
Cannabis : मध्य प्रदेश के मालवा-निमाड़ की पहचान कभी ‘पग-पग रोटी, डग-डग नीर’ की कहावत से होती थी। उपजाऊ जमीन, खेतों में लहलहाती फसलें और खेती-किसानी इस अंचल की पहचान रहे हैं, लेकिन अब इसी कृषि प्रधान इलाके के कुछ हिस्सों से एक ऐसी तस्वीर सामने आ रही है, जो चिंता बढ़ाने वाली है। यहां खेतों में सिर्फ कपास, सोयाबीन और दूसरी फसलें ही नहीं, बल्कि उन्हीं की आड़ में गांजे के पौधे भी लहलहा रहे हैं।
कहीं दुर्गम पहाड़ियों की तलहटी में वनभूमि पर अवैध खेती की जा रही है, तो कहीं शासकीय पट्टों वाली जमीन पर उगाई जा रही फसल के बीच नशे का कारोबार पनप रहा है। पुलिस की हालिया कार्रवाइयों ने इस अवैध खेती के बड़े पैमाने और इसके पीछे सक्रिय संभावित नेटवर्क की ओर ध्यान खींचा है। बीते तीन माह के दौरान मालवा-निमाड़ के विभिन्न जिलों में गांजे की खेती और बरामदगी से जुड़े कई मामले सामने आए हैं।
धार-झाबुआ की सीमा पर स्थित ग्राम कलमोड़ा में पुलिस ने 1.984 हेक्टेयर जमीन पर कपास की फसल के बीच उगाए गए गांजे के 15,609 पौधे जब्त किए। इनका कुल वजन 99 क्विंटल 16 किलो 427 ग्राम बताया गया है, जबकि अनुमानित बाजार मूल्य 9 करोड़ 42 लाख 1 हजार 430 रुपए आंका गया। दूसरी बड़ी कार्रवाई निमाड़ के बड़वानी जिले में सामने आई, जहां महाराष्ट्र सीमा से लगे 19 गांवों में चलाए गए अभियान में ड्रोन सर्च के बाद 11 हजार से अधिक गांजे के पौधे बरामद किए गए। इनका वजन 23 क्विंटल से ज्यादा और अनुमानित बाजार मूल्य 1.5 करोड़ रुपए से अधिक बताया गया है।
ये दोनों कार्रवाइयां महज अवैध पौधे जब्त करने तक सीमित नहीं हैं। इनसे तीन बड़े सवाल खड़े होते हैं.पहला, इतनी बड़ी मात्रा में गांजे की खेती के लिए जमीन और संसाधन किस तरह जुटाए गए? दूसरा, फसल तैयार होने के बाद इसे कहां और किस नेटवर्क के जरिए खपाया जाना था? और तीसरा, दुर्गम इलाकों में बड़े पैमाने पर चल रही इस गतिविधि की जानकारी समय रहते निगरानी तंत्र को क्यों नहीं मिल पाई?
धार-झाबुआ जिले की सीमा पर स्थित ग्राम कलमोड़ा की कार्रवाई इस पूरे मामले की गंभीरता को उजागर करती है। मुख्य मार्ग से करीब 25 किलोमीटर अंदर दुर्गम पहाड़ी और वन क्षेत्र में 1.984 हेक्टेयर जमीन पर गांजे की खेती की जा रही थी। किसी को शक न हो, इसके लिए कपास की फसल बोई गई थी और उसी की आड़ में गांजे के पौधे उगाए जा रहे थे। पुलिस के मुताबिक, इस गतिविधि में एक ही परिवार के तीन सगे भाई वेलसिंह डामोर, भमरसिंह और बापू, निवासी ग्राम कलमोड़ा शामिल थे। कार्रवाई में 15,609 पौधे जब्त किए गए, जिनकी अनुमानित कीमत 9.42 करोड़ रुपए बताई गई। इतने बड़े पैमाने पर खेती सामने आने के बाद जांच का दायरा भी बढ़ गया है।
अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि गांजे की फसल किन लोगों के लिए तैयार की जा रही थी, इसे बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था किसके जिम्मे थी और इस कारोबार से जुड़े दूसरे लोगों की भूमिका क्या थी। क्योंकि खेती करने वाले लोगों की पहचान सामने आ जाने के बावजूद पूरी सप्लाई चेन का खुलासा होना इस मामले का सबसे अहम हिस्सा है।
निमाड़ के बड़वानी जिले में महाराष्ट्र सीमा से लगे इलाकों में गांजे की अवैध खेती के खिलाफ पुलिस ने बड़े स्तर पर अभियान चलाया। वरला थाना क्षेत्र के 19 गांवों में करीब दो दिन तक चले सर्च ऑपरेशन में 400 से अधिक पुलिसकर्मी शामिल हुए। पहाड़ी और जंगल वाले इलाकों में ड्रोन से सर्च किया गया, जिसके बाद 11 हजार से ज्यादा गांजे के पौधे बरामद हुए। जब्त पौधों का वजन 23 क्विंटल से अधिक और अनुमानित बाजार मूल्य 1.5 करोड़ रुपए से ज्यादा बताया गया है। कार्रवाई में बड़वानी के साथ खरगोन और खंडवा जिले की पुलिस भी शामिल रही। पुलिस को आशंका है कि इस अवैध खेती के पीछे स्थानीय स्तर से आगे तक फैला नेटवर्क हो सकता है।
प्रारंभिक जांच में यह संभावना भी जताई गई है कि बाहरी लोग स्थानीय आदिवासियों को गांजे की खेती के तरीके बताते हैं और फसल तैयार होने के बाद उसे अपने साथ ले जाते हैं। हालांकि, इस आशंका की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। फिलहाल पुलिस के सामने चुनौती यह पता लगाने की है कि खेती के लिए बीज और अन्य संसाधन कहां से आए, जमीन का इस्तेमाल कैसे किया गया और तैयार फसल को बाहर पहुंचाने के लिए कौन-सा रास्ता अपनाया जाता था।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन माह में निमाड़ रेंज के बड़वानी, खरगोन और खंडवा जिलों में गांजे के अवैध कारोबार से जुड़े करीब 25 प्रकरण दर्ज किए गए। इनमें बड़वानी में 13, खरगोन में 10 और खंडवा में दो मामले शामिल हैं। इनमें कुल 114 क्विंटल गांजा जब्त किए जाने का उल्लेख है। वहीं, धार, झाबुआ और आलीराजपुर जिलों में इसी अवधि के दौरान 13 मामलों में 123 क्विंटल से अधिक गांजा बरामद हुआ है। इन कार्रवाई में जब्त गांजे का बाजार मूल्य 10.16 करोड़ रुपए से अधिक आंका गया है।
मालवा-निमाड़ में सामने आए मामलों की गंभीरता केवल गांजे के पौधों की संख्या या उनकी अनुमानित कीमत से तय नहीं होती। असल चुनौती उस व्यवस्था को समझने की है, जो दुर्गम इलाकों में खेती से लेकर फसल की कटाई, परिवहन और बिक्री तक काम कर सकती है। यदि बाहरी लोगों के स्थानीय स्तर पर नेटवर्क बनाने की आशंका सही साबित होती है, तो जांच में उन संपर्कों की पहचान करना जरूरी होगा, जो खेती कराने, फसल खरीदने और उसे दूसरे क्षेत्रों तक पहुंचाने में भूमिका निभाते हैं। इसी तरह वनभूमि, शासकीय पट्टों वाली जमीन और निजी खेतों में अवैध खेती सामने आने के बाद भूमि उपयोग, स्थानीय निगरानी और संबंधित विभागों के बीच समन्वय की भी पड़ताल जरूरी है।
झाबुआ के एसपी देवेंद्र पाटीदार ने पत्रिका से बातचीत में कहा कि ग्राम कलमोड़ा में कपास की फसल के बीच अवैध रूप से गांजे की खेती की जा रही थी, करीब 9.42 करोड़ रुपए की कीमत के 15 हजार से अधिक पौधे जब्त किए हैं। नशे के इस काले कारोबार की कमर तोड़ने के लिए पुलिस की 'जीरो टॉलरेंस' नीति और कठोर वैधानिक कार्रवाइयां निरंतर जारी रहेंगी, हमारा पूरा फोकस इस नेटवर्क को ध्वस्त करना है, इसे लेकर ही विशेष टीम जांच भी कर रही है।
बड़वानी के एसपी पद्म विलोचन शुक्ल ने कहा कि महाराष्ट्र सीमा से लगे 19 गांवों में 400 से ज्यादा पुलिसकर्मी पहाड़ों और जंगलों में उतरे, जहां दुर्गम इलाकों में गांजे की अवैध खेती के खिलाफ पुलिस ने बड़ा अभियान चलाया है। ड्रोन से सर्च के बाद 11 हजार से अधिक गांजे के पौधे मिले है, शक है कि बाहरी लोग स्थानीय आदिवासियों को गांजे की खेती की ट्रेनिंग देते हैं और फसल तैयार होने के बाद उसे अपने साथ ले जाते हैं, इसकी जांच कर रहे हैं।