
Cold Storage : मध्य प्रदेश की मंडियों में सोयाबीन यानी पीला सोना की आवक ने चमक बढ़ा दी है। लेकिन, खेतों में दिन-रात पसीना बहाकर उगाई जा रही अन्नदाता की उपज मंडी और थाली तक पहुंचने से पहले ही सिस्टम की नाकामी और बुनियादी ढांचे के अभाव में दम तोड़ रही है। संसद में पेश केंद्र सरकार की एक उच्चस्तरीय रिपोर्ट ने मध्य प्रदेश में कृषि उत्पादों की बर्बादी का सच बेपर्द कर दिया है। राज्य में तुड़ाई, कोल्ड स्टोरेज और सुरक्षित परिवहन के अभाव में अमरूद की करीब 15 फीसदी और टमाटर की 12 फीसदी फसल बाजार तक पहुंचने से पहले ही सड़ जाती है।
मध्य प्रदेश की आर्थिक रीढ़ मानी जाने वाली सोयाबीन (7.36%), प्याज और उड़द की फसलें भी भारी पोस्ट-हार्वेस्ट लॉस की शिकार हो रही हैं। टमाटर और प्याज की बर्बादी गुजरात से अधिक दर्ज हुई है। दूसरी ओर दूध का नुकसान सिर्फ 0.53% है। चौंकाने वाली बात यह कि इस बर्बादी को रोकने और फूड प्रोसेसिंग बढ़ाने के लिए मिलने वाले केंद्रीय बजट में भी मध्य प्रदेश को यूपी और महाराष्ट्र के मुकाबले आधा आवंटन ही नसीब हो पा रहा है।
संसद में प्रस्तुत नेबकॉन्स की सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदेश की 26 प्रमुख कृषि व उद्यानिकी फसलों का अध्ययन किया गया। कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग यूनिट्स की कमी के चलते फल-सब्जियों पर सबसे ज्यादा मार पड़ी है। अमरूद (14.93%) और टमाटर (11.85%) के अलावा प्याज में 8.11%, नीबू व संतरे में 7.4% तथा लौकी में 7.46% का नुकसान दर्ज हुआ है। तिलहन और दलहन फसलों की स्थिति भी चिंताजनक है। प्रदेश की मुख्य वाणिज्यिक फसल सोयाबीन में 7.36% और उड़द में 6.73% का नुकसान तुड़ाई के बाद हो रहा है। अरहर में 6.43%, मक्का में 6.3%, धनिया में 6.01%, चना में 5.85% और गेहूं में 4.94% की बर्बादी सामने आई है।
रिपोर्ट में राहत की बात यह रही कि प्रदेश का डेयरी नेटवर्क काफी मजबूत स्थिति में है। राज्य में दूध का पोस्ट-हार्वेस्ट नुकसान मात्र 0.53% दर्ज किया गया। इसके विपरीत लॉजिस्टिक्स और सुरक्षित परिवहन के अभाव में अंडों की सप्लाई चेन में 6.33% की टूट-फूट और बर्बादी दर्ज की गई है।
कटाई के बाद नुकसान के आंकड़ों में मध्यप्रदेश की स्थिति फसल के अनुसार बदलती रही है। टमाटर का नुकसान मप्र में आंध्रप्रदेश (12.36%) और ओडिशा (13.19%) से कम, लेकिन गुजरात (10.97%) और कर्नाटक (9.97%) से अधिक है। अमरूद में मप्र का नुकसान छत्तीसगढ़ (13.79%) से अधिक और बिहार (15.36%) व पश्चिम बंगाल (15.86%) से कम है। प्याज में मप्र (8.11%) महाराष्ट्र (6.78%) और गुजरात (7.57%) से ज्यादा है, जबकि कर्नाटक (8.70%) से कम है। सोयाबीन में मप्र (7.36%) का नुकसान राजस्थान (6.54%) और कर्नाटक (6.63%) से ज्यादा है। हालांकि महाराष्ट्र (8.84%) से बेहतर स्थिति में है।
उपज की बर्बादी रोकने और फूड प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना के तहत मध्य प्रदेश का बजट बढ़ाकर 62.16 करोड़ रुपए कर दिया गया है। 2021-22 में प्रदेश को 9.93 करोड़ रुपए मिले थे, वहीं 2024-25 में यह राशि बढ़कर 62.16 करोड़ रुपए पहुंच गई। हालांकि, अन्य बड़े राज्यों की तुलना में यह आवंटन काफी कम है। वित्त वर्ष 2024-25 के लिए महाराष्ट्र को 175.44 करोड़ रुपए और उत्तर प्रदेश को 140.07 करोड़ रुपए जारी किए गए हैं, जो मध्य प्रदेश के बजट से दोगुने से भी अधिक हैं।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि कृषि उत्पादों की बर्बादी रोकने और स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण को बढ़ावा देने के लिए किसान उत्पादक संगठनों और महिला स्व-सहायता समूहों को प्राथमिकता दी जा रही है। प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना के तहत सामान्य श्रेणियों के 35% की तुलना में किसान उत्पादक संगठनों और महिला स्व-सहायता समूहों को प्रोजेक्ट कॉस्ट पर 50% तक की वित्तीय सब्सिडी दी जा रही है। ब्रांडिंग, आधुनिक पैकेजिंग, एफएसएसएआइ मानकों के तहत गुणवत्ता जांच और मोबाइल टेस्टिंग लैब के जरिए ग्रामीण अंचलों में वैल्यू एडिशन नेटवर्क विकसित किया जा रहा है।