विस्तार के बाद अब सामूहिक सामथ्र्य साबित करने की परीक्षा
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Gulab Kothari Article : वर्तमान भौतिकवादी परिवेश में संस्कार शब्द भी मात्र उपकरण रह गया। भोग संस्कृति में उलझे समाज व परिवार में मर्यादाओं का बंधन टूट गया। ऐसी विकट परिस्थितियों में संतान को जीवन मूल्यों व संस्कारों का पाठ पढ़ाना असंभव लगने लगा है। उनको माता-पिता और गुरुजनों की सीख अब बेमानी लगने लगी है। मोबाइल और टैब उनको जीवन के मंत्र सिखा रहे हैं। आज मानव-ज्ञान पर यह मशीनी-ज्ञान भारी हो गया।