
रजत मिश्रा, (लेखक एवं शोधार्थी)
भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की आगामी बैठक हाल के वर्षों में सबसे चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है। दबाव हर तरफ से है, अमरीका-ईरान संघर्ष के बाद बढ़ती कच्चे तेल की कीमतें, कमजोर रुपया, महंगाई और खराब मानसून की आशंका, विदेशी निवेश में अस्थिरता तथा बॉन्ड यील्ड्स में तेज उछाल।
इस पूरी चुनौती के केंद्र में कच्चा तेल है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 फीसदी तेल आयात करता है। ऐसे में पश्चिम एशिया में कोई भी तनाव सीधे भारत के आयात बिल को बढ़ा देता है। तेल महंगा होने पर डॉलर की मांग बढ़ती है, जिससे रुपए पर दबाव आता है। रुपए की यह कमजोरी भारतीय अर्थव्यवस्था की वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले कमजोर स्थिति को दर्शाती है। पिछले कुछ वर्षों में आरबीआइ ने रुपए में अचानक गिरावट रोकने के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार से लगातार डॉलर बेचे हैं।
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार फिलहाल लगभग 660 (फरवरी में 728) अरब डॉलर के आसपास है, जो करीब 10-11 महीने के आयात को कवर करने के लिए पर्याप्त माना जाता है। भारत का बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार विदेशी निवेश के जरिए आता है, यानी यह संपत्ति नहीं देनदारी है। एक तो आपको लाभ सहित पैसा लौटाना भी है और अगर निवेशकों का भरोसा डिगा या कहीं और बेहतर अवसर दिखे तो वे वैसे भी निकाल लेंगे। चार महीनों में दो लाख करोड़ की निकासी के साथ, विदेशी संस्थागत निवेशक कोरिया, चीन, ताइवान (एआइटेक) या फिर अमरीकी सरकारी बॉन्ड (सुरक्षित निवेश) की तरफ जा रहे हैं। कमजोर रुपया इस समस्या को और बढ़ा देता है। अगर किसी अमरीकी निवेशक को भारतीय बाजार में 10 फीसदी रिटर्न मिलता है, लेकिन उसी दौरान रुपया 5 फीसदी कमजोर हो जाता है। अगर निवेशकों को आगे और गिरावट की आशंका हो, तो वे नया निवेश करने से भी बच सकते हैं।
नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढिय़ा ने हाल ही कहा कि जरूरत पडऩे पर 'रुपए को 100 प्रति डॉलर से नीचे जाने देना चाहिए।' अनेकों अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि रुपए को बचाने के लिए अरबों डॉलर विदेशी मुद्रा भंडार से खर्च करना लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि अनियंत्रित गिरावट आयातित महंगाई बढ़ा सकती है, ईंधन को महंगा कर सकती है और विदेशी निवेशकों का भरोसा कमजोर कर सकती है। अगर आयातकों को लगता है कि रुपया आगे और कमजोर होगा, तो वे ज्यादा डॉलर पहले ही खरीदने लगते हैं।
इससे डॉलर की मांग और बढ़ती है तथा रुपया और कमजोर होता है। दूसरी तरफ, निर्यातक बेहतर विनिमय दर की उम्मीद में डॉलर भारत लाने में देरी कर सकते हैं। इससे बाजार में डॉलर की उपलब्धता कम हो जाती है और दबाव और बढ़ जाता है। आरबीआइ की चुनौती इसलिए और कठिन हो गई है क्योंकि महंगाई की चिंता, भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ते वित्तीय घाटे ने वैश्विक बॉन्ड यील्ड्स को ऊपर धकेल दिया है। बॉन्ड यील्ड बढऩे का मतलब है कि लोग बाजार से पैसा निकालकर सुरक्षित बॉन्ड में लगाते हैं। सरकार के लिए उधार लेना महंगा होता है, जिसके बाद बैंक भी होम लोन, कार लोन और बिजनेस लोन की ब्याज दरें बढ़ा देते हैं। केंद्र और राज्य सरकारें इसी संकट की आशंका में घिरी हैं। यही आरबीआइ का धर्मसंकट है।
यदि महंगाई रोकने और रुपए को बचाने लिए रेपो रेट (अभी 5.25 फीसदी) बढ़ाना पड़े तो घरेलू खपत, निवेश और आर्थिक विकास धीमा होगा और कर्ज महंगे होंगे। भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले बेहतर स्थिति में है और कटौती के बाद भी जीडीपी वृद्धि दर 6 फीसदी से ऊपर रहने का अनुमान है, लेकिन आर्थिक आधार उतना मजबूत नहीं है। यही वजह है कि आगामी बैठक सिर्फ ब्याज दरों का फैसला नहीं है।आरबीआइ एक साथ महंगाई, आर्थिक विकास, रुपए की स्थिरता, विदेशी निवेशकों के भरोसे और वित्तीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। कई मायनों में इसलिए आरबीआइ की सबसे बड़ी चुनौती भरोसा बनाए रखना है।