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Natra Jhagda: राजगढ़ में कुप्रथा का दंश: नातरा से झगड़े तक लाखों की डिमांड, फिर खेत में खड़ी फसल में लगा दी आग

लिखने-पढ़ने और खेलने-कूदने की उम्र में शादी करा दी जाती है। बच्चों समझते नहीं उससे पहले उनकी सगाई और विवाह की तैयारियां हो जाती है। जब वे समझदार होते हैं तो रिश्ते टूटूने की नौबत आती है और फिर आरोप-प्रत्यारोप और झगड़ा। कहीं खेत में खड़ी फसल काट ली गई तो कहीं आग लगा दी गई। मध्य प्रदेश में नातरा-झगड़ा कुप्रथा से उपजी समस्याओं के बारे में पढ़िए राजेश विश्वकर्मा की रिपोर्ट।
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Aug 24, 2026
Natra Jhagda
नातरा-झगड़े में उलझा बच्चों का जीवन (Photo: Rajasthan Patrika)

Natra Jhagda Tradition : राजगढ़ में नातरा-झगड़ा कुप्रथा सिर्फ रिश्तों का विवाद नहीं रह गया है। यह कई परिवारों की मेहनत, संपत्ति और सामाजिक शांति तक को निगल रहा है। यह कुप्रथा लंबे समय से राजगढ़ में पांव पसार रही है, जिसका स्थायी समाधान यहां निकल नहीं पा रहा है।

छह महीनों में नातरा-झगड़े से जुड़े प्रतिदिन औसतन दो मामले सामने आ रहे हैं, जिसमें खासकर राजगढ़ जिले के भोजपुर, राजगढ़ कोतवाली, ब्यावरा, सुठालिया, कालीपीठ और कुछ हद तक जीरापुर-छापीहेड़ा शामिल हैं। यहां अधिकतर एफआइआर होती है। ये विवाद केवल कहासुनी या पारिवारिक कलह तक सीमित नहीं रहा। कई मामलों में फसल नुकसान, आगजनी, मारपीट और धमकी जैसे गंभीर आरोप सामने आए। लेकिन इस पूरी कहानी की जड़ इससे भी पीछे जाती है बाल सगाई और बाल विवाह।

पहले बचपन में रिश्ता, फिर बड़े होकर झगड़ा

कई ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बच्चों की उम्र कम होने के बावजूद रिश्ते तय कर दिए जाते हैं। पहले सगाई होती है और कई बार बाद में विवाह। बच्चे बड़े होते हैं। उनकी सोच बदलती है। पढ़ाई, रोजगार, पसंद-नापसंद और परिस्थितियां बदलती हैं। ऐसे में कम उम्र में तय हुआ रिश्ता आगे चलकर टूटता है तो सिर्फ दो लोगों का संबंध नहीं टूटता दो परिवारों के बीच तनाव और विवाद की जमीन भी तैयार हो जाती है? यहीं से नातरा की स्थिति बनती है और नातरा के बाद पुराने और नए पक्ष के बीच विवाद शुरू हो जाए तो वह झगड़े में बदलते देर नहीं लगती।

500 बाल विवाह रोके, लेकिन सवाल अभी भी बाकी

राजगढ़ जिले में पिछले दो वर्षों में प्रशासन और संबंधित विभागों ने करीब 500 बाल विवाह रुकवाए हैं। यह आंकड़ा एक तरफ प्रशासन की कार्रवाई बताता है, लेकिन दूसरी तरफ यह भी बताता है कि बाल विवाह की सामाजिक जड़ें अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। इसके साथ बाल सगाई के मामले भी सामने आते रहे हैं। यही वह जगह है जहां नातरा-झगड़े की कहानी को रोकने का सबसे बड़ा रास्ता दिखाई देता है। बाल सगाई नहीं होगी तो बाल विवाह की जमीन कमजोर होगी। बाल विवाह नहीं होंगे तो कम उम्र में तय रिश्तों के टूटने की स्थितियां कम होंगी। और जब रिश्ते टूटने की स्थितियां कम होंगी तो नातरा से पैदा होने वाले झगड़ों की संभावना भी घटेगी। यानी जिस झगड़े की एफआइआर आज थाने में लिखी जा रही है, उसकी रोकथाम शायद उस दिन से शुरू होनी चाहिए जब परिवार बच्चे की सगाई तय करने बैठता है।

झगड़ा बढ़ा तो खेत बने बदले का मैदान

नातरा-झगड़े के मामलों की सबसे खतरनाक तस्वीर खेतों में दिखाई देती है। किसी विवाद में खड़ी फसल काट देना, नुकसान करना या आग लगा देना… यह सिर्फ संपत्ति को नुकसान पहुंचाना नहीं है। किसान की महीनों की मेहनत और परिवार की सालभर की आय उसी खेत पर निर्भर होती है। ये झगड़े की आग में से सिर्फ वे लोग ही नहीं झुलसते जिनका रिश्ता है बल्कि उस गांव के अन्य लोग भी झुलसते हैं, जिनका किसी से कोई लेना-देना नहीं है। उनकी भी फसलें जला दी जाती हैं या खराब कर दी जाती हैं। एक झगड़े की आग जब खेत तक पहुंचती है तो उसके साथ किसान की आर्थिक सुरक्षा भी जलती है। जब विवाद की कीमत खेत की फसल चुकाने लगे, तो वह पूरे गांव की समस्या बन जाता है, तब नातरा-झगड़े को सिर्फ घरेलू या पारिवारिक विवाद मानना गलत होगा।

घर और रिश्ते दोनों निशाने पर

कुछ मामलों में विवाद घर और संपत्ति तक पहुंचा। आगजनी, तोड़फोड़, मारपीट और धमकी के आरोप लगे। अक्सर शुरुआत छोटी होती है, पुराना रिश्ता, नया रिश्ता, परिवार की नाराजगी या आर्थिक लेन-देन लेकिन जब दोनों पक्ष आमने-सामने आते हैं तो रिश्तेदार और परिचित भी इसमें शामिल हो जाते हैं। फिर विवाद व्यक्तिगत नहीं रहता और दो पक्षों के बीच टकराव बन जाता है। यहीं से एक सामाजिक परंपरा कानून-व्यवस्था की चुनौती में बदल जाती है।

सवाल नातरा का नहीं, उसकी कीमत का है

नातरा ग्रामीण समाज में वर्षों से चली आ रही सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा रहा है। इसलिए केवल यह कहना कि यह परंपरा क्यों है, पूरी कहानी नहीं होगी। असल सवाल यह है क्या किसी रिश्ते के बदलने की कीमत दूसरे परिवार की फसल, घर या संपत्ति से वसूली जा सकती है? क्या पुराने रिश्ते के टूटने के बाद नया रिश्ता बनना हिंसा का कारण बनना चाहिए? और क्या बच्चों की उम्र में तय होने वाले रिश्ते भविष्य में ऐसी स्थितियों को जन्म देने वाली पहली कड़ी बन रहे हैं?

'शुरुआत में रोकेंगे तो झगड़े तक बात ही नहीं पहुंचेगी'

राजगढ़ की अहिंसा वेलफेयर सोसायटी के समन्वयक मनीष दांगी ने पत्रिका से बातचीत में कहा, “बाल सगाई और बाल विवाह इस पूरी सामाजिक समस्या की महत्वपूर्ण शुरुआती कड़ी हैं। जब कम उम्र में रिश्ते तय होते हैं तो बच्चों की पसंद, उनकी शिक्षा और भविष्य की परिस्थितियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। आगे चलकर रिश्ता टूटता है तो परिवारों के बीच विवाद की स्थिति बन सकती है। यही विवाद कई बार नातरा और फिर झगड़े तक पहुंचता है। इसलिए समाधान केवल FIR के बाद कार्रवाई में नहीं है। बाल सगाई और बाल विवाह को रोकना इस चक्र को शुरुआत में ही तोड़ने का सबसे प्रभावी रास्ता हो सकता है।”

'मैंने सख्त निर्देश दे रखे हैं'

राजगढ़ के एसपी अमित तोलानी ने बताया, 'इस कुप्रथा के लिए हम काफी जागरूकता कार्यक्रम चलाते हैं, लोगों को समझाते हैं, साथ ही सख्ती के लिए हमने सभी थानों में सख्त निर्देश दे रखे हैं कि जैसे ही कोई पीड़त आए तो तत्काल एफआइआर करें। एफआइआर के पीछे कारण यही है कि डर पैदा हो।'

एफआइआर के बाद नहीं, उससे पहले रोकना होगा

पुलिस विवाद होने के बाद सामने आती है। एफआइआर होती है। आरोपी बनते हैं। जांच होती है। कार्रवाई होती है। लेकिन तब तक विवाद जन्म ले चुका होता है। असल लड़ाई उस सोच से है, जो बच्चों की उम्र में रिश्ता तय करती है और बाद में उसी रिश्ते के टूटने की कीमत परिवारों से वसूलती है। अगर बाल सगाई रुकेगी तो बाल विवाह पर रोक लगेगी। बाल विवाह रुकेगा तो कम उम्र में बने रिश्तों का दबाव घटेगा। रिश्तों का अनावश्यक टूटना घटेगा तो नातरा की नौबत कम होगी और नातरा से जुड़े विवाद कम होंगे तो खेत, घर और परिवार झगड़े की आग से बचेंगे।

Updated on:
24 Aug 2026 05:29 pm
Published on:
24 Aug 2026 04:08 pm
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