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संपादकीय : जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाएं सोशल मीडिया कंपनियों को

इटली में एक बारह वर्ष की बच्ची की मौत के बाद इस बच्ची के परिवार समेत कई परिवारों ने मेटा व टिकटॉक के खिलाफ सामूहिक मुकदमा दायर कर आरोप लगाया है कि इन प्लेटफॉम्र्स के एल्गोरिद्म नाबालिगों को अवसाद और आत्म-नुकसान से जुड़ी प्रवृत्ति की ओर धकेलते हैं। दुनिया में कमोबेश सब जगह अभिभावकों की यह चिंता एक जैसी है। भारत जैसे देश में तो यह चिंता और भी इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि यहां डिजिटल पहुंच जिस तेजी से बढ़ी है, उसके मुकाबले डिजिटल अनुशासन की बात अभी दूर की कौड़ी साबित हो रही है।
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Jun 19, 2026
Mobile addiction in Child ren
Image: Perplexity

दुनिया भर में किए गए वैज्ञानिक अध्ययनों से यह बात साबित हुई है कि सोशल मीडिया पर अधिक बने रहने की लत व्यक्ति में चिंता, अवसाद, नींद व आत्मविश्वास की कमी और आत्मघाती प्रवृत्तियां बढ़ाने वाली साबित हो रही हैं। इटली में एक बारह वर्ष की बच्ची की मौत के बाद इस बच्ची के परिवार समेत कई परिवारों ने मेटा व टिकटॉक के खिलाफ सामूहिक मुकदमा दायर कर आरोप लगाया है कि इन प्लेटफॉम्र्स के एल्गोरिद्म नाबालिगों को अवसाद और आत्म-नुकसान से जुड़ी प्रवृत्ति की ओर धकेलते हैं। दुनिया में कमोबेश सब जगह अभिभावकों की यह चिंता एक जैसी है। भारत जैसे देश में तो यह चिंता और भी इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि यहां डिजिटल पहुंच जिस तेजी से बढ़ी है, उसके मुकाबले डिजिटल अनुशासन की बात अभी दूर की कौड़ी साबित हो रही है।
सब जानते हैं कि तकनीक ने हर आयु वर्ग के लिए सीखने के नए अवसर पैदा किए हैं। लेकिन यही तकनीक जब स्वास्थ्य समस्याओं को साथ लेकर आने वाली हो तो इटली के परिवारों जैसा दर्द सामने आना स्वाभाविक है। सोशल मीडिया का मानसिक सेहत पर विपरीत असर क्यों पड़ता है? इस सवाल का जवाब एल्गोरिद्म में छिपा है। सोशल मीडिया कंपनियां अपने एल्गोरिद्म को इस तरह से डिजाइन करती हैं ताकि लोग उनके प्लेटफॉर्म पर ज्यादा से ज्यादा समय तक स्क्रॉल करते रहें। मकसद एक ही है, यूजर को अधिक से अधिक समय तक इंगेज रखने का। उपयोगकर्ता के मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण की परवाह कम और कमाई का जरिया ज्यादा बन गए हैं ये एल्गोरिद्म। इसी के चलते बच्चों को लेकर तो अभिभावकों की यही चिंता नजर आती है कि वे घर में मौजूद तो हैं पर परिवार के साथ नहीं। वह इसलिए कि अभिभावक खुद बच्चों के हाथों में स्मार्टफोन थमा रहे हैं। ये स्मार्टफोन किसी मासूम के हाथों में धारदार वस्तु पहुंचने जैसे हैं। इसी चिंता को देखते हुए इटली में मुकदमा दायर करने वाले परिवार सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स पर नाबालिगों की पहुंच को नियंत्रित करने, जोखिमों की स्पष्ट चेतावनी देने व बच्चों के लिए सुरक्षित प्लेटफॉर्म की मांग कर रहे हैं। टेक कंपनियां भले ही दावा करें कि वे हानिकारक सामग्री हटाने व अभिभावकों को निगरानी के बेहतर साधन उपलब्ध कराने का काम कर रहे हैं लेकिन इन प्रयासों की कछुआ चाल समस्याएं बढ़ाने वाली ही हैं। अब तो एआइ जनित सामग्री के दुरुपयोग का खतरा भी बढ़ गया है।
दुनिया भर में सोलह वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की चर्चा के बीच कुछ देशों ने तो इस बाबत कानून भी बनाए हैं। सवाल इस बात का है कि क्या ऐसे प्रतिबंध ही पर्याप्त हैं? वह इसलिए भी कि सोशल मीडिया मंचों पर आयु सत्यापन करने की पुख्ता व्यवस्था अभी तक नहीं हो पाई है। सोशल मीडिया कंपनियों को तो जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाना ही है, अभिभावक भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।

Updated on:
19 Jun 2026 05:13 pm
Published on:
19 Jun 2026 05:13 pm