
अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) ने H-1B वर्क वीजा पर नई फीस लगाने का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत वार्षिक सीमा (कैप) के अंतर्गत दाखिल होने वाली हर H-1B याचिका पर 1,03,265 डॉलर, यानी करीब 98.8 लाख रुपए का शुल्क वसूला जाएगा। यह प्रस्ताव सोमवार को सार्वजनिक निरीक्षण के लिए जारी किया गया। इसका सीधा असर अमेरिका में काम कर रहे भारतीय पेशेवरों और उन्हें नौकरी देने वाली कंपनियों पर पड़ सकता है, क्योंकि 2024 में स्वीकृत H-1B वीजा में से 71 प्रतिशत भारतीय नागरिकों को मिले थे।
नया प्रस्ताव सितंबर 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस घोषणा से अलग है, जिसमें नए H-1B वीजा पर 1 लाख डॉलर की फीस लगाई गई थी। ट्रंप की इस घोषणा को जून 2026 में एक अमेरिकी जिला न्यायाधीश ने असंवैधानिक टैक्स और प्रशासनिक कानून का उल्लंघन बताते हुए रद्द कर दिया था। इसके बाद जुलाई 2026 में एक अपीलीय अदालत ने भी इस फैसले पर रोक लगाने से इनकार किया। इस मामले पर सरकार की अपील फिलहाल लंबित है, जबकि पुरानी घोषणा सितंबर 2026 में अपने आप समाप्त होने वाली है।
DHS ने यह भी स्पष्ट किया है कि नया 1,03,265 डॉलर का शुल्क OPT (ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग) कार्यक्रम पर सीधे लागू नहीं होता है। यह विशेष रूप से वार्षिक कैप के तहत आने वाली H-1B याचिकाओं के लिए है, जिनमें उच्च डिग्रीधारकों के लिए आरक्षित 20,000 वीजा भी शामिल हैं। विश्वविद्यालयों, गैर-लाभकारी और सरकारी शोध संस्थानों से जुड़ी याचिकाओं को इस फीस से छूट दी गई है।
अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) के अनुसार, यह शुल्क अमेरिका की वैध आव्रजन व्यवस्था चलाने की लागत वसूलने के लिए लगाया जा रहा है। विभाग का अनुमान है कि सालाना करीब 85,000 कैप याचिकाओं के आधार पर इससे लगभग 8.8 अरब डॉलर का राजस्व मिलेगा, जो यूएससीआईएस (34.2 प्रतिशत), प्रवासन अदालतों यानी EOIR (33.7 प्रतिशत), श्रम विभाग (13.8 प्रतिशत), आव्रजन एवं सीमा शुल्क प्रवर्तन ICE (11.9 प्रतिशत), विदेश विभाग (5.5 प्रतिशत) और सीमा शुल्क एवं सीमा सुरक्षा (0.9 प्रतिशत) के बीच बांटा जाएगा। DHS का तर्क है कि वित्त वर्ष 2025 में स्वीकृत H-1B कर्मचारियों का औसत वार्षिक वेतन करीब 1,33,000 डॉलर था, इसलिए नियोक्ता यह फीस वहन करने में सक्षम हैं।
कॉर्पोरेट इमिग्रेशन सर्विस फर्म फ्रैगोमेन के अनुसार, इस नए शुल्क से अमेरिका में काम कर रहे प्रवासी पेशेवरों, अंतरराष्ट्रीय छात्रों और उन्हें प्रायोजित करने वाले अमेरिकी नियोक्ताओं पर भारी वित्तीय बोझ पड़ सकता है। DHS के अपने ही विश्लेषण के मुताबिक, इस नियम का 11,051 छोटे उद्यमों पर गंभीर आर्थिक असर पड़ेगा, जो वित्त वर्ष 2025 में कैप याचिका दाखिल करने वाली कुल छोटी कंपनियों का करीब 76 प्रतिशत हैं।
आव्रजन नीति विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रस्ताव कानूनी चुनौतियों में भी उलझ सकता है, क्योंकि पहले लगाए गए 1 लाख डॉलर वाले शुल्क के बाद H-1B आवेदनों में करीब 90 प्रतिशत की गिरावट आई थी, और सरकार ने खुद अदालत में स्वीकार किया था कि उस शुल्क से अपेक्षित राजस्व नहीं मिला। कैटो इंस्टीट्यूट के आव्रजन विशेषज्ञ डेविड बायर ने कहा है कि कानूनन आव्रजन शुल्क केवल याचिका के मूल्यांकन की लागत वसूलने के लिए लगाया जा सकता है, सामान्य राजस्व जुटाने के लिए नहीं।
DHS ने 6 अगस्त 2026 को एक अलग प्रस्ताव व्हाइट हाउस के नियामक समीक्षा कार्यालय को भेजा है, जिसमें नौकरी गंवाने वाले H-1B कर्मचारियों को मिलने वाली 60 दिन की विवेकाधीन मोहलत (ग्रेस पीरियड) को खत्म करने का प्रस्ताव है। यह नियम H-1B के अलावा H-1B1, L-1, O-1, TN, E-1, E-2 और E-3 वीजा धारकों पर भी लागू हो सकता है। यह प्रस्ताव अभी फेडरल रजिस्टर में प्रकाशित नहीं हुआ है और समीक्षाधीन है।
फिलहाल मौजूदा 60 दिन की व्यवस्था कानूनी रूप से लागू बनी हुई है। हालांकि, अगर यह नियम लागू होता है तो नौकरी गंवाने वाले कर्मचारियों और उनके आश्रितों को नया नियोक्ता ढूंढने या दर्जा बदलने का समय लगभग खत्म हो जाएगा। उन्हें तुरंत अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है, अन्यथा वे अवैध प्रवासी माने जा सकते हैं। एक प्रवासी अधिकार कार्यकर्ता ने इस प्रस्ताव को 'अमानवीय और अव्यावहारिक' बताते हुए कहा कि इससे परिवारों को अचानक उखड़ना पड़ सकता है।
अलग से, एक रिपब्लिकन सीनेटर ने भी OPT कार्यक्रम के तहत अंतरराष्ट्रीय छात्रों को मिलने वाले वर्क परमिट बंद करने की मांग उठाई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार जून 2025 तक अमेरिका में करीब 3,72,424 भारतीय छात्र पढ़ाई कर रहे थे, जबकि OPT, STEM OPT और CPT कार्यक्रमों के तहत काम कर रहे छात्रों की अनुमानित संख्या करीब 5,40,000 है।
H-1B फीस में भारी बढ़ोतरी, ग्रेस पीरियड खत्म करने की संभावना और OPT कार्यक्रम में बदलाव की चर्चा, ये तीनों मिलकर अमेरिका में काम कर रहे और पढ़ाई कर रहे भारतीयों के लिए अनिश्चितता बढ़ा रहे हैं। नई फीस को अंतिम रूप मिलने में अभी 30 दिन की टिप्पणी अवधि और संभावित कानूनी चुनौतियां बाकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में भारतीय आईटी कंपनियों और तकनीकी पेशेवरों को अमेरिका में अपनी रणनीति फिर से तय करनी पड़ सकती है।