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जेन ‘जी’ व ‘अल्फा’ बदलेंगे शिक्षा की तस्वीर!

आज भी इन बच्चों को स्कूलों में बेंच नहीं मिलती, वे दरी पर बैठकर अपनी शिक्षा की नींव रख रहे हैं। बिजली और पंखों के अभाव में चिलचिलाती धूप और उमस में छोटे-छोटे बच्चों का पढऩा शारीरिक प्रताडऩा जैसा है।
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जयपुर

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Opinion Desk

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प्रो. अशोक कुमार

Sep 03, 2026

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पूर्व कुलपति(गोरखपुर विश्वविद्यालय)

हमारी शिक्षा व्यवस्था आज जिस दौर से गुजर रही है, वह किसी से छिपी नहीं है। प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों तक, बदहाल बुनियादी ढांचा, शिक्षकों की भारी कमी और वित्तीय कुप्रबंधन ने शिक्षा को पटरी से उतार दिया है लेकिन इस गहरी निराशा के बीच एक नई उम्मीद की किरण जगी है- देश की युवा पीढ़ी यानी 'जेन जी' और 'अल्फा जनरेशन' का आगे आना। अब यह युवा पीढ़ी सिर्फ मूक दर्शक नहीं, बल्कि बदलाव की मशाल लेकर खुद मैदान में उतर चुकी है।

संसद की प्राक्कलन समिति की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 73त्न बच्चे 12वीं कक्षा तक पहुंचने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं। शिक्षकों की संख्या में बहुत कम वृद्धि हुई है। स्कूलों की कुल संख्या 15.17 लाख से घटकर 14.71 लाख हो गई है। रिपोर्ट के अनुसार, स्कूल छोडऩे के मुख्य कारण प्राथमिक स्तर पर कमजोर शैक्षणिक नींव, सीनियर सेकेंडरी स्कूलों की कमी, लंबी दूरी, आर्थिक-सामाजिक दबाव और शिक्षकों के प्रशिक्षण में भारी गिरावट हैं। समिति ने सुझाव दिया है कि 'निपुण भारत' योजना को सख्ती से लागू कर बुनियादी शिक्षा मजबूत की जाए, छात्रों के लिए डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम बनाया जाए और शिक्षकों के प्रशिक्षण के वार्षिक लक्ष्य तय किए जाएं। जेन जी और जनरेशन अल्फा की ऊर्जा का एक बहुत बड़ा हिस्सा केवल प्रतियोगी परीक्षाओं, लीक होते पेपरों, सीट बढ़ाने के संघर्ष और कोचिंग संस्थानों के अंतहीन चक्रव्यूह में दुखी हो रहा है। छात्र आंदोलनों और मांग-पत्रों का दायरा केवल परीक्षा प्रणाली के सुधार तक सिमट कर रह गया है। जबकि इसके साथ-साथ स्कूली शिक्षा के स्तर पर हो रहे भारी ड्रॉपआउट, बुनियादी ढांचे के घोर अभाव और गिरती प्रासंगिकता जैसे गंभीर संकट देश के भविष्य के सामने एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहे हैं। वास्तविक प्रश्न औपचारिक शिक्षा की गिरती प्रासंगिकता, बुनियादी ढांचे के घोर अभाव, इसकी आसमान छूती लागत और तेजी से बदलते एआइ-संचालित जॉब मार्केट को लेकर उठने चाहिए। आज के युवाओं को अपने आंदोलनों, संवादों और उद्देश्यों की दिशा बदलनी होगी। उन्हें यह समझना होगा कि यदि शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद ही समय के अनुकूल नहीं रही, तो किसी परीक्षा को पास कर लेना भी उनके भविष्य की गारंटी नहीं बन पाएगा। प्रतियोगी परीक्षाओं की शुचिता और युवाओं का गुस्सा अपनी जगह पूरी तरह जायज है, लेकिन इस गुस्से को केवल एक तात्कालिक परीक्षा के इर्द-गिर्द सीमित कर देना एक दूरदर्शिता की कमी होगी।

प्रतियोगी परीक्षाओं के चक्रव्यूह, गिरती स्कूली शिक्षा और एआइ युग की वास्तविक चुनौतियों का आकलन करना होगा। 'अल्फा जनरेशन' का कड़वा सच यह है कि नौनिहाल जमीन पर बैठकर अब भी संघर्ष कर रहे हैं। आज के स्कूलों में पढऩे वाली 'अल्फा जनरेशन' के बच्चे उस व्यवस्था को भोग रहे हैं जो बुनियादी सुविधाओं से कोसों दूर है। आज भी इन बच्चों को स्कूलों में बेंच नहीं मिलती, वे दरी पर बैठकर अपनी शिक्षा की नींव रख रहे हैं। बिजली और पंखों के अभाव में चिलचिलाती धूप और उमस में छोटे-छोटे बच्चों का पढऩा शारीरिक प्रताडऩा जैसा है। जर्जर भवनों में पढऩे वाले ये बच्चे हर पल डर के साए में जीते हैं, जहां पुरानी इमारतों के गिरने का खतरा मंडराता रहता है। स्कूलों में साफ-सुथरे टॉयलेट्स और नियमित सफाई न होने के कारण 'अल्फा जनरेशन' के बच्चों को भारी मानसिक और शारीरिक कष्ट उठाना पड़ता है। यह पीढ़ी अब अपनी मासूमियत के साथ इन व्यवस्थाओं पर तीखे सवाल खड़े कर रही है कि आखिर उनके विकास के लिए आने वाला पैसा कहां जा रहा है? 'जेन जी' की डिजिटल क्रांति और जमीनी पहल कॉलेज और यूनिवर्सिटी स्तर पर मौजूद 'जेन जी' युवा तकनीक के जानकार हैं और वे इस टूटी हुई शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए अपने स्तर पर अनूठे प्रयास कर रहे हैं।

'जेन जी' युवा इंस्टाग्राम, एक्स (ट्विटर) और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स के जरिए स्कूलों और कॉलेजों की जर्जर तस्वीरों को वायरल कर सरकार और समाज का ध्यान खींच रहे हैं। वे 'फंड कहां गया?' जैसे ट्रेंड्स चलाकर प्रशासन को जवाबदेह बना रहे हैं। चूंकि आज की अधिकांश प्रतियोगी परीक्षाएं कंप्यूटर आधारित हो चुकी हैं और ग्रामीण बच्चे इससे अनजान हैं, इसलिए 'जेन जी के छात्र अपने स्तर पर गांवों में छोटे-छोटे डिजिटल कैंप लगाकर बच्चों को कंप्यूटर का बुनियादी ज्ञान और ऑनलाइन परीक्षा का अनुभव दे रहे हैं। फंड की बंदरबांट और कागजी विकास कार्यों (जहां प्राचार्य या तो डर के मारे काम नहीं करते या कागजों में फर्जीवाड़ा कर लेते हैं) के खिलाफ 'जेन जी' के युवा आरटीआइ और सोशल ऑडिट का उपयोग कर रहे हैं। वे यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं कि एक-एक पैसा सही जगह खर्च हो। प्राचीन पाठ्यक्रमों के खिलाफ विरोध होना चाहिए। प्रतियोगी परीक्षाओं के सिलेबस और कॉलेज के पुराने, अप्रासंगिक पाठ्यक्रमों के बीच के भारी अंतर को पाटने के लिए युवा अब आधुनिक और व्यावहारिक पाठ्यक्रम की मांग पुरजोर तरीके से उठा रहे हैं। बुनियादी सुविधाओं और शिक्षकों की कमी के खिलाफ साझा संघर्ष करना आवश्यक है। 'जेन जी' और 'अल्फा' मिलकर उन बुनियादी विसंगतियों पर चोट कर रहे हैं, जिन्हें लंबे समय से नजरअंदाज किया जा रहा है। शिक्षकों की कमी के खिलाफ मुखर विरोध करना चाहिए। महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों, मेडिकल और इंजीन्यरिंग महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में 30 से 40 प्रतिशत पद खाली होना और पूरी व्यवस्था संविदा या अस्थायी शिक्षकों के भरोसे चलना युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ है।

युवा पीढ़ी अब मांग कर रही है कि स्थायी और योग्य शिक्षकों की तुरंत नियुक्ति हो, ताकि छात्रों को उच्चकोटि का मार्गदर्शन मिल सके। जिन कॉलेजों और स्कूलों में चौकीदार और सफाई कर्मचारी तक नहीं हैं, वहां सुरक्षा और स्वच्छता की गारंटी के लिए युवा छात्रसंघ और स्थानीय मंचों के माध्यम से धरने-प्रदर्शन कर रहे हैं। दूरदर्शी नेतृत्व के साथ जब जेन जी और अल्फा की ऊर्जा जुड़ती है तो यह शिक्षा व्यवस्था की कायापलट का सबसे बड़ा आधार बनती है। अब समय आ गया है कि सरकार कागजी दावों से बाहर निकलकर धरातल पर काम करे। जब तक हर विद्यालय में स्मार्ट रूम, बेंच, बिजली, शुद्ध पानी, साफ शौचालय और योग्य शिक्षक नहीं होंगे, तब तक यह युवा पीढ़ी रुकने वाली नहीं है। शिक्षा में सुधार ही राष्ट्र के स्वर्णिम भविष्य की एकमात्र कुंजी है।