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राजस्थान से निकल कर बॉलीवुड को जगमगाने और धर्मेंद्र को टक्कर देने वाले अदाकार शैलेश कुमार

Bollwood FlashBack: जोधपुर में जन्मे शंभूनाथ पुरोहित यानी अभिनेता शैलेश कुमार ने ₹75 से मुंबई में स्ट्रगल शुरू कर 60 के दशक में अमिट पहचान बनाई। मीना कुमारी के साथ ब्लॉकबस्टर फिल्मों और लाल बहादुर शास्त्री के द्वारा सम्मान से नवाज़े गए इस सितारे का सुनहरा और यादगार सिल्वर ​स्क्रीन का सफ़र।
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Aug 25, 2026
Film Staar Shailesh Kumar News.
1960 के दशक में जोधपुर से मुंबई पहुंचे अभिनेता शैलेश कुमार, जिन्होंने मीना कुमारी और धर्मेंद्र के साथ क्लासिक सिनेमा में अपनी अमिट पहचान बनाई। ( फोटो: AI व पत्रिका )

नॉस्टे​लजिया की जब भी सुनहरी परतें खुलती हैं, तो राजस्थान की माटी का एक ऐसा सितारा सामने आता है जिसकी चमक ने साठ और सत्तर के दशक में हिंदी सिनेमा को एक नया आयाम दिया। बात हो रही है अभिनेता शैलेश कुमार की। 21 जनवरी 1939 को जोधपुर में जन्मे इस कलाकार का मूल नाम शंभूनाथ पुरोहित था। थिएटर और अभिनय की लगन ऐसी थी कि 1960 में वे अपनी जेब में महज़ 75 रुपये लेकर सपनों के शहर मुंबई की ओर निकल पड़े थे। वहां पहुंच कर उन्होंने जद्दोजहद करने के बाद कामयाबी हासिल कर कर सेल्युलाइड की दुनिया को जगमगा दिया। समय बदला तो वे जोधपुर लौट आए।

धर्मेंद्र के साथ संघर्ष और गहरी दोस्ती

बात उन दिनों की है, जब मुंबई में जब शैलेश कुमार संघर्ष कर रहे थे, ठीक उसी दौर में पंजाब से आए एक नौजवान धर्मेंद्र देओल भी फ़िल्मों में जगह तलाश रहे थे। दोनों अक्सर स्टूडियो के चक्कर काटते हुए मिलते और एक-दूसरे के साथ अपने संघर्ष, सपनों और उम्मीदों को साझा करते। उस दौर में मुंबई की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘फ़िल्मी दुनिया’ के जून 1966 के अंक में छपे एक आलेख में लिखा गया था- “शैलेश कुमार, अभिनेता धर्मेंद्र के बाद वह दूसरा अभिनेता है जो तेज़ी से सफलता की ओर निरंतर बढ़ रहा है और प्रत्येक दिन शूटिंग में व्यस्त रहता है।”

धर्मेंद्र और शैलेशकुमार में टक्कर की मिसाल:स्क्रीन शेयरिंग के मेन पॉइंट्स

राजस्थान के फनकारों को आप ऐसे ही न समझें, हल्के में न लें। मरुधरा के लाल शैलेशकुमार ने धर्मेंद्र के सामने अपनी शानदार व दमदारी अदाकारी का लोहा मनवाया:

समानांतर शुरुआत: दोनों कलाकारों ने 1960 के आसपास एक साथ अपने करियर की शुरुआत की और मायानगरी में एक ही दौर में कड़ा संघर्ष देखा।

त्रिकोणीय मुकाबला फ़िल्म 'बेगाना' (1963): इस फ़िल्म में शैलेश कुमार और धर्मेंद्र दोनों मुख्य भूमिकाओं में आमने-सामने थे, जहाँ दोनों के किरदारों और अभिनय की सीधी तुलना की गई।

मल्टीस्टारर 'काजल' 1965): ट्रेजडी क्वीन मीना कुमारी के साथ इस क्लासिक फ़िल्म में दोनों ने समानांतर स्क्रीन स्पेस साझा किया और दोनों के स्क्रीन प्रेजेंस को दर्शकों व समीक्षकों ने खूब सराहा।

व्यस्तता और स्टारडम(1965-66): जहां धर्मेंद्र का नाम शीर्ष सितारों में शुमार हो रहा था, वहीं शैलेश कुमार भी लगातार बैक-टू-बैक हिट फिल्में देकर हिदायतकारों की पहली पसंद बने हुए थे और दिन-रात शूटिंग में बिजी रहते थे।

राजस्थान से बॉलीवुड तक: जोधपुर के शंभूनाथ पुरोहित से अभिनेता शैलेश कुमार बनने का सुनहरा सफर। ( फोटो: AI व पत्रिका )

'भाभी की चूड़ियां' और 'काजल' से मिली शोहरत

शुरुआती छोटे किरदारों के बाद शैलेश कुमार को बड़ा ब्रेक निर्देशक सदाशिव जे. राव कवि की फ़िल्म ‘भाभी की चूड़ियां’ (1961) में मिला। इसमें वे बलराज साहनी और ट्रेजडी क्वीन मीना कुमारी के साथ एक बेहद अहम और मार्मिक किरदार में नज़र आए। लता मंगेशकर के अमर गीत ‘ज्योति कलश छलके’ से सजी यह फ़िल्म ब्लॉकबस्टर रही और शैलेश कुमार घर-घर में पहचाने जाने लगे।

इसके बाद 1965 में आई मल्टीस्टारर फ़िल्म ‘काजल’ में धर्मेंद्र और मीना कुमारी के साथ उनके अभिनय की खूब सराहना हुई। उन्होंने ‘आधी रात के बाद’ (1965), ‘बेगाना’ (1963), ‘यह रात फिर ना आएगी’ (1966), ‘नई रोशनी’ (1967) और जेम्स बॉन्ड शैली की फ़िल्म ‘गोल्डन आईज़: सीक्रेट एजेंट 077’ (1968) जैसी करीब 30 से अधिक फ़िल्मों में अपनी बहुमुखी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

जब पीएम लाल बहादुर शास्त्री ने शैलेश कुमार को दिया भोज

शैलेश कुमार के करियर का सबसे गौरवशाली क्षण तब आया जब उन्होंने मनोज कुमार की कालजयी देशभक्ति फ़िल्म ‘शहीद’ (1965) में काम किया। फ़िल्म की अपार सफलता और मार्मिक प्रस्तुति से प्रभावित होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने ‘शहीद’ की पूरी टीम को अपने आधिकारिक आवास पर आमंत्रित किया और उन्हें व्यक्तिगत रूप से रात्रिभोज (डिनर) देकर सम्मानित किया।

शैलेश कुमार: बॉलीवुड का अनसुना सच

  • रंगमंच से शुरुआत: जोधपुर के स्थानीय थिएटर से अभिनय की बारीकियां सीखकर फिल्मों में किस्मत आजमाई।
  • पहचान का बदलाव: मायानगरी के दौर में व्यावसायिक पहचान के लिए 'शंभूनाथ' नाम बदलकर 'शैलेश' रखा।
  • सदाबहार साथी: धर्मेंद्र के साथ शुरुआती दौर में कई प्रोजेक्ट्स और ऑडिशन का सफर साझा किया।
  • दिग्गजों का साथ: मीना कुमारी और बलराज साहनी जैसे शीर्ष कलाकारों के साथ समानांतर लीड रोल निभाए।
  • देशभक्ति सिनेमा: 'शहीद' में क्रांतिकारी भूमिका निभाकर तत्कालीन राजनीतिक गलियारों तक वाहवाही बटोरी।
  • मल्टी-जॉनर अदाकारी: पारिवारिक ड्रामा से लेकर 'गोल्डन आईज' जैसी जासूसी और एक्शन फिल्मों में काम किया।
  • सादगीपूर्ण विदाई: चकाचौंध भरी दुनिया से अचानक दूरी बनाकर जीवन का अंतिम चरण गृह नगर जोधपुर में बिताया।

चरस, कालीचरण और थायरॉयड की बीमारी

सत्तर के दशक में शैलेश कुमार ने ‘हमराही’ (1974), ‘संन्यासी’ (1975), ‘चरस’ (1976), ‘कालीचरण’ (1976) और ‘राम भरोसे’ (1977) जैसी हिट फ़िल्मों में यादगार सहायक भूमिकाएं निभाईं। इधर 1980 के दशक की शुरुआत में उन्हें थायरॉयड की गंभीर बीमारी हो गई, जिसके चलते उनके स्वास्थ्य और वज़न पर असर पड़ा। सिनेमाई चमक-दमक के बीच उन्होंने संन्यास लेने का कठिन फैसला किया।

वापसी जोधपुर और अंतिम सफर

हालात के आगे मजबूर हो कर शैलेश कुमार फ़िल्मी दुनिया को अलविदा कह कर अपनी जन्मभूमि जोधपुर लौट आए। उन्होंने अपना शेष जीवन अपनी पत्नी पुष्पा रानी, बेटे देवेंद्र और बेटी आशिमा के साथ बेहद सादगी और शांति से बिताया। इस महान अदाकार ने 21 अप्रेल 2017 को 78 वर्ष की आयु में जोधपुर में अंतिम सांस ली। शैलेश कुमार आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, शैलेशकुमार भले ही जोधपुर लोट गए, लेकिन सिल्वर स्क्रीन पर निभाए गए किरदार आज भी याद किए जाते हैं। राजस्थान की माटी से निकल कर बॉलीवुड में छोड़ी गई उनकी अमिट छाप सिनेमा के इतिहास में सदा अमर रहेगी।

Updated on:
25 Aug 2026 04:19 pm
Published on:
25 Aug 2026 03:09 pm