
Youth Voter Trends India : क्या युवा बदलेगा देश का ट्रेंड, PC- Chatgpt
भारत की चुनावी राजनीति में लंबे समय से जाति, धर्म, क्षेत्र और कल्याणकारी योजनाओं को जीत का सबसे बड़ा आधार माना जाता रहा है। लेकिन अब एक नया सवाल तेजी से सामने आ रहा है- क्या युवा मतदाता आने वाले चुनावों में अलग राजनीतिक ताकत बन सकता है?
2026 में छात्र और युवा आंदोलनों, पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं, बेरोजगारी और शिक्षा से जुड़े मुद्दों ने राजनीतिक दलों को युवाओं के बीच अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर किया है। अगस्त 2026 में भाजपा ने Gen-Z तक पहुंच के लिए अलग टीम बनाई है, जबकि कांग्रेस ‘छात्रों की गूंज’ जैसे कार्यक्रमों के जरिए छात्र मुद्दों को राजनीतिक अभियान का हिस्सा बना रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या युवा वोट जातीय समीकरण को पीछे छोड़ सकता है?
2024 लोकसभा चुनाव के समय देश में करीब 21.6 करोड़ मतदाता 18 से 29 वर्ष के थे। इनमें 1.85 करोड़ 18-19 वर्ष के पहली बार वोटर थे, जबकि 20-29 आयु वर्ग में करीब 19.74 करोड़ मतदाता थे। यानी 18-29 आयु समूह कुल मतदाताओं का लगभग 22.8% था।मतलब साफ है- हर चार-पांच मतदाताओं में लगभग एक युवा है।
| राज्य | 18-29 आयु वर्ग की हिस्सेदारी |
|---|---|
| ओडिशा | 23.60% |
| गुजरात | 23.32% |
| हरियाणा | 22.20% |
| उत्तराखंड | 22.18% |
| हिमाचल प्रदेश | 21.91% |
| पंजाब | 21.44% |
| उत्तर प्रदेश | 21.19% |
| कर्नाटक | 21.00% |
| आंध्र प्रदेश | 20.34% |
| महाराष्ट्र | 19.82% |
| तमिलनाडु | 19.43% |
| दिल्ली | 18.89% |
| केरल | 18.04% |
राष्ट्रीय औसत 22.78% था। बिहार की तस्वीर भी खास है। 2025 के विधानसभा चुनाव के समय 18-29 आयु वर्ग करीब 24% मतदाता था और 14.01 लाख पहली बार वोटर थे।
पहली बार वोट देने वाला मतदाता किसी पार्टी का स्थायी वोटर जरूरी नहीं होता। उसके पास पिछली सरकारों की व्यक्तिगत राजनीतिक स्मृति कम होती है। वह रोजगार, परीक्षा, शिक्षा, इंटरनेट, महंगाई, स्किलिंग, सरकारी नौकरी, उद्यमिता और भविष्य के अवसर जैसे मुद्दों को ज्यादा सीधे देख सकता है।
2024 में 18-19 आयु वर्ग के 1.84 करोड़ से ज्यादा मतदाता थे- 2019 के मुकाबले करीब 22% अधिक। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं कि सभी पहली बार वोटर एक ही पार्टी को वोट करेंगे। असली ताकत उनकी फ्लूइड यानी बदलने वाली राजनीतिक पसंद में है।
यहां सबसे बड़ा भ्रम है कि युवा आते ही जाति की राजनीति खत्म हो जाएगी। ऐसा अभी तक नहीं दिखता। युवा भी जाति, धर्म, परिवार, क्षेत्र और स्थानीय सामाजिक नेटवर्क से प्रभावित होता है। लेकिन उसकी प्राथ
मिकताओं की सूची में रोजगार और अवसर का वजन बढ़ सकता है।
बिहार के 2020 चुनाव में CSDS से जुड़े पोस्ट-पोल आंकड़ों के अनुसार 18-29 आयु वर्ग में महागठबंधन और NDA का समर्थन लगभग बराबर था- 37% बनाम 36%। यानी युवा वोट किसी एक गठबंधन का स्थायी वोट बैंक नहीं था।इससे एक महत्वपूर्ण संकेत मिलता है- युवा वोट को पकड़ने के लिए सिर्फ जातीय पहचान पर्याप्त नहीं हो सकती।
2026 में छात्र और युवा आंदोलनों ने शिक्षा, परीक्षा व्यवस्था, रोजगार और सरकार की जवाबदेही को फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया। इसी पृष्ठभूमि में जुलाई 2026 में हुए युवा-नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों के बाद केंद्र की शिक्षा नीति और परीक्षा व्यवस्था को लेकर बहस तेज हुई। सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त में इन प्रदर्शनों से जुड़ी हिंसा के आरोपों की जांच के लिए विशेष पैनल भी बनाया।
इन घटनाओं का चुनावी असर कितना होगा, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन राजनीतिक दलों ने संकेत जरूर समझ लिया है-कॉलेज कैंपस और डिजिटल प्लेटफॉर्म अब चुनावी रणनीति के महत्वपूर्ण मैदान हैं।
Gen-Z को आम तौर पर 1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी माना जाता है। इस समूह का एक बड़ा हिस्सा अब मतदाता बन चुका है। इस पीढ़ी की खासियत यह है कि इसका राजनीतिक सूचना तंत्र सिर्फ टीवी, अखबार या पार्टी संगठन नहीं है। सोशल मीडिया, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, मीम, पॉडकास्ट और डिजिटल प्रभावक भी राजनीतिक राय बनाने में भूमिका निभाते हैं।
इसका फायदा यह है कि युवा किसी पार्टी के पारंपरिक समर्थक होने के बावजूद किसी खास मुद्दे पर उससे असहमत हो सकता है।
लेकिन डिजिटल सक्रियता और मतदान व्यवहार एक ही चीज नहीं हैं। ऑनलाइन ट्रेंड हमेशा वोट में नहीं बदलता।
भाजपा ने 2026 में Gen-Z के लिए विशेष आउटरीच टीम बनाई है। इसमें पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन, स्मृति ईरानी, विनोद तावड़े और दूसरे नेता शामिल हैं। पार्टी का उद्देश्य युवाओं की आकांक्षाओं और समस्याओं को समझकर उनसे सीधा संपर्क बढ़ाना है। दिल्ली में भाजपा ने छात्र संगठनों और युवा मोर्चे के जरिए विश्वविद्यालयों में पहुंच बढ़ाने की योजना भी बनाई है। यानी रणनीति सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं है- कैंपस, सोशल मीडिया और सीधे संवाद पर जोर बढ़ रहा है।
कांग्रेस ने 2026 में ‘छात्रों की गूंज’ अभियान के जरिए पेपर लीक, भर्ती में देरी, बेरोजगारी और शिक्षा से जुड़े मुद्दों को उठाया। राहुल गांधी ने कोटा में छात्रों और अभिभावकों से संवाद किया और बाद में प्रयागराज जैसे छात्र केंद्रों तक अभियान बढ़ाया। यानी कांग्रेस की कोशिश युवा राजनीति को रोजगार, परीक्षा और शिक्षा व्यवस्था की नाराजगी से जोड़ने की है।
क्षेत्रीय दलों की ताकत उनकी स्थानीय राजनीति में है। इसलिए उनकी युवा रणनीति भी राज्य-विशेष हो सकती है। उत्तर प्रदेश में छात्र, प्रतियोगी परीक्षा और रोजगार के मुद्दे जातीय समीकरण के साथ जुड़ सकते हैं। बिहार में रोजगार और पलायन बड़ा मुद्दा बन सकता है। महाराष्ट्र में कैंपस राजनीति और मराठी युवा पहचान का सवाल अलग रूप ले सकता है। 2026 में महाराष्ट्र के कॉलेज कैंपसों में विभिन्न दलों के छात्र संगठनों की सदस्यता मुहिम तेज होने की खबरें सामने आईं।
नहीं। कम से कम अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। असल बदलाव शायद यह होगा कि जाति और युवा राजनीति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के साथ काम करेंगे। उदाहरण के लिए किसी युवा की जातीय पहचान वही रह सकती है, लेकिन वह नौकरी, परीक्षा या शिक्षा के सवाल पर अपनी जाति से जुड़े पारंपरिक राजनीतिक विकल्प से अलग वोट कर सकता है।
यानी भविष्य में सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि 'किस जाति का वोट किसके साथ है?' बल्कि यह भी होगा-'उस जाति के युवा किस मुद्दे पर किसके साथ हैं?'
2027 में उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के चुनाव होंगे और 2029 में लोकसभा चुनाव। इन दोनों चुनावी चक्रों में युवा मतदाता निर्णायक संख्या में मौजूद रहेगा। लेकिन, युवा वोट की असली ताकत तीन चीजों पर निर्भर करेगी:
Updated on:
25 Aug 2026 04:25 pm
Published on:
25 Aug 2026 04:25 pm
