देश के भीतर भले ही तीव्र मतभेद हों, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत एक स्वर में खड़ा दिखाई देता रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रधानमंत्री किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए।
अवधेश कुमार , वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार
शरद पवार ने देश की विदेश नीति पर आंतरिक राजनीतिक व्यवहार के संदर्भ में जो कुछ कहा है, उस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। उन्होंने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के बाहर देश की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए कार्य कर रहे हैं। हमारे राजनीतिक विचार भले ही अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन जब देश के सम्मान का प्रश्न आता है, तो राजनीतिक मतभेदों को बीच में नहीं लाना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पांच दिवसीय विदेश यात्रा को लेकर देश के भीतर राजनीतिक और गैर-राजनीतिक दोनों मोर्चों पर जिस प्रकार की टिप्पणियां हुईं, उनके संदर्भ में उनका यह मत अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है। प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त अरब अमीरात से शुरुआत करते हुए स्वीडन, नीदरलैंड, नॉर्वे और इटली की द्विपक्षीय यात्राएं कीं तथा नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में स्कैंडिनेवियाई भारत शिखर सम्मेलन में भाग लिया। इन यात्राओं का उद्देश्य राष्ट्रीय हितों को साधना था और विशेषज्ञों के अनुसार इनमें उन्हें काफी हद तक सफलता भी मिली। इसके बावजूद, उनके विदेश प्रवास के दौरान ही राजनीतिक और सोशल मीडिया स्तर पर आलोचनाओं का दौर शुरू हो गया। इन आलोचनाओं में ऐसा कोई ठोस तथ्य सामने नहीं आया, जिससे यह कहा जा सके कि प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय हितों के विपरीत कार्य किया है। स्पष्ट है कि विरोध अधिकतर राजनीतिक मतभेदों और वैचारिक असहमति के आधार पर था। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि देश के भीतर की राजनीतिक असहमति यदि विदेश तक पहुंचती है, तो वह राष्ट्रीय हित को प्रभावित कर सकती है। इससे यह संकेत मिलता है कि कई बार हम देशहित की बजाय राजनीतिक या व्यक्तिगत हित को प्राथमिकता देने लगते हैं या फिर वैचारिक दुराग्रह हावी हो जाता है।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत एक स्वर में खड़ा
यह भी सही है कि शरद पवार और प्रधानमंत्री मोदी के बीच पूर्ण सहमति नहीं रही है। महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार की राकांपा की स्थिति कमजोर हुई है, जबकि अजीत पवार के भाजपा के साथ जाने से राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं। इसके बावजूद भारतीय राजनीति की परंपरा यह रही है कि विदेश नीति के मामलों में सामान्यत: एक साझा राष्ट्रीय दृष्टिकोण रखा जाता है। देश के भीतर भले ही तीव्र मतभेद हों, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत एक स्वर में खड़ा दिखाई देता रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रधानमंत्री किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए। पहले पत्रकारिता और सार्वजनिक विमर्श में भी विदेश नीति पर आलोचना करते समय एक मर्यादा का पालन किया जाता था। अपवाद हमेशा रहे हैं, लेकिन वे मुख्य धारा नहीं बन सके। समय के साथ राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ा है और वैश्विक तथा घरेलू स्तर पर विभिन्न विचारधाराओं और समूहों के बीच टकराव भी बढ़ा है। इसका प्रभाव अब सार्वजनिक विमर्श में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। आज स्थिति यह है कि विदेश यात्राओं और अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर भी तीखी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं देखने को मिलती हैं।
प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं का मूल लक्ष्य राष्ट्रीय हितों को साधना
एक भारतवासी के रूप में हमारा उद्देश्य यह होना चाहिए कि पश्चिम एशिया में चल रहे संकट, ईरान-अमेरिका-इजरायल तनाव, तथा हार्मुज जलडमरूमध्य की अस्थिर स्थिति के बीच भारत अपनी ऊर्जा और आपूर्ति सुरक्षा सुनिश्चित करे। पेट्रोल और डीजल जैसी आवश्यक वस्तुओं के लिए आयात पर निर्भर भारत के लिए स्थिर और दूरदर्शी कूटनीति अत्यंत आवश्यक है। प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं का मूल लक्ष्य भी इन्हीं राष्ट्रीय हितों को साधना रहा है। इन यात्राओं में हुए समझौतों, संयुक्त घोषणाओं और द्विपक्षीय वार्ताओं का गहराई से अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि भारत ने अपने रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाया है। दुर्भाग्य से कई बार इन महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों की तुलना में कुछ प्रतीकात्मक घटनाओं को अधिक महत्त्व दे दिया जाता है। किसी पत्रकार द्वारा नॉर्वे में दोनों प्रधानमंत्रियों के स्वागत वक्तव्य के दौरान प्रोटोकॉल से हटकर प्रधानमंत्री से मानवाधिकार और प्रेस स्वतंत्रता पर प्रश्न पूछे जाने की घटना को ही अधिक महत्त्व दिया गया, जबकि नॉर्वे के साथ पेंशन फंड से 28 अरब डॉलर निवेश, ब्लू इकोनॉमी साझेदारी और हरित सहयोग जैसे महत्त्वपूर्ण समझौते अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहे। इसी प्रकार नॉर्डिक भारत शिखर सम्मेलन में विश्वसनीय हरित तकनीक और नवाचार रणनीतिक साझेदारी तथा काउंसिल में पर्यवेक्षक की स्थिति प्राप्त होना भी मुख्य विमर्श से बाहर रह गया। इसी तरह इटली यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा जॉर्जिया मेलोनी को एक प्रतीकात्मक उपहार भेंट करने की घटना पर अनावश्यक बहस हुई, जबकि दोनों देशों के बीच विशेष रणनीतिक साझेदारी, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की भूमिका और आतंकवाद के विरुद्ध सहयोग जैसे महत्त्वपूर्ण विषयों पर सहमति बनी।
देश की प्रतिष्ठा सर्वोपरि
कूटनीति में सहज संवाद, मुस्कान और व्यक्तिगत स्तर पर सौहार्दपूर्ण संबंध अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते हैं। दो देशों के नेताओं के बीच सकारात्मक वातावरण बनने से जटिल मुद्दों पर भी सहमति की संभावनाएं बढ़ती हैं। यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सामान्य और आवश्यक प्रक्रिया है। अंतत: प्रश्न यह है कि एक राष्ट्र के रूप में हम अपनी विदेश नीति और नेतृत्व पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। शरद पवार जैसे वरिष्ठ नेताओं का यह कथन इसलिए प्रासंगिक है कि राष्ट्रीय हित के मामलों में सभी को एक साझा दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और देश की प्रतिष्ठा को सर्वोपरि रखना चाहिए। किसी भी प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री की विदेश यात्राओं का मूल्यांकन संपूर्ण तथ्यों और समग्र उपलब्धियों के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल आंशिक या प्रतीकात्मक घटनाओं के आधार पर।