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अधूरी कॉपी का बड़ा सवाल, बच्चों पर कितना दबाव?

छोटी कक्षाओं में बच्चे अभी पढऩे-लिखने की आदत और अपने काम को व्यवस्थित करने की समझ विकसित कर रहे होते हैं। फिर भी कई बार अधूरी कॉपी को बच्चे की लापरवाही मान लेना सबसे आसान निष्कर्ष होता है। विशाखापट्टनम के एक निजी स्कूल में छह वर्षीय बच्चे की कक्षा में गिरने और बाद में हुई मौत की घटना के बाद सामने आए आरोपों ने इस सवाल को फिर सामने ला दिया है।
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जयपुर

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Neeru Yadav

Aug 26, 2026

Teacher

डॉ. शिवम भारद्वाज

स्कूल में होमवर्क अधूरा रह जाना कोई असाधारण बात नहीं है। छोटी कक्षाओं में बच्चे अभी पढऩे-लिखने की आदत और अपने काम को व्यवस्थित करने की समझ विकसित कर रहे होते हैं। फिर भी कई बार अधूरी कॉपी को बच्चे की लापरवाही मान लेना सबसे आसान निष्कर्ष होता है। विशाखापट्टनम के एक निजी स्कूल में छह वर्षीय बच्चे की कक्षा में गिरने और बाद में हुई मौत की घटना के बाद सामने आए आरोपों ने इस सवाल को फिर सामने ला दिया है। घटना की परिस्थितियों और मृत्यु के कारणों की जांच हो रही है, इसलिए अंतिम निष्कर्ष उसी के आधार पर निकलेगा। यह उस तरीके से जुड़ा है, जिससे हम बच्चों से पढ़ाई की अपेक्षा करते हैं और उनकी वास्तविक परिस्थितियों को समझते हैं।
स्कूल में होमवर्क अधूरा रह जाना कोई असाधारण बात नहीं है। छोटी कक्षाओं में बच्चे अभी पढऩे-लिखने और अपने काम को व्यवस्थित करने की आदत विकसित कर रहे होते हैं। समस्या यह है कि आज का होमवर्क कई बार उस अभ्यास से आगे निकल जाता है, जिसे बच्चा अपने दम पर कर सके। किसी प्रोजेक्ट के लिए सामग्री, इंटरनेट, प्रिंटआउट या घर के किसी बड़े की मदद चाहिए होती है। ऐसे में बच्चे के नाम पर दिया गया काम कई बार परिवार के समय, जानकारी और संसाधनों पर भी निर्भर करता है। लेकिन हर परिवार में ये चीजें समान नहीं होतीं—कहीं माता-पिता के पास बच्चे के साथ बैठने का समय है, कहीं दोनों काम करते हैं, कहीं घर में पढ़ाई के लिए अलग जगह और जरूरी साधन हैं, कहीं नहीं, कहीं माता-पिता बच्चे की पढ़ाई में सहजता से मदद कर सकते हैं, कहीं वे स्वयं उस स्तर की पढ़ाई से परिचित नहीं। इसलिए एक ही काम सभी बच्चों को देना भले समानता लगे, उसे पूरा करने की उनकी परिस्थितियां समान नहीं होतीं। अधूरी कॉपी को सीधे बच्चे की लापरवाही मान लेना इसी फर्क को अनदेखा करना है। शिक्षा में असमानता कई बार अंक या फीस में नहीं, उस अदृश्य मदद में होती है जो कुछ बच्चों को घर पर सहज रूप से मिल जाती है और कुछ को नहीं।
बच्चे के काम और उसकी परिस्थिति के बीच का यह फर्क अनुशासन की हमारी पुरानी समझ पर भी सवाल उठाता है। भारतीय समाज में शिक्षक का अधिकार लंबे समय तक लगभग निर्विवाद माना गया। ‘हमारे समय में भी शिक्षक मारते थे’ जैसी बातें आज भी इस स्मृति को जीवित रखती हैं। लेकिन किसी व्यवहार का पुराना होना उसे शिक्षा का उचित तरीका नहीं बनाता। शिक्षा के अधिकार कानून की धारा 17 बच्चों को शारीरिक दंड और मानसिक उत्पीडऩ से संरक्षण देती है। कानून ने अपनी सीमा स्पष्ट कर दी है, असली सवाल उस सामाजिक सोच का है, जिसमें कठोरता को अब भी कभी-कभी प्रभावी शिक्षा का पर्याय समझ लिया जाता है।
शिक्षक की स्थिति को भी इसी संदर्भ में देखने की जरूरत है। बच्चे उसकी बात मानें और दिया हुआ काम समय पर पूरा करें उसकी भूमिका का एक अंश मात्र हो सकता है लेकिन उसकी बड़ी भूमिका यह है कि वह बच्चे को गलती के बाद भी सीखने की स्थिति में बनाए रखे। कक्षा को नियंत्रित करना और कक्षा में सीखने का वातावरण बनाना एक ही बात नहीं है। पहला काम डर से भी हो सकता है, दूसरा भरोसे के बिना संभव नहीं।
बच्चे की सीखने की प्रक्रिया में गलती कोई अपवाद नहीं है। गलत उत्तर, अधूरा काम, ध्यान का भटकना या किसी बात को समझने में अधिक समय लगना खासकर छोटी उम्र में उसी प्रक्रिया का हिस्सा है। शुरुआती स्तर पर बच्चा समय को व्यवस्थित करना, निर्देश समझना, ध्यान टिकाना और जिम्मेदारी लेना सीख रहा होता है। उससे इन क्षमताओं का पूरी तरह विकसित रूप मांगना उस प्रक्रिया को उलट देना है, जिसके लिए वह स्कूल में आया है। शिक्षक का काम केवल यह देखना नहीं कि बच्चे ने अपेक्षित उत्तर दिया या नहीं, उसके सामने यह समझने की चुनौती भी है कि वह उत्तर तक क्यों नहीं पहुंच पाया।
किसी विद्यालय की गुणवत्ता को केवल परीक्षा परिणाम, इमारत या तकनीकी सुविधाओं से समझना पर्याप्त नहीं है। स्कूल का वास्तविक वातावरण उस बच्चे के साथ उसके व्यवहार में भी दिखाई देता है जिसका काम पूरा नहीं है, जिसे उत्तर नहीं आता या जिसे किसी बात को समझने में बाकी बच्चों से अधिक समय लगता है। अच्छे परिणाम देने वाले बच्चों के साथ सहज होना कठिन नहीं है। असली परीक्षा उस बच्चे के सामने होती है जो अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर रहा। घर भी इस पूरी व्यवस्था से अलग नहीं है। बच्चों का दिन स्कूल, होमवर्क, ट्यूशन, प्रोजेक्ट, प्रतियोगिताओं और दूसरी गतिविधियों में बंटता जा रहा है। माता-पिता चाहते हैं कि बच्चा पीछे न रह जाए, उसका काम पूरा हो और उसके अंक अच्छे आएं। यह चिंता स्वाभाविक है, लेकिन इसी कोशिश में बचपन और उपलब्धि के बीच की दूरी कभी-कभी कम होती जाती है। जब बच्चे का हर काम किसी परिणाम में बदलने लगे तो सीखने की वह जगह छोटी पड़ सकती है, जिसमें वह बिना किसी तात्कालिक उपलब्धि के भी कुछ खोजता, भूलता और फिर कोशिश करता है। शिक्षा की सबसे बड़ी कठिनाई शायद यही है उसका पूरा अर्थ माप में नहीं आता। कॉपी पूरी है या नहीं, अंक कितने हैं, प्रोजेक्ट कैसा बना है- इनका हिसाब रखा जा सकता है। यह आसानी से नहीं मापा जा सकता कि बच्चा अपनी गलती के बाद फिर सवाल पूछने को तैयार है या नहीं, वह शिक्षक के सामने अपनी असमझ स्वीकार कर सकता है या नहीं और स्कूल से लौटते समय उसके भीतर सीखने की इच्छा बची हुई है या नहीं। घटना की जांच जिस निष्कर्ष तक पहुंचेगी, उसके आधार पर जिम्मेदारी तय होगी। उससे जुड़े तथ्य भी उसी प्रक्रिया से स्पष्ट होंगे। लेकिन उसके बहाने उठे सवाल इससे बड़े हैं। हम बच्चों से क्या चाहते हैं और क्या हमने पर्याप्त रूप से यह सोचा है कि उस उम्र में वे वास्तव में क्या कर सकते हैं—शिक्षा की बहस का एक जरूरी हिस्सा यही होना चाहिए। होमवर्क की अपनी जगह है और पढ़ाई में नियमितता भी जरूरी है, लेकिन इनका अर्थ तभी है जब वे बच्चे को सीखने के करीब ले जाएं। छह साल की उम्र में अधूरी कॉपी शिक्षा की एक छोटी समस्या हो सकती है, उस अधूरी कॉपी के कारण बच्चा स्कूल से डरने लगे, तो समस्या कहीं बड़ी है।