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गवर्नमेंट-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल से ही एआइ क्रांति संभव

निजी प्रयासों को नीति समर्थन, डेटा अवसंरचना और सार्वजनिक उपयोग के साथ जोड़ा जाए तो भारत वैश्विक एआइ नेतृत्व की दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। यह स्पष्ट संकेत है कि निजी स्टार्टअप्स को डेटा एक्सेस, सार्वजनिक डिजिटल प्लेटफॉर्म और सरकारी खरीद नीति के माध्यम से विस्तार दिया जाए तो वे वैश्विक स्तर पर नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकते हैं।

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Mar 05, 2026

डॉ. सचिन बत्रा - वरिष्ठ पत्रकार एवं तकनीकी विशेषज्ञ

भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब केवल तकनीकी शब्द नहीं है बल्कि यह निजी क्षेत्र की अभिनव सोच और सरकार के समर्थन से राष्ट्रीय विकास की एक महत्वपूर्ण शक्ति बन चुका है। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय स्टार्टअप्स और निजी कंपनियों ने एआइ आधारित समाधान विकसित किए हैं जो स्वास्थ्य सेवा, भाषा तकनीक, शिक्षा, सुरक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर और अन्य कई क्षेत्रों में गहरा प्रभाव डाल रहे हैं। इस विकास ने स्पष्ट कर दिया है कि जब निजी नवाचार सरकारी समर्थन के साथ मिलकर काम करता है तो वह समाज और अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है।

भारत के निजी क्षेत्र में एआइ तकनीक सिर्फ प्रयोगात्मक स्तर पर नहीं, बल्कि व्यावसायिक और सामाजिक स्तर पर बड़े पैमाने पर अपनाई व अमल में लाई जा रही है। उदाहरण के लिए सर्वम एआइ जैसी भारतीय कंपनी ने अपने स्वदेशी भाषा-आधारित बड़े भाषा मॉडल (एलएलएम) विकसित किए हैं जो भारतीय भाषाओं के अनुकूल हैं और 30 अरब से 105 अरब के मॉडल लॉन्च कर चुकी है। जिससे स्थानीय भाषा आधारित संवाद और समाधान संभव हुआ है। यह पहल भारत को वैश्विक एआइ मानचित्र पर एक स्वतंत्र और सशक्त स्थान दिलाने की दिशा में अग्रसर है। गौरतलब है कि यह मॉडल स्थानीय डेटा और भाषाई विविधता को समाहित करता है। देखा जाए तो भारत पहले भी ऐसा नेतृत्व देख चुका है। जब आधार की कल्पना की गई थी तब नंदन नीलेकणि ने उद्योग, संसद और प्रेस में आलोचनाओं का जवाब दिया और इसे अरबों लोगों तक पहुंचाया। 'आधार' केवल सॉफ्टवेयर नहीं था बल्कि एक मजबूत नेतृत्व का परिणाम था।

हालांकि भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का विस्तार अब केवल सरकारी योजनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि निजी कंपनियों, स्टार्टअप्स और व्यक्तिगत नवाचारों के माध्यम से तेजी से व्यावसायिक और सामाजिक प्रभाव उत्पन्न कर रहा है। पिछले पांच वर्षों में भारतीय एआइ स्टार्टअप इकोसिस्टम ने उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है। नेसकॉम की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 3 हजार से अधिक एआइ स्टार्टअप सक्रिय हैं और एआइ आधारित समाधान के बाजार का आकार 2027 तक 17 बिलियन डॉलर से अधिक होने का अनुमान है। यह आंकलन इंगित करता है कि यदि इन निजी प्रयासों को नीति समर्थन, डेटा अवसंरचना और सार्वजनिक उपयोग के साथ जोड़ा जाए तो भारत वैश्विक एआइ नेतृत्व की दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। भारत के निजी एआइ नवाचारों में कुछ स्टार्टअप विशेष रूप से उच्च व्यावसायिक क्षमता और सामाजिक उपयोगिता के कारण उल्लेखनीय माने जा सकते हैं। जैसे कि 'कृत्रिम' नामक एआइ विकल्प भारतीय भाषाओं पर आधारित बड़े भाषा मॉडल विकसित कर रहे हैं। इसका लक्ष्य स्थानीय भाषाओं में एआइ समाधान उपलब्ध कराते हुए डिजिटल समावेशन को बढ़ाना है। यदि इस मॉडल को सरकारी सेवाओं, ई-गवर्नेंस और ग्रामीण डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाए तो करोड़ों नागरिकों तक सूचना पहुंचाना सहज हो सकता है।

इसी प्रकार स्वास्थ्य क्षेत्र में 'क्योर.एआइ' और 'निरामई' हैल्थ एनालिटिक्स जैसे स्टार्टअप एआइ आधारित रोग पहचान तकनीकों पर कार्य कर रहे हैं। खास बात यह है कि इसकी रेडियोलॉजी एआइ तकनीक 70 से अधिक देशों में उपयोग की जा रही है। जबकि निरामई का थर्मल एआइ समाधान स्तन कैंसर की शुरुआती पहचान में उपयोगी साबित हुआ है। उल्लेखनीय है कि वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम ने निरामई को हेल्थ-टेक इनोवेशन के उदाहरण के रूप में सूचीबद्ध किया है। यदि इन तकनीकों को भारत सरकार के आयुष्मान भारत कार्यक्रम के साथ एकीकृत किया जाए तो ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में व्यापक सुधार की असीम संभावनाएं हैं। वहीं बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप का दावा है कि एआइ आधारित उत्पादकता वृद्धि से भारत की जीडीपी में 1.3 प्रतिशत की अतिरिक्त वार्षिक वृद्धि संभव है। यह स्पष्ट संकेत है कि निजी स्टार्टअप्स को डेटा एक्सेस, सार्वजनिक डिजिटल प्लेटफॉर्म और सरकारी खरीद नीति के माध्यम से विस्तार दिया जाए तो वे वैश्विक स्तर पर नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकते हैं।

कुल मिलाकर सरकारी नेतृत्व में निजी भागीदारी के 'जीपीपी' यानी गवर्नमेंट प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल से भारतीय एआइ का नया रोडमैप तैयार किया जा सकता है। यह रोडमैप बड़े डेटा केंद्र, स्थानीय मॉडल, बहुभाषिक समाधान और सामाजिक समस्याओं के लिए एआइ आधारित विकल्पों के लघु प्रयासों को राष्ट्रीय स्तर पर विकसित ही नहीं बल्कि देश के वैश्विक नेतृत्व का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। यह जीपीपी मॉडल आने वाले समय में 'गुड प्रोग्रेस विद प्रोस्पेरिटी' के लक्ष्य को हासिल करते हुए देश में निजी कंपनियों के विस्तार सहित भारत को 'ग्लोबल एआइ लीडर' बना सकता है।

Published on:
05 Mar 2026 01:41 pm
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