
krishna
महाभारत के रणक्षेत्र में अर्जुन को गीता के उपदेश देते हुए कृष्ण ने कहा था, ‘ये यथा माम् प्रपद्यन्ते, तांस्तथैव भजाम्यहम्।’’ यानी व्यक्ति मुझे जिस रूप में स्वीकार करता है, मैं उसे उसी रूप में मिलता हूं। कुछ फेरबदल के साथ इसी भाव को तुलसीदास ने ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी’ कहकर अभिव्यक्त किया। दरअसल, कृष्ण उन बिरले चरित्रों में हैं जो विविध स्वरूपों में लोगों के आराध्य हैं। बाल रूप में उनकी लीलाओं का स्मरण करते करते लोग आज भी विभोर हो जाते हैं। आज भी उनके भक्तों में लड्डूगोपाल के रूप में उनको पूजना बहुत शुभ माना जाता है। फिर कृष्ण रासबिहारी के रूप में एक प्रेमी होकर संसार को सम्मोहित करते हैं। इसके बाद की वय में वो एक योद्धा और गुरु के रूप में लोगों को अपना जीवन सामाजिक मूल्यों और मर्यादा के साथ जीने की प्रेरणा देते हैं। मानवता के इतिहास में कृष्ण का चरित्र उन बिरले चरित्रों में है जिन्हें चंचल शिशु, उदार मित्र, विलक्षण प्रेमी, अद्भुत योद्धा, गुरु के रूप में समाज में समानान्तर पूजा जाता है।
राधा-कृष्ण की प्रेमकथा ही लीजिए। कवियों, चित्रकारों और अन्य सर्जकों ने राधा-कृष्ण के प्रेम को भले ही किसी भी रूप में चित्रित किया हो, लेकिन कृष्ण हमेशा प्रेम को जीवन की मर्यादा में बांधकर निभाने के पक्षधर रहे। राधा का माधुरी भाव कृष्ण के प्रति था। कृष्ण के प्रति उनके मन में गूढ़ सखा भाव था। ऐसा सखा भाव जिसमें परस्पर प्रेम भी समाया था। इस प्रेम में समर्पण था, आसक्ति नहीं। समर्पण अपने प्रिय को मुक्त हस्त से सर्वस्व दान करने की प्रेरणा देता है। तेरह वर्ष की उम्र में गोकुल छोड़ते समय अंतिम बार कृष्ण जब राधा से मिले तो उन्होंने अपनी प्रिय बांसुरी राधा को दे दी। विदा के समय राधा ने एक वैजयंती माला कृष्ण को उपहार में दी थी। कृष्ण जीवन भर उसे धारण किये रहे। प्रिय के उपहार को सदैव अपने साथ रहने का सुख क्या होता है, इसे केवल वही समझ सकता है, जिसने इस भावना को जिया हो। महत्वपूर्ण यह है कि इस विदा के बाद कृष्ण और राधा कभी नहीं मिले। लेकिन वह प्रेम ही क्या जिसमें देह की दूरी विचलन का कारण बन जाए? कुछ लोग दावा करते हैं कि बरसों बाद कृष्ण जब सूर्यग्रहण के अवसर पर परिवार के साथ तीर्थ स्नान करने कुरूक्षेत्र आए थे तो उनकी राधा से मुलाकात हुई थी। लेकिन कुछ ग्रंथों के अनुसार जब सखियों ने राधा से कहा कि कृष्ण से मिलने चलना चाहिए तो राधा ने ही मना कर दिया। कृष्ण जीवन को उसकी संपूर्णता के साथ जीने के पक्षधर थे। उन्हें इसीलिये विष्णु का संपूर्ण अवतार कहा जाता है, अंशावतार नहीं। महाभारत के युद्ध में द्रोण का मनोबल तोडऩे के लिए उन्होंने जिस तरह अश्वत्थामा नामक हाथी के मारे जाने की सूचना को द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा के मारे जाने के भ्रम में परिवर्तित करने की लीला रची, वैसा सिर्फ उसी व्यक्ति के लिये संभव है, जिसे पता है कि समय के सरोकारों के संरक्षण के लिये पांचजन्य बजाना हो तो प्रेम की बांसुरी को हमेशा के लिए प्रिय के हाथों में सौंप देना होता है। कृष्ण ने सुदामा की दीनता देखकर करूणा दिखाने में कोई कृपणता नहीं दिखाई।
अर्जुन की सहायता के लिए उन्होंने रणप्रांगण में सारथी होना भी स्वीकार कर लिया। आप कल्पना कर सकते हैं कि उस समय कृष्ण की उम्र अस्सी वर्ष थी, जब कुरूक्षेत्र में अपनी लीलाओं से वे पांडवों की विजय कथा लिख रहे थे? माना जाता है कि कृष्ण इस पृथ्वी पर 116 साल रहे। महाभारत के युद्ध के बाद जब वो गांधारी और धृतराष्ट्र के पास उनके पुत्रों के निधन पर संवेदना प्रकट करने गए तो गांधारी ने उन्हें श्राप देते हुए कहा था, ‘जनार्दन तुम चाहते तो यह विनाश रोक सकते थे। लेकिन तुमने नहीं रोका। मैं तुम्हें श्राप देती हूं कि जिस तरह मैं आज अपने परिवार के विनाश का संताप सह रही हूं, आज से ठीक छत्तीस वर्ष बाद अपने अंतिम समय में तुम्हें भी वह संताप भोगना होगा।’ यानी महाभारत का युद्ध कृष्ण के देहत्याग से छत्तीस वर्ष पूर्व हुआ था। अस्सी वर्ष की वय में उस चपल चेतना को वही निभा सकता है, जो योगेश्वर हो और अनंतजीत भी।
कृष्ण का स्मरण हमेशा मनुष्यजाति को ध्यान दिलाता रहेगा कि जिस समाज में तुम रहते हो, उसके सुखों की रक्षा के लिए अपनी कनिष्ठिका पर गोवर्धन धारण करने की क्षमता तुममें होनी चाहिए। इस लीला का सांकेतिक अर्थ यह है कि अपनों के सुखों के लिए बड़ी से बड़ी जिम्मेदारी को सहजता से निभाने की चेतना हममें होनी चाहिए। यह स्मरण हमें जिम्मेदार मनुष्य होने में मदद करता है। इस समय की सबसे बड़ी आवश्यकता यही तो है कि हम सब अपने दायित्वों को समझें और उनका ईमानदार निर्वहन करें। शायद इसीलिए द्वापर युग में रहे कृष्ण का स्मरण ही चेतनाशील लोगों के लिये प्रार्थना की तरह पवित्र हो जाता है।
Updated on:
03 Sept 2026 06:02 pm
Published on:
03 Sept 2026 06:02 pm
