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विनय कौड़ा, (अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार)
अमरीकी राष्ट्रपति डॅानल्ड ट्रंप ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि उनकी विदेश नीति केवल चौंकाने वाली घोषणाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन को नए ढंग से परिभाषित करने की महत्त्वाकांक्षा से भी संचालित होती है। हाल ही ट्रंप द्वारा पाकिस्तान, सऊदी अरब, कतर, तुर्की, मिस्र और जॉर्डन जैसे मुस्लिम देशों से अब्राहम समझौतों में शामिल होने का सार्वजनिक आग्रह पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीति का स्पष्ट संकेत है। इस पहल ने पाकिस्तान को ऐसे चौराहे पर ला खड़ा किया है, जहां उसके सामने मौजूद लगभग हर विकल्प अपने साथ जोखिम और असहजता लेकर आता है। पाकिस्तान की समस्या यह नहीं है कि वह अमरीकी दबाव को समझ नहीं रहा। उसकी वास्तविक समस्या यह है कि उसकी दशकों पुरानी विदेश नीति, घरेलू राजनीतिक यथार्थ और आर्थिक विवशताएं अब एक-दूसरे के विरोध में खड़ी दिखाई दे रही हैं। यही कारण है कि ट्रंप की यह पहल पाकिस्तान के लिए अवसर से अधिक संकट का संकेत बनती जा रही है। दरअसल, अब्राहम समझौता केवल इजरायल और कुछ अरब देशों के बीच संबंधों के सामान्यीकरण का प्रयास नहीं हैं।
वे उस नए रणनीतिक ढांचे का हिस्सा हैं, जिसके माध्यम से अमरीका, इजरायल और खाड़ी देश पश्चिम एशिया की नई सुरक्षा एवं आर्थिक संरचना गढऩा चाहते हैं। संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मोरक्को और सूडान पहले ही इस व्यवस्था का हिस्सा बन चुके हैं, जबकि सऊदी अरब पर भी समय-समय पर इस दिशा में आगे बढऩे का दबाव दिखाई देता रहा है। ऐसे परिदृश्य में पाकिस्तान की स्थिति अत्यंत जटिल हो गई है। एक ओर वह स्वयं को मुस्लिम जगत की आवाज के रूप में प्रस्तुत करता रहा है और फिलिस्तीनी मुद्दे को अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता का हिस्सा मानता है। दूसरी ओर उसकी अर्थव्यवस्था विदेशी सहायता, खाड़ी देशों के निवेश और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की कृपा पर काफी हद तक निर्भर है। यही अंतर्विरोध आज उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक कमजोरी बन गया है। ट्रंप के हालिया वक्तव्य के बाद पाकिस्तानी नेतृत्व ने दोहराया है कि स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना से पहले इजरायल को मान्यता देने का प्रश्न ही नहीं उठता। किंतु यह रुख जितना स्पष्ट दिखाई देता है, व्यावहारिक राजनीति में उतना ही जटिल है।
पाकिस्तान को केवल इजरायल के प्रश्न से ही नहीं जूझना पड़ रहा, बल्कि उसे ईरान और अमरीका के बीच तनाव के बीच भी संतुलन साधना है। हाल के महीनों में जनरल आसिम मुनीर ने स्वयं को वाशिंगटन और तेहरान के बीच संवाद के माध्यम के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। ऐसे में यदि वह अमरीकी प्रस्तावों का समर्थन करता है, तो ईरान की नाराजगी मोल लेनी पड़ सकती है और यदि विरोध करता है तो वाशिंगटन के साथ निश्चित तौर पर उसके संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। पाकिस्तान की दुविधा को और गहरा करने वाला एक महत्त्वपूर्ण घरेलू कारक उसका इस्लामवादी राजनीतिक परिदृश्य है। फिलिस्तीन का प्रश्न पाकिस्तान में केवल विदेश नीति का मुद्दा नहीं, बल्कि धार्मिक और भावनात्मक संवेदनाओं से जुड़ा विषय है। जमात-ए-इस्लामी, तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) और अनेक धार्मिक संगठनों ने वर्षों से इजराइल के साथ किसी भी प्रकार के संबंधों का खुलकर विरोध किया है।
यदि इस्लामाबाद अब्राहम समझौतों की दिशा में कोई कदम बढ़ाता है, तो इसे फिलिस्तीनी मुद्दे के साथ विश्वासघात के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है, जिससे सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सामाजिक अस्थिरता बढऩे की आशंका रहेगी।
यही कारण है कि पाकिस्तान की कूटनीतिक गणनाएं केवल वाशिंगटन, रियाद या तेहरान से प्रभावित नहीं हो रही हैं, बल्कि उन्हें लाहौर, कराची और पेशावर की घरेलू राजनीतिक प्रतिक्रिया को भी ध्यान में रखना पड़ रहा है। इसके विपरीत भारत ने पिछले एक दशक में पश्चिम एशिया के लगभग सभी प्रमुख देशों के साथ संतुलित और बहुआयामी संबंध विकसित किए हैं। भारत के इजरायल के साथ रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में गहरे संबंध हैं, वहीं सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और ओमान के साथ आर्थिक, ऊर्जा और निवेश सहयोग निरंतर मजबूत हुआ है। उल्लेखनीय यह है कि भारत ने वैचारिक आग्रहों के बजाय व्यावहारिक कूटनीति को प्राथमिकता दी है।
यही कारण है कि आज भारत पश्चिम एशिया में एक विश्वसनीय, स्थिर और दीर्घकालिक साझेदार के रूप में देखा जाता है। इसके उलट पाकिस्तान की विदेश नीति लंबे समय तक प्रतिक्रियात्मक और सुरक्षा-केंद्रित दृष्टिकोण से संचालित होती रही है। उसने प्राय: अपनी क्षेत्रीय भूमिका को भारत-विरोध और इस्लामी राजनीतिक विमर्श के संदर्भ में परिभाषित किया है। परिणामस्वरूप बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच उसके विकल्प लगातार सीमित होते गए हैं।
पाकिस्तान की दूसरी बड़ी चुनौती चीन पर उसकी बढ़ती आर्थिक निर्भरता है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपेक) कभी विकास और समृद्धि का प्रतीक बताया गया था, किंतु आज पाकिस्तान भारी ऋण, कमजोर औद्योगिक वृद्धि और वित्तीय अस्थिरता से जूझ रहा है। यदि वह अमरीकी नेतृत्व वाले क्षेत्रीय ढांचे के निकट जाता है तो बीजिंग असहज होगा और यदि पूरी तरह चीन के साथ खड़ा रहता है तो पश्चिमी वित्तीय संस्थानों तथा अमरीकी समर्थन से दूरी बढ़ सकती है। यही रणनीतिक फंसाव उसकी विदेश नीति को अनिश्चित और अस्थिर बनाए हुए है।
Published on:
03 Jun 2026 04:28 pm
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