड़े 'मैनेजमेंट गुरु' हैं। उन्होंने हमेशा व्यावहारिक आचरण किया। जीवन के हर मोर्चे पर अपने व्यावहारिक ज्ञान का परिचय दिया। युवाओं को जीवन में व्यावहारिकता की बात स्वीकार करनी चाहिए और परिस्थितियों के अनुसार अपने आप को ढालना चाहिए। तभी सफलता के द्वार खुल सकते हैं। युवा भी अपने जीवन में अति भावुकता के बजाय व्यावहारिकता को प्राथमिकता दें तो वे ज्यादा मजबूती से जीवन की हर कठिनाई से जूझ सकते हैं। कुरुक्षेत्र के युद्ध में कृष्ण ने अर्जुन के गुरु की उपाधि ग्रहण की। उन्होंने अपने ज्ञान और अनुभवों से अर्जुन की अज्ञानता को दूर किया। युवा पीढ़ी भी अपने अनुभवों से कुछ न कुछ सीखने का प्रयत्न करे। क्योंकि हर अनुभव कुछ सिखाता है अपनी विफलताओं से निराश न होकर उनसे अपनी सफलताओं की सीढ़ी तैयार करें।

कहते हैं मनुष्य की मति ही उसके जीवन की गति तय करती है। आज की युवा पीढ़ी अध्ययन और कॅरियर के दबाव के चलते बहुत जल्दी तनावग्रस्त हो जाती है, अगर युवा अपने जीवन में धैर्य के साथ आध्यात्मिकता को शामिल करें तो उनके आगे बढऩे का मार्ग अपने आप प्रशस्त हो जाएगा। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन की हर दुविधा का समाधान किया है। युवा भी गीता से प्रेरणा लेकर अपने जीवन के मुश्किल सवालों को हल कर सकते हैं। पूरे दिन में से थोड़ा-सा समय ईश्वर से जुडऩे के लिए भी निकालें। उनसे संवाद करें। ईश्वर की कृपा से धीरे धीरे अंतर्मन में अपने आप उजियारा होना शुरू हो जाता है और सारे सवालों के समाधान मिलने लगते हैं।

महाभारत के युद्ध में पांडवों की जीत के लिए श्रीकृष्ण ने 'मास्टर स्ट्रेटेजी' अपनाई। अगर श्रीकृष्ण ऐसा न करते तो शायद पांडव युद्ध में विजयी न हो पाते। इसलिए युवा भी अपने जीवन में स्ट्रेटेजी बनाकर चलें, जो उनसे ज्यादा अनुभवी हैं उनसे मार्गदर्शन लेकर आगे बढ़ें। स्ट्रेटेजी समय और शक्ति के अपव्यय को बचाती है। हमारी 'जेन जी' सब कुछ 'इंस्टेंट' चाहती है, हम कभी बहते हुए पानी की धारा में अपनी परछाई साफ नहीं देख सकते, जब पानी में ठहराव होता है तभी हमें उसमें अपना स्वरूप साफ दिखाई देता है। इसलिए जीवन में ठहराव और संतुलन का बहुत महत्व है और कृष्ण ने अपने जीवन में संतुलन का सदा परिचय दिया है। उन्होंने अपने जीवन में हर रिश्ते और कार्य को बड़े ही संतुलन से निभाया। मैनेजमेंट गुरु श्रीकृष्ण बड़े ही दूरदर्शी थे। वे अपना हर निर्णय परिस्थितियों का आकलन करने के बाद ही लिया करते थे। इसलिए कहा जाता है कि जीवन में दूरदर्शिता बेहद जरूरी है। युवा वर्तमान में रहते हुए अपने भविष्य के लिए योजना तैयार करें। समय की मांग के अनुसार अपने आप को ढालें। जीवन का लक्ष्य तय करें और उसे पाने के लिए जितनी भी तैयारी की जरूरत है वह करें। हर समय कुछ नया सीखते रहें।

युवा हमारे देश का भविष्य हैं। आज की पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा मंत्र ये है कि वह नकारात्मकता, गुस्से और अवसाद को अपने ऊपर हावी न होने दे। आध्यात्मिकता से अपने मानसिक स्वास्थ्य की नींव को मजबूत बनाए। यही वह ताकत है, जो किसी भी परिस्थिति में आपको डिगने नहीं देती। रोज भगवद्गीता पढ़ें, भगवान का जप करें। आप जीवन की मुश्किल राह को आसानी से पार कर जाएंगे।आध्यात्मिकता हमारे जीवन की ताकत बनती है और नया उजाला लाती है। भगवान श्रीकृष्ण का जीवन सदैव कर्म प्रधान रहा है। उन्होंने भगवद्गीता में निष्काम कर्म का संदेश दिया है। युवा अपने कर्म (मेहनत) पर ध्यान दें और परिणाम की चिंता न करें बस अपना सौ प्रतिशत दें। भगवान ने गीता में यही सबसे बड़ी सीख दी है। कृष्ण का पूरा जीवन हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है, इस जन्माष्टमी पर मैं यही प्रार्थना करता हूं- आप उनसे प्रेरणा लें और अपने जीवन में निरंतर प्रगति करें। इसी मंगल कामना के साथ, हरे कृष्ण।