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Love Story : कभी रात में मजार से निकल सीमा तक जाते थे दो दीपक! आज भी बिंजौर में यहां प्रेमी जोड़े मांगते हैं मन्नत

Love Story : श्रीगंगानगर जिले के बिंजौर गांव में लैला-मजनू की मजार है, जहां प्रेमी जोड़ों की खास आस्था है। ग्रामीणों के अनुसार कभी रात में मजार से दो रहस्यमयी दीपक निकलकर सीमा तक जाते और सुबह लौट आते थे। तारबंदी से पहले पाकिस्तान से भी लोग यहां मन्नत मांगने आते थे, लेकिन अब यह सिलसिला बंद है। मजार का लैला-मजनू से जुड़ाव प्रमाणित नहीं है, फिर भी हर साल हजारों श्रद्धालु यहां मन्नत मांगने पहुंचते हैं। पूरी कहानी जानने के लिए पढ़िए युगलेश शर्मा की खास रिपोर्ट।
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Aug 24, 2026
Laila Majnu Story Love Story
लैला-मजनू की मजार से जुड़ी क्या है मान्यताएं, जानिए (Photo: Rajasthan Patrika)

Love Story : धोरों के बीच भारत-पाक सीमा के करीब एक ऐसा स्थान है, जहां प्रेम की कहानी इतिहास के प्रमाणों से नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही लोकमान्यता और लोगों की आस्था से जिंदा है। अनूपगढ़ के बिंजौर गांव स्थित लैला-मजनू की मजार पर हिंदू भी सिर झुकाते हैं और मुस्लिम भी दुआ मांगते हैं। यहां आने वालों में प्रेमी जोड़े ही नहीं, बल्कि संतान की कामना, पारिवारिक परेशानी और दूसरी मन्नतों के लिए पहुंचने वाले लोग भी शामिल हैं। राजस्थान पर्यटन विभाग भी बिंजौर की इस मजार को अपने आधिकारिक पर्यटन स्थलों में शामिल करता है और इसकी पहचान लैला-मजनू (Laila Majnu Love Story) की लोककथा से जुड़े स्मारक के रूप में बताता है।

सदियों पुरानी मानी जाती है प्रेम की कहानी

मजार से जुड़ी कहानी का कोई आधिकारिक ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। ग्रामीणों और मेला कमेटी से जुड़े लोगों की मान्यता है कि सिंध क्षेत्र से आए लैला-मजनू प्रेम में थे और परिवार के विरोध के कारण यहां आ पहुंचे। रेगिस्तान में प्यास से दोनों की मौत हो गई और बाद में उनकी याद में यहां मजार बनी। यही लोककथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही है। राजस्थान पर्यटन विभाग भी इसे स्पष्ट रूप से ‘किंवदंती’ के रूप में दर्ज करता है।

यहां प्यार ही नहीं, हर परेशानी लेकर आते हैं लोग

मजार पर सबसे ज्यादा आकर्षण प्रेमी जोड़ों का रहता है, लेकिन यहां आने वालों की आस्था इससे कहीं व्यापक है। ग्रामीणों के अनुसार लोग शादी, संतान और दूसरी मनोकामनाओं के लिए मन्नत मांगते हैं। हर वर्ष जून में यहां मेला लगता है, जिसमें आसपास के राज्यों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। राजस्थान पर्यटन विभाग भी मेले को मुख्य रूप से नवविवाहितों और जोड़ों को आकर्षित करने वाला बताता है।

सीमा बदली, मगर आस्था की राह नहीं

मजार की खासियत सिर्फ प्रेम की कहानी नहीं, बल्कि उसका सीमावर्ती चरित्र भी है। कभी तारबंदी से पहले पाकिस्तान की ओर से भी लोग यहां मन्नत मांगने आते थे। दोनों देशों के बीच तनाव और सीमाई व्यवस्थाएं कड़ी होने के बाद यह सिलसिला रुक गया। आज सरहद के इस तरफ मजार आस्था का केंद्र बनी हुई है।

ग्रामीणों के अनुसार यहां मेला और व्यवस्थाएं स्थानीय स्तर पर ही संभाली जाती हैं। मेला कमेटी में कोई मुस्लिम सदस्य नहीं होने के बावजूद मजार पर मुस्लिम श्रद्धालुओं की मौजूदगी रहती है। यही विरोधाभास इसे और अनूठा बनाता है, एक ऐसी जगह, जिसकी देखभाल स्थानीय हिंदू ग्रामीण करते हैं, लेकिन जहां धर्म की सीमा से ऊपर उठकर लोग माथा टेकते हैं।

बीएसएफ की चौकी का नाम भी ‘मजनू’

मजार से जुड़े स्थानीय लोगों के अनुसार सीमा सुरक्षा बल के जवानों की भी इस स्थान के प्रति आस्था और जुड़ाव रहा है। इसी क्रम में सीमा क्षेत्र की एक बीएसएफ चौकी का नाम ‘मजनू’ रखा गया है। मेला आयोजन के दौरान जवान व्यवस्थाओं में सहयोग भी करते हैं।

कभी दीपक और अब लोककथाओं का रहस्य

मजार से जुड़े पुराने सेवादारों के पास इससे जुड़ी कई रोचक कथाएं हैं। उनका दावा है कि 1960 के दशक में घग्घर में बाढ़ के दौरान चारों तरफ पानी भर जाने के बावजूद मजार तक पानी नहीं पहुंचा। वे रात में दो दीपक अपने आप जलने और बुझने की कहानी भी सुनाते हैं। एक अन्य लोककथा के अनुसार ये दीपक रात में सीमा तक जाते और सुबह मजार पर लौट आते थे। इन दावों का कोई वैज्ञानिक या ऐतिहासिक प्रमाण सामने नहीं है, लेकिन इन्हीं कथाओं ने मजार के प्रति कौतूहल और आस्था को बढ़ाया।

पर्यटन विभाग की सूची में जगह, लेकिन सुविधाओं की जरूरत

दिलचस्प यह है कि जिसे स्थानीय स्तर पर लंबे समय से पर्यटन की संभावनाओं वाला स्थल माना जाता रहा, वह अब राजस्थान पर्यटन की आधिकारिक वेबसाइट पर भी श्रीगंगानगर जिले के आकर्षणों में शामिल है। विभाग इसे अनूपगढ़ से 11 किलोमीटर दूर बिंजौर में स्थित बताता है।

इसके बावजूद ग्रामीणों का कहना है कि यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए पार्किंग, सड़क, ठहरने और मेले के दौरान यातायात जैसी सुविधाओं का विस्तार जरूरी है। वे बिंजौर और आसपास के क्षेत्र को सीमा पर्यटन, पुरातत्व और लोक-संस्कृति से जोड़कर विकसित करने की मांग करते हैं।

बिंजौर की यह मजार आखिरकार एक सवाल भी छोड़ती है…क्या किसी जगह को पर्यटन का आकर्षण बनने के लिए उसका इतिहास प्रमाणित होना जरूरी है, या पीढ़ियों से चली आ रही लोकआस्था, लोगों का जुड़ाव और सांस्कृतिक महत्व भी उसकी अपनी पहचान बना सकते हैं? यहां मौजूद मजारें शायद इसी सवाल का सबसे जीवंत जवाब हैं।

Updated on:
24 Aug 2026 05:12 pm
Published on:
24 Aug 2026 04:29 pm