26 मई 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

शिक्षा का बाजारवाद और विद्यार्थियों में बढ़ता असंतोष

वैश्वीकरण के बाद शिक्षा एक व्यापार और उद्योग का रूप ले चुकी है, जहां नकल भी एक संगठित उद्योग बन गया है। इससे विद्यार्थियों में असंतोष बढ़ रहा है, जो उन्हें आत्महत्या जैसे कठोर कदम उठाने के लिए मजबूर कर रहा है। शिक्षा कोई बिकाऊ वस्तु नहीं है , जिसे केवल धनवान वर्ग खरीद सके या जिसे कोचिंग संस्थान डॉक्टर-इंजीनियर बनने का सपना बेचकर व्यापार बना दें।

3 min read
Google source verification

भारत

image

Opinion Desk

May 26, 2026

education system

education system

डॉ. ज्योति सिडाना
समाजशास्त्री एवं स्तंभकार

शिक्षा उन विचारों एवं क्रियाओं का समुच्चय है, जिन्हें एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को इसलिए हस्तांतरित किया जाता है कि व्यक्ति समाज की भूमिकाओं को समझ सके, समाज का सक्रिय सदस्य बन सके तथा उसमें आवश्यक सुधार कर सके। इस दृष्टि से शिक्षा व्यक्ति और समाज के बीच सामंजस्य स्थापित करती है। लेकिन यह भी सत्य है कि वर्तमान दौर में अकादमिक स्वायत्तता एक मिथक बनती जा रही है और इसका अभाव बच्चों की सृजनशीलता में बाधा उत्पन्न कर रहा है। राजस्थान के सीकर में नीट परीक्षा की तैयारी कर रहे एक छात्र ने परीक्षा रद्द होने के बाद कथित रूप से आत्महत्या कर ली। परिजनों के अनुसार उसने परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन किया था और लगभग 650 अंक आने की उम्मीद थी, लेकिन परीक्षा रद्द होने से उत्पन्न अनिश्चितता ने उसे मानसिक तनाव में डाल दिया, जिसके कारण उसने यह कदम उठाया। पेपर लीक या परीक्षा रद्द होने की घटनाएं अब अपवाद नहीं रहीं, बल्कि पिछले कुछ दशकों में यह सामान्य होती जा रही हैं।

हर 36 मिनट में एक विद्यार्थी कर रहा आत्महत्या
इतना ही नहीं, पिछले दो दशकों में भारत के प्रमुख इंजीनियरिंग कॉलेजों में कम से कम 160 छात्रों की मृत्यु दर्ज की गई है, जिनमें से 69 मौतें पिछले पांच वर्षों में हुई हैं। विशेषज्ञों के अनुसार आइआइटी जैसे संस्थानों में जातिगत भेदभाव अभी भी मौजूद है और आत्महत्या के कई मामलों में हाशिए पर रहने वाले समुदायों के छात्र शामिल हैं। राष्ट्रीय अपराध रेकॉर्ड ब्यूरो की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर दिन दर्जनों छात्र आत्महत्या कर रहे हैं। वर्ष 2024 में 14,488 छात्रों ने आत्महत्या की, जो वर्ष 2023 की तुलना में 596 अधिक है। औसतन हर 36 मिनट में एक विद्यार्थी अपना जीवन समाप्त कर लेता है।

शिक्षा केवल डिग्री और नौकरी प्राप्त करने का माध्यम
प्रश्न यह है कि क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में उत्तीर्ण होना रह गया है? अधिकांश मामलों में आत्महत्या के पीछे परिवार की उच्च महत्त्वाकांक्षा, छात्र की अरुचि या प्रतिस्पर्धा का दबाव पाया जाता है। किंतु यह विश्लेषण एकांगी है, क्योंकि इसके लिए शिक्षा प्रणाली, प्रशासन, राजनीति और समाज सभी कहीं न कहीं जिम्मेदार हैं। सीबीएसई द्वारा मूल्यांकन में अनियमितताएं, परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र लीक होना, शिक्षकों पर दबाव डालकर प्रश्नपत्र प्राप्त करने की कोशिश, विश्वविद्यालयों में पीएच.डी. कोर्सवर्क का केवल कागजी संचालन, शोध कार्यों में साहित्यिक चोरी जैसी घटनाएं शिक्षा के बाजारवाद को दर्शाती हैं। इस पूरे तंत्र में राजनीति, प्रशासन, शिक्षक, विद्यार्थी और निजी शैक्षणिक संस्थानों का गठजोड़ सक्रिय दिखाई देता है। शिक्षा को केवल डिग्री और नौकरी प्राप्त करने का माध्यम बना दिया गया है, जिससे शिक्षा प्रणाली में गंभीर विसंगतियां उत्पन्न हो रही हैं।

नकल बना एक संगठित उद्योग
वैश्वीकरण के बाद शिक्षा एक व्यापार और उद्योग का रूप ले चुकी है, जहां नकल भी एक संगठित उद्योग बन गया है। इससे विद्यार्थियों में असंतोष बढ़ रहा है, जो उन्हें आत्महत्या जैसे कठोर कदम उठाने के लिए मजबूर कर रहा है। शिक्षा कोई बिकाऊ वस्तु नहीं है ,जिसे केवल धनवान वर्ग खरीद सके या जिसे कोचिंग संस्थान डॉक्टर-इंजीनियर बनने का सपना बेचकर व्यापार बना दें। दक्षिण एशिया में शिक्षा नीति संबंधी जड़ता की स्थिति उत्पन्न हो गई है। इससे उबरने के लिए शिक्षकों, विद्यार्थियों, अभिभावकों और नीति निर्माताओं को मिलकर विचार करना होगा, ताकि समग्र और संतुलित विकास सुनिश्चित हो सके। पाउलो फ्रेरे का मत था कि शिक्षा में वयस्कों की सक्रिय भागीदारी होनी चाहिए और शिक्षा उनके परिवेश व समस्याओं से जुड़ी होनी चाहिए। उनका मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल साक्षरता नहीं, बल्कि समाज की आलोचनात्मक समझ विकसित करना भी है, जिससे वंचित वर्ग अपने हालात को समझकर उनके खिलाफ संघर्ष कर सके। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हमारी शिक्षा नीति वास्तव में समाज और परिवेश से जुड़ पाई है? यदि नहीं, तो नकल और डिग्री के व्यापार को रोकना कठिन है।