
भारतीय राजनीति में लंबे समय तक एक धारणा बेहद मजबूत रही, सरकार को एक बार मौका दो, लेकिन दूसरी बार उसी सरकार को सत्ता में लौटाना आसान नहीं है। खासकर राज्यों में मतदाताओं के बीच सरकार बदलने की प्रवृत्ति को ‘एंटी-इनकम्बेंसी’ यानी सत्ता विरोधी लहर के रूप में देखा जाता था।
लेकिन पिछले कुछ चुनावों ने इस धारणा को चुनौती दी है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और झारखंड जैसे राज्यों में सत्तारूढ़ दल या गठबंधन दोबारा सत्ता में लौटे। 2026 के विधानसभा चुनावों में भी कई जगह सत्ता में बने रहने की क्षमता ने इस बहस को और तेज किया। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि भारत से एंटी-इनकम्बेंसी खत्म हो गई है। बल्कि मतदाता अब सरकार को सिर्फ इसलिए नहीं हटा रहा कि वह लंबे समय से सत्ता में है।
अब सवाल ज्यादा बड़ा है, सरकार ने पांच साल में क्या दिया, उसका लाभ किसे मिला और विपक्ष उससे बेहतर विकल्प दे पा रहा है या नहीं?
1990 और 2000 के शुरुआती वर्षों में कई राज्यों में सरकार बदलने का एक चक्र दिखाई देता था। इसका कारण सिर्फ जनता की नाराजगी नहीं था।
सरकार में लंबे समय तक रहने पर स्थानीय विधायक, मंत्री और प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जमा होती थी। बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, सड़क-पानी जैसी स्थानीय समस्याएं सत्ता विरोधी माहौल बनाती थीं। इसके अलावा विपक्ष के पास एक आसान चुनावी संदेश होता था, 'पांच साल हो गए, अब बदलाव चाहिए।'
राजस्थान इसका सबसे चर्चित उदाहरण रहा है। 1993 से 2023 तक वहां कांग्रेस और भाजपा के बीच सत्ता बदलती रही। 2023 में भी कांग्रेस की कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद भाजपा ने सत्ता हासिल की और यह पुराना पैटर्न कायम रहा। लेकिन अब कई राज्यों में मतदाता का व्यवहार बदलता दिखाई दे रहा है।
यही सबसे बड़ा बदलाव है। आज मतदाता के सामने सरकार के प्रदर्शन का आकलन करने के लिए ज्यादा प्रत्यक्ष अनुभव है। सड़क बनी या नहीं, बिजली कितनी आती है, राशन मिल रहा है या नहीं, बैंक खाते में पैसा पहुंच रहा है या नहीं, सरकारी अस्पताल और स्कूल कैसे हैं, इन चीजों का असर सीधे परिवार पर पड़ता है।
तकनीक ने भी सरकार और मतदाता के बीच दूरी कम की है। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण यानी DBT ने सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे लाभार्थियों के खाते में पहुंचाने की क्षमता बढ़ाई है। इससे बिचौलियों की भूमिका कम हुई और लाभार्थी को यह पता रहता है कि उसे किस सरकार की योजना से फायदा मिला। हालांकि शोध यह भी बताता है कि किसी योजना का लाभ मिलना और उसके बदले उसी सरकार को वोट देना एक ही बात नहीं है। यही वजह है कि अब ‘एंटी-इनकम्बेंसी’ की जगह ‘परफॉर्मेंस वोटिंग’ की चर्चा बढ़ रही है।
यह बदलाव सबसे ज्यादा कल्याणकारी योजनाओं में दिखाई देता है। मुफ्त राशन, महिलाओं को नकद सहायता, मुफ्त या सस्ती बिजली, पेंशन, स्वास्थ्य बीमा, गैस कनेक्शन और दूसरी योजनाओं ने चुनावी राजनीति का तरीका बदल दिया है।
पहले सरकार की उपलब्धि अक्सर सड़क, पुल, उद्योग या बड़ी परियोजनाओं के रूप में दिखाई देती थी। अब उपलब्धि का एक हिस्सा सीधे परिवार की जेब या रसोई तक पहुंचता है।
2024 के महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनावों में महिला-केंद्रित नकद सहायता योजनाओं को सत्तारूढ़ गठबंधनों की जीत से जोड़कर देखा गया। मध्य प्रदेश में भी ‘लाड़ली बहना’ जैसी योजना को भाजपा की चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया।
लेकिन यहां सावधानी जरूरी है। यह कहना सही नहीं होगा कि 'मुफ्त योजना = पक्की चुनावी जीत।'
राजस्थान इसका उल्टा उदाहरण है। वहां अशोक गहलोत सरकार ने कई कल्याणकारी योजनाएं लागू कीं, लेकिन कांग्रेस सत्ता में वापस नहीं आ सकी। यानी कल्याणकारी योजना एंटी-इनकम्बेंसी को कम कर सकती है, लेकिन अकेले खत्म नहीं कर सकती।
पिछले कुछ चुनावों में महिला मतदाता एक महत्वपूर्ण राजनीतिक समूह के रूप में उभरी हैं। नकद सहायता की योजनाएं अक्सर सीधे महिलाओं के बैंक खातों में जाती हैं। इसका मतलब है कि योजना का लाभ घर के दूसरे सदस्य के बजाय सीधे महिला तक पहुंचता है।
इससे महिला मतदाता और सरकार के बीच एक सीधा संबंध बन सकता है। महाराष्ट्र और झारखंड में 2024 के चुनावों के बाद इसी वजह से महिला मतदाताओं और नकद हस्तांतरण योजनाओं की भूमिका पर काफी चर्चा हुई।
हां, लेकिन पूरी तरह अकेले नहीं। एक मजबूत नेता चुनाव को स्थानीय सरकार के प्रदर्शन से उठाकर बड़े राजनीतिक सवाल में बदल सकता है। मतदाता सोच सकता है-
यही कारण है कि आज चुनावों में नेतृत्व + संगठन + कल्याणकारी योजनाएं + पहचान की राजनीति + विकास का मिश्रण दिखाई देता है।
2026 के चुनावी विश्लेषणों में भी यह तर्क सामने आया कि कुछ जगह भाजपा ने सत्ता विरोधी भावना को संगठन, कल्याणकारी योजनाओं और नेतृत्व के सहारे सत्ता समर्थक माहौल में बदलने की क्षमता दिखाई।
क्योंकि मतदाता अभी भी सरकारों को हटाता है। 2024 में ओडिशा और आंध्र प्रदेश इसके बड़े उदाहरण रहे। ओडिशा में नवीन पटनायक की पांचवीं सरकार के बाद भाजपा सत्ता में आई, जबकि आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस को भारी नुकसान हुआ।
2026 में भी केरल में एलडीएफ लगातार सत्ता में रहने के बाद सत्ता से बाहर हुआ। यानी लंबे समय तक सत्ता में रहना अभी भी जोखिम है। इसका मतलब है कि एंटी-इनकम्बेंसी मरी नहीं है। उसका स्वरूप बदल गया है।
पहले सवाल होता था- 'पांच साल हो गए, सरकार बदलनी चाहिए या नहीं?' अब सवाल ज्यादा व्यक्तिगत और स्थानीय हो गया है-
'मुझे क्या मिला?' : अगर किसी परिवार को राशन, नकद सहायता, बिजली, आवास या स्वास्थ्य सुविधा का सीधा लाभ मिल रहा है तो सरकार के खिलाफ नाराजगी का असर कम हो सकता है।
लेकिन अगर बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था या स्थानीय स्तर पर प्रशासन की समस्या बहुत बड़ी है तो वही लाभकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं होतीं। इसलिए आज की राजनीति में एंटी-इनकम्बेंसी की जगह ‘एंटी-परफॉर्मेंस’ ज्यादा महत्वपूर्ण होती जा रही है।
भारतीय मतदाता सरकार को अब सिर्फ 'सत्ता में रहने वाली पार्टी' के रूप में नहीं देखता। वह उसे लाभ देने वाली, सुविधा पहुंचाने वाली और रोजमर्रा की समस्याएं हल करने वाली संस्था के रूप में भी देखता है।
और यही भारतीय चुनावों का नया दौर है- ‘सरकार हटाओ’ की राजनीति से ‘सरकार ने क्या दिया’ की राजनीति तक।