
कृपाशंकर चौबे
(महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में प्रोफेसर हैं)
Krishna Janmashtami 2021 : भगवान श्रीकृष्ण (Lord Shri Krishna) जो आज ही के दिन जन्मे थे, ने अर्जुन के निमित्त जो गीतारूपी ज्ञानराशि संसार को दी, उसी गीता (shrimad bhagwat geeta) ने स्वतंत्र काव्य ग्रंथ के रूप में सदियों से आम आदमी से लेकर राष्ट्र नायकों को प्रेरित करने का महती कार्य किया। कई समाज सुधार आंदोलनों से लेकर ब्रिटिश उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रीय आंदोलनों तक में प्रेरणा जगाने का काम गीता ने किया। वेदव्यास ने महाभारत में भीष्म पर्व के अंतर्गत 18 अध्यायों के रूप में गीता को समय के साथ इस तरह जोड़ा है कि वह कृति हमेशा वर्तमान बनी रहती है। उसके कालजयी होने की सबसे बड़ी वजह उसका आध्यात्मिक और दार्शनिक पक्ष है। जीवन के विकास के लिए आवश्यक सभी विचार गीता में हैं। उसमें कर्मयोग, ज्ञान योग व भक्तियोग का मणिकांचन संयोग है।
गीता का संदेश स्पष्ट है कि आत्मा अमर है, देह क्षणभंगुर है। अत: उसका उपयोग स्वधर्म के लिए करना चाहिए। हमें सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए और फल की चिंता छोड़कर अपने कर्म पर ध्यान देना चाहिए। स्वधर्म पालन ही संसार के कल्याण का पाथेय है। दुनिया की विभिन्न भाषाओं में सर्वाधिक टीकाएं गीता पर ही लिखी गईं। दुनिया की कोई ऐसी प्रमुख भाषा नहीं, जिसमें गीता का अनुवाद न हुआ हो। अंग्रेज विद्वान चाल्र्स विलकिंस ने 1785 में गीता का अंग्रेजी में अनुवाद किया। 1787 में एजेपी परौल्ड ने उसका फ्रेंच में अनुवाद किया। ब्रिटेन के कवि एडविन अर्नाल्ड ने 1885 में गीता का अंग्रेजी में काव्यानुवाद किया। 1823 में ऑगस्ट सीगल ने गीता का जर्मनी में अनुवाद किया और जर्मन कवि फ्रेडरिक सीगल ने उसका भाष्य किया।
अमरीकी साहित्यकार आर. डब्ल्यू. इमर्सन ने 19वीं सदी में गीता पर केंद्रित प्रसिद्ध कविता ब्रह्म लिखी। 19वीं सदी में ही अमरीकी कवि हेनरी डेविड थोरो ने गीता का भाष्य करते हुए लिखा था कि गीता की तुलना में वि साहित्य निम्न स्तर का है। अमरीकी विद्वान थॉमस जे. होपकिंस ने गीता का भाष्य किया। अंग्रेजी साहित्यकार और दर्शनशास्त्री एल्डुलस हक्सले ने 'भगवद्गीता: द सॉन्ग ऑफ गॉड' पुस्तक की भूमिका लिखते हुए उसकी महिमा का गुणगान किया। विश्व के गीता अध्येताओं की सूची बहुत लंबी है।
भारत में नौवीं शताब्दी में शंकराचार्य ने गीता का भाष्य करते हुए उसमें संन्यास के तत्व पर बल दिया। 11वीं शताब्दी में रामानुजाचार्य ने गीता से भक्ति का तत्व निकाला और बताया कि भक्ति से ही ज्ञान प्राप्त होता है। 13वीं शताब्दी में संत ज्ञानेश्वर, 16वीं शताब्दी में एकनाथ और 17वीं शताब्दी में रामदास ने गीता का भाष्य किया।
आधुनिक काल में भारतीय राष्ट्रवाद के सिद्धांतकार अरविंद घोष और विवेकानंद पर गीता का प्रभाव स्पष्ट है। बाल गंगाधर तिलक ने 'गीता रहस्य' पुस्तक लिखकर कर्मयोग तत्व को उजागर किया। इस पुस्तक ने भारतीय स्वाधीनता संग्राम को आध्यात्मिक आधार दिया। तिलक की पुस्तक 'गीता रहस्य' को माधव राव सप्रे ने हिंदी में अनूदित कर प्रकाशित किया। तमिल के महान कवि और पत्रकार सुब्रह्मण्य भारती ने ऋषि अरविंद घोष की पत्रिका 'कर्मयोगी' के तमिल संस्करण में भगवद्गीता का तमिल अनुवाद प्रकाशित किया। महात्मा गांधी ने गीता को माता कहा। उन्होंने कहा कि जो भी इस माता की शरण में जाता है, उसे वह ज्ञानामृत से तृप्त करती है। गांधी गीता को जीते हैं और कहते हैं कि मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।
गांधी की तरह विनोबा भावे भी गीता को जीते हैं और कहते हैं कि गीता प्रवचन मेरे जीवन की गाथा है, वही मेरा संदेश है। पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने भगवद्गीता का अंग्रेजी में अनुवाद करते हुए उसका भाष्य किया और लिखा कि यह दर्शनग्रंथ कम, धर्मग्रंथ अधिक है। वासुदेवशरण अग्रवाल ने महाभारत पर केंद्रित अपने इतिहास ग्रंथ 'भारत सावित्री' में लिखा, 'गीता मानव जीवन की मौलिक समस्याओं की व्याख्या करने वाला ऐसा परिपूर्ण काव्य है जिसकी अन्य किसी दर्शन, धर्म, अध्यात्म या नीति ग्रंथ से तुलना संभव नहीं है।'
महाभारत की कथा को आधार बनाकर भारतीय भाषाओं में अनेक रचनाएं लिखी गईं। हिंदी में मैथिली शरण गुप्त ने 1910 में खंडकाव्य 'जयद्रथ वध' लिखा। रामधारी सिंह दिनकर ने खंडकाव्य 'रश्मिरथी' और 'कुरुक्षेत्र' लिखा। इसी कड़ी में केदारनाथ मिश्र प्रभात कृत 'कर्ण', जगदीश गुप्त कृत 'शम्बूक', धर्मवीर भारती कृत 'अंधायुग', काशीनाथ सिंह कृत 'उपसंहार' जैसी अनेक पुस्तकों के नाम लिए जा सकते हैं। बीसवीं शताब्दी की सांध्यवेला में विष्णुकांत शास्त्री ने गीता का भाष्य किया। उन्होंने कोलकाता के श्रीबड़ाबाजार कुमारसभा पुस्तकालय में 1995 से लेकर 2000 तक गीता पर 55 व्याख्यान दिए जो 'गीता परिक्रमा' शीर्षक से तीन खंडों में प्रकाशित हैं। दो साल पहले 2019 में हृदय नारायण दीक्षित की किताब 'गीता का अंतर्संबंध' प्रकाशित हुई। दो खंडों में विभाजित उस पुस्तक में भी गीता का नवीन ढंग से भाष्य किया गया है। भारतीय मनीषा ने केवल गीता का भाष्य ही नहीं किया, उसके संदेशों को जीवन में उतारने का यत्न भी किया।