काबुल के मलबे में दबी कराहें सिर्फ अफगानिस्तान की नहीं, पूरी दुनिया की परीक्षा ले रही हैं। काबुल की सड़कों पर पसरा मातम और मलबे में दबी मरीजों की चीखें न्याय की गुहार लगा रही हैं।
काबुल से आई हृदयविदारक खबरें केवल एक सैन्य कार्रवाई की सूचना नहीं हैं, बल्कि तथाकथित आधुनिक सभ्यता के माथे पर गहरा कलंक है। काबुल की हवाओं में घुला धुआं सिर्फ बारूद का नहीं है, वह उस इंसानियत के जलने की गंध है, जिसे पाकिस्तान ने एक बार फिर रौंद दिया है। रमजान के पवित्र महीने में, जब इस्लाम सब्र और अमन की सीख देता है, तब मासूमों पर बम गिराना किसी भी तर्क से कार्रवाई नहीं, बल्कि खुली दरिंदगी है। यह हमला सीमाओं से आगे बढ़कर मानवता की आत्मा पर वार है।
जिस नशामुक्ति अस्पताल पर मिसाइलें दागी गईं, वह कोई छिपा हुआ सैन्य अड्डा नहीं था, बल्कि टूटती जिंदगियों को संभालने का सहारा था। वहां मौजूद मरीज, डॉक्टर और कर्मचारी किसी युद्ध का हिस्सा नहीं थे, लेकिन उन्हें मौत के हवाले कर दिया गया। यह कॉलेटरल डैमेज नहीं, बल्कि जानबूझकर किया गया अमानवीय अपराध है। अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून साफ कहते हैं कि अस्पतालों और नागरिक ठिकानों को निशाना बनाना युद्ध अपराध है। यहां तो हर मर्यादा को ठोकर मारी गई। यह घटना पाकिस्तान के उस दोहरे चरित्र को भी बेपर्दा करती है, जिसमें एक तरफ शांति की बातें होती हैं और दूसरी तरफ खून की नदियां बहाई जाती हैं। पाकिस्तान अपनी आतंरिक विफलताओं को छिपाने के लिए हमेशा से ही सीमापार हिंसा का सहारा लेता रहा है।
दशकों से पनपती उसकी नीति-आतंक को साधन बनाकर रणनीतिक बढ़त हासिल करना ही रही है। यह बात अब किसी से छिपी नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार निशाना सीधे एक अस्पताल एवं निरीह मरीज बने और पाकिस्तान का बहाना भी कमजोर पड़ गया। इस मामले में भारत की कड़ी प्रतिक्रिया इस पूरे घटनाक्रम में एक स्पष्ट नैतिक रेखा खींचती है। भारत ने न सिर्फ इस हमले की निंदा की, बल्कि यह भी रेखांकित किया कि निर्दोषों का खून किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं हो सकता। यह वही दृष्टिकोण है जो एक जिम्मेदार शक्ति को भीड़ से अलग करता है-जहां सिद्धांत, सुविधा से ऊपर होते हैं। बहरहाल, पाकिस्तान का यह जघन्य आक्रामक कृत्य अफगानिस्तान की संप्रभुता पर भी सीधा हमला है। क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए गंभीर खतरा तो है ही। काबुल के मलबे में दबी कराहें सिर्फ अफगानिस्तान की नहीं, पूरी दुनिया की परीक्षा ले रही हैं। काबुल की सड़कों पर पसरा मातम और मलबे में दबी मरीजों की चीखें न्याय की गुहार लगा रही हैं।
यह समय केवल प्रतिक्रियाएं देने का नहीं, बल्कि पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर जवाबदेह ठहराने और आर्थिक-राजनयिक प्रतिबंधों से घेरने का है। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र और अन्य विश्व शक्तियां आज लगभग हर युद्ध में तटस्थ और मौन हैं। इस जघन्य वारदात पर भी चुप्पी उनकी भूमिका पर सवाल खड़ा करती है। यदि विश्व शक्तियां इस कायराना हरकत पर चुप रह गईं तो इतिहास उन्हें भी इस नरसंहार का भागीदार मानेगा।