
शहरों में बढ़ते तापमान और प्रदूषण की चुनौती से निपटने में अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एक प्रभावी साथी के रूप में उभर रही है। यह तकनीक केवल समस्या की पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि समाधान की दिशा में भी सक्रिय भूमिका निभा रही है। नीचे हम देखेंगे कि AI किस प्रकार शहरों में गर्मी और प्रदूषण को समझने, रोकने और नियंत्रित करने में मदद कर रहा है और इसका असर आम जीवन पर क्या हो सकता है।
SatLeo Labs ने कर्नाटक के टुमकुर शहर में सैटेलाइट और ड्रोन आधारित थर्मल इंटेलिजेंस का उपयोग कर 40 एकड़ कचरा स्थल और आसपास के शहरी क्षेत्रों में ताप और मीथेन हॉटस्पॉट्स का नक्शा तैयार किया। इससे नगर निगम को पहले से ही जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान कर, आग और प्रदूषण फैलने से पहले रोकथाम के उपाय लागू करने में मदद मिली। यह तकनीक दिखाती है कि AI किस प्रकार “अदृश्य” ताप और गैस जोखिमों को दृश्य और कार्रवाई योग्य बना सकता है।
मुंबई में महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) ने AI आधारित मॉडल शुरू किया है, जो वायु गुणवत्ता (AQI) की भविष्यवाणी करेगा। इससे निर्माण गतिविधियों को पहले से रोकने जैसे कदम उठाए जा सकेंगे, ताकि प्रदूषण बढ़ने से पहले ही नियंत्रण किया जा सके। यह मौसम पूर्वानुमान की तरह कार्य करेगा, लेकिन वायु गुणवत्ता पर केंद्रित रहेगा।
मुंबई महानगरीय क्षेत्र में सतही शहरी गर्मी द्वीप (SUHI) की तीव्रता और उसके कारणों का अध्ययन हाल ही में प्रकाशित हुआ है। इसमें मशीन लर्निंग और XAI (Explainable AI) का उपयोग किया गया। परिणाम बताते हैं कि निर्माण क्षेत्र, नगरीकरण, रात में प्रकाश और जनसंख्या घनत्व जैसे कारक SUHI को बढ़ाते हैं। साथ ही, यह स्पष्ट हुआ कि शहर में एक समान उपायों के बजाय स्थान-विशिष्ट रणनीतियां आवश्यक हैं।
बेंगलुरु में AI मॉडल ने भूमि सतह तापमान (LST) और प्रदूषण के बीच संबंध को समझने में मदद की। PM2.5 प्रदूषक LST को सबसे अधिक प्रभावित करता है, और आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क (ANN) ने अन्य मॉडलों की तुलना में बेहतर भविष्यवाणी क्षमता दिखाई (R² = 0.92–0.95)। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रदूषण नियंत्रण से ही गर्मी को कम करने में सहायता मिल सकती है।
दिल्ली के लिए तैयार AI-आधारित Environmental Intelligence System (EIS) में सैटेलाइट, IoT सेंसर, कंप्यूटर विजन, GIS और मशीन लर्निंग शामिल हैं। यह प्रणाली प्रदूषण स्रोतों की पहचान, स्मॉग की भविष्यवाणी और त्वरित प्रतिक्रिया योजनाएं तैयार करने में सक्षम है। बीजिंग के उदाहरण से प्रेरणा लेकर, इस मॉडल से प्रदूषण में 35–40% तक की कमी संभव बताई गई है।
IIT कानपुर के नेतृत्व में “Center of Excellence in AI for Sustainable Cities” की स्थापना मार्च 2024 में हुई। यह केंद्र डिजिटल ट्विन्स और AI मॉडल का उपयोग कर शहरों में वायु गुणवत्ता, ऊर्जा, जल, गतिशीलता और अन्य शहरी कार्यों की निगरानी और पूर्वानुमान करता है। इसी प्रकार, Adani और EY के सहयोग से विकसित डिजिटल ट्विन्स, शहरों में ट्रैफिक, ऊर्जा खपत और प्रदूषण का पूर्वानुमान देने में सक्षम हैं।
VARUNA नामक एक AI-आधारित डिजिटल ट्विन परियोजना है, जो IMD और INSAT‑3DR डेटा का उपयोग कर भारत के मौसम और वायु गुणवत्ता का 10-दिन का पूर्वानुमान देती है। इसमें “क्या होगा अगर” (what‑if) परिदृश्यों के माध्यम से शहरी गर्मी और वायु गुणवत्ता पर विभिन्न हस्तक्षेपों का प्रभाव सजीव रूप में देखा जा सकता है।
AI तकनीक से ऊर्जा उपयोग, ट्रैफिक नियंत्रण, भवन दक्षता जैसे क्षेत्रों में सुधार हो सकता है, जिससे प्रदूषण कम किया जा सकता है। लेकिन AI मॉडल और डेटा सेंटरों की ऊर्जा खपत भी बढ़ रही है, जो स्थानीय तापमान और जल संसाधनों पर दबाव डाल सकती है। इसलिए AI का उपयोग करते समय ऊर्जा दक्षता और पर्यावरणीय प्रभावों का ध्यान रखना आवश्यक है।
AI से शहरी गर्मी और प्रदूषण की पहचान और नियंत्रण में तेजी आएगी। नगर निगम को पहले से ही जोखिम वाले क्षेत्रों की जानकारी मिल जाएगी, जिससे समय रहते कार्रवाई संभव होगी। इससे स्वास्थ्य जोखिम, ऊर्जा खर्च और गर्मी से जुड़ी बीमारियों में कमी आएगी। साथ ही, AI आधारित पूर्वानुमान से नागरिकों को भी तैयारी का समय मिलेगा — जैसे AQI खराब होने पर स्कूल बंद करना या घर पर रहना।
AI शहरों में बढ़ती गर्मी और प्रदूषण की चुनौती से निपटने का एक शक्तिशाली उपकरण बन चुका है। यह केवल समस्या की पहचान नहीं करता, बल्कि समाधान की दिशा में भी ठोस कदम उठाने में मदद करता है। लेकिन इसके साथ ही हमें ऊर्जा उपयोग, डेटा गोपनीयता और पर्यावरणीय प्रभावों का संतुलन भी बनाए रखना होगा।