करीब चार दशक तक अयातुल्लाह अली खामेनेई ईरान के सिस्टम का चेहरा रहे। उनकी मौजूदगी ही ईरान की सियासत की दिशा तय करती थी। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। सवाल अब सिर्फ नए चेहरे का नहीं, बल्कि उस राह का भी है जिस पर ईरान आगे बढ़ेगा।
रवि शंकर - स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,
अमरीका और इजरायल के संयुक्त सैन्य अभियान के तहत तेहरान को निशाना बनाए जाने के बाद मध्य-पूर्व में स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई है। इस सैन्य कार्रवाई में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान की सियासत में एक ऐसा मोड़ आ गया है जिसने पूरी दुनिया की सांसें थाम दी हैं। खामेनेई के निधन के बाद उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को देश का नया सर्वोच्च नेता घोषित किया गया। मोजतबा खामेनेई एक मध्यम स्तर के धर्मगुरु माने जाते हैं, लेकिन ईरान के सुरक्षा तंत्र और अपने पिता से जुड़े बड़े कारोबारी नेटवर्क में उनका प्रभाव काफी मजबूत रहा है। इसी वजह से उन्हें पहले से ही सुप्रीम लीडर पद का प्रमुख दावेदार माना जा रहा था। मोजतबा लंबे समय से पर्दे के पीछे सक्रिय रहे हैं। माना जा रहा है कि वे पिता की कट्टर नीतियों को ही आगे बढ़ाएंगे।
बता दें कि ईरान के नए सुप्रीम लीडर अब इजरायल और अमरीका की सेना के निशाने पर हैं क्योंकि ट्रंप चाहते थे कि ईरान का नया सुप्रीम लीडर उनकी पसंद का हो, जो उनके लिए और उनके अनुसार ईरान में काम करेगा। वह ईरान के नए सुप्रीम लीडर के चुनाव में भूमिका निभाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने मोजतबा की ताजपोशी को सिरे से नकार दिया है और ऐलान किया है कि उनकी मर्जी के बिना वह ज्यादा समय तक पद पर टिक नहीं पाएंगे। इतना ही नहीं, अमरीका और इजरायल ने चेतावनी दी है कि वे ईरान के परमाणु कार्यक्रम और सैन्य ठिकानों को पूरी तरह नष्ट करने तक नहीं रुकेंगे। खैर, पूरी दुनिया की नजरें अब तेहरान की अगली रणनीतिक चाल पर टिकी हैं। अब मोजतबा को यह तय करना है कि वह अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए 'महायुद्ध' का रास्ता चुनेंगे या फिर देश को विनाश से बचाने के लिए कूटनीति का सहारा लेंगे। करीब चार दशक तक अयातुल्ला अली खामेनेई ईरान के सिस्टम का चेहरा रहे। उन्होंने देश की अंदरूनी और बाहरी राजनीति पर अपना पूरा कंट्रोल रखा। उनकी मौजूदगी ही ईरान की सियासत की दिशा तय करती थी। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। अमरीका-इजरायल हमले में उनकी मौत के बाद सत्ता के गलियारों में हलचल तेज है। सवाल सिर्फ नए चेहरे का नहीं, बल्कि उस राह का भी है जिस पर ईरान आगे बढ़ेगा।
इस बात में दम है कि खामेनेई की मौत से ईरान की वर्तमान सरकार का तंत्र पूरी तरह ध्वस्त तो नहीं होगा, लेकिन यह फिर कभी पहले जैसा भी नहीं हो पाएगा। खामेनेई ने अपनी जिंदगी में हमेशा पश्चिम और खासतौर से अमरीका को अविश्वास की निगाह से देखा। इसलिए उनके बाद बदलाव आना तय है। इतना तो साफ है कि ईरान के खाड़ी देशों पर हमलों ने इन देशों की तेहरान के साथ सावधानीपूर्ण और संतुलित संबंध बनाए रखने की नीति को भारी हानि पहुंचाई है। खाड़ी देशों की इजरायल के साथ व्यापक सुरक्षा साझेदारी की संभावनाओं के मार्ग को प्रशस्त किया है। यदि ईरान खाड़ी देशों में अपने हमलों को नहीं रोकता तो नि:संदेह बाकी के खाड़ी देश भी इस तरह का कदम उठा सकते हैं। इतना ही नहीं, यदि ईरान खाड़ी देशों में अपने कैम्पेन को बढ़ाता है तो खाड़ी देशों के साथ एक व्यापक सैन्य संघर्ष की स्थिति भी बन सकती है। इसमें संदेह नहीं है कि खाड़ी देशों पर ईरान के हमलों ने तेहरान के पश्चिम एशियाई क्षेत्र में कूटनीतिक रूप से और अधिक अलग-थलग पडऩे की संभावनाओं को बढ़ा दिया है। वहीं दूसरी तरफ इन हालात में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती इजरायल-ईरान के बीच कूटनीतिक संतुलन बैठाना होगा।
इजरायल हमारा बड़ा रक्षा भागीदार है जबकि ईरान क्षेत्रीय संपर्क की दृष्टि से अहम है। खाड़ी और मध्य पूर्व में करीब 90 लाख भारतीय रहते हैं। भारत को मिलने वाली कुल विदेशी मुद्रा का लगभग 38 फीसदी हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। भारत अपनी लगभग 60 फीसदी ऊर्जा जरूरत इसी क्षेत्र से आयात करता है। यहां की स्थितियां भारत के लिए कूटनीतिक और आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण हैं। भारत के ईरान से ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध रहे हैं। अब नए नेतृत्व के साथ तालमेल बैठाना भी एक बड़ी कूटनीतिक परीक्षा होगी। मोजतबा के लिए भविष्य की राह आसान नहीं है। उनके सामने जर्जर बुनियादी ढांचा, कड़े आर्थिक प्रतिबंध, आंतरिक विरोध और क्षेत्रीय अस्थिरता जैसी बड़ी बाधाएं हैं। मोजतबा को एक ऐसे नेता के रूप में जाना जाता है जो शायद ही कभी सार्वजनिक रूप से दिखाई देते हैं या इंटरव्यू देते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि उनकी यह रहस्यमयी छवि उन्हें एक चतुर रणनीतिकार बनाती है जो पर्दे के पीछे से जटिल गठबंधन बनाने में माहिर है। मोजतबा जहां एक तरफ प्रतिरोध के स्तंभ माने जाते हैं, वहीं वह जानते हैं कि कूटनीति के क्षेत्र में कभी-कभी कट्टरपंथी विचारधारा को व्यावहारिक समझौतों के सामने झुकना पड़ता है। अमरीका और इजरायल के साथ तनावपूर्ण संबंधों के बीच उन्हें संघर्ष और बातचीत के बीच एक बारीक संतुलन बनाना होगा।
कुल मिलाकर, खामेनेई की मौत केवल ईरान की नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र और दुनिया की राजनीति को बदल सकती है। ऐसे में आने वाले दिन निर्णायक साबित होंगे। यही वजह है कि अयातुल्ला अली खामेनेई के बाद अब पूरी दुनिया की नजर तेहरान पर टिकी हुई है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि मोजतबा सुप्रीम लीडर बने रहेंगे या नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या ईरान की नीतियां बदलेंगी या फिर वही पुराना टकराव जारी रहेगा। खैर, ईरान की शासन व्यवस्था में क्या बदलाव आएगा, यह तो वक्त ही बताएगा।