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नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने पिछले दिनों नेपाल में हिमस्खलन के बाद आई भीषण बाढ़ और तबाही को जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे से जोड़ते हुए इसे 'जलवायु न्याय' का मुद्दा बना लिया है। यह मुद्दा उस पुरानी अवधारणा, जिसमें आधुनिक विकास की कीमत कार्बन उत्सर्जन से चुकाने को एक तरह से अवश्यंभावी मान लिया गया था- को नए नजरिये से देखने की जरूरत पर जोर दे रहा है। हालांकि, विकासशील देश दशकों से 'जलवायु न्याय' की मांग करते रहे हैं, पर उसके केंद्र में औद्योगिक विकास ही रहा है, न कि उसकी वजह से होने वाली आपदा। विकासशील देश, विकसित देशों से कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए कुछ छूट मांगते रहे हैं। लेकिन, यह पहली बार है कि किसी प्राकृतिक आपदा के लिए विकसित देशों को जिम्मेदार मानने और मुआवजा देने की मांग सामने आई है। नेपाल के तर्क में दम है कि जीरो कार्बन उत्सर्जन करने वाले देश को सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाले देशों की वजह से नुकसान उठाना पड़ा है। यह बहस यदि सही दिशा में चली तो हम वहां पहुंच सकते हैं, जहां दुनिया को ले जाना चाहते हैं- एक धरती, एक सूरज और एक मानवता। आधुनिक विकास के पैमाने पर सवाल उठाए बिना ऐसा संभव नहीं है।
यह भी एक तथ्य है कि दुनिया में पर्यावरण असंतुलन के लिए कोई एक देश जिम्मेदार नहीं है। एक दौर में औद्योगीकरण में आगे ब्रिटेन व दूसरे यूरोपीय देश ज्यादा कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार थे। अब अमरीका, चीन और भारत का नाम आगे है। नेपाल में आई आपदा से पहले भी कहीं बाढ़, कहीं सूखा तो कहीं तूफान जैसी आपदाएं आती रही हैं। ग्लेशियर पिघल रहे हैं और समुद्र के स्तर में बढ़ोतरी हो रही है। देखा जाए तो समूची दुनिया ग्लोबल वार्मिंग के खतरों से प्रभावित हो रही है। इस बात को ध्यान में रखना होगा कि विकास की होड़ में कहीं हम प्रकृति को इतना नाराज नहीं कर दें कि आपदाएं झेलनी पड़ जाएं। विडंबना यही है कि जलवायु परिवर्तन को लेकर वैश्विक मंचों पर लगातार चर्चा होती है, समझौते होते हैं और लक्ष्य तय किए जाते हैं, लेकिन वास्तविकता में कार्बन उत्सर्जन की गति धीमी नहीं हो रही। दूसरी ओर विकास की दौड़ और भू-राजनीतिक तनावों के कारण संसाधनों का दोहन लगातार बढ़ता ही जा रहा है। नेपाल की आपदा यह संकेत देती है कि हमें विकास के मापदंडों पर भी पुनर्विचार करते हुए जलवायु परिवर्तन को जीवन और विकास की प्राथमिक चुनौती के रूप में स्वीकार करना होगा।जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने व पर्यावरण संतुलन के लिए सबको संवेदनशील होना ही होगा। मुकाबला साझा प्रयासों से ही संभव है। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन साधते हुए खास तौर से दुनिया के ताकतवर देशों को सहयोग के लिए आगे आना होगा। अन्यथा आने वाले दशकों में जलवायु संकट पूरी मानव सभ्यता के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर देगा।
Updated on:
4 Sep 2026, 4:31 PM IST
Published on:
4 Sep 2026, 4:31 PM IST
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