
जोधपुर के अमृत नाहटा ने सिनेमा में अपनी पहचान बनाई। ‘किस्सा कुर्सी का’ उनके फिल्मी जीवन का सबसे चर्चित अध्याय बना। (फोटो :पत्रिका)
राजस्थान के सिनेमा इतिहास में कुछ ऐसे नाम हैं, जिनका फिल्मी काम संख्या में भले कम रहा हो, लेकिन उसका असर भारतीय सार्वजनिक जीवन पर बहुत दूर तक दिखाई दिया। अमृत नाहटा ऐसा ही नाम है। जोधपुर में जन्मे नाहटा ने देश की राजनीति, साहित्य और सिनेमा-तीनों क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी बनाई राजनीतिक व्यंग्य फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ ने इमरजेंसी के दौर में सत्ता, सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर देश में बड़ा सवाल खड़ा किया।
| पार्ट 1: फिल्म | पार्ट 2: वर्ष | पार्ट 3: पहचान |
|---|---|---|
| संत ज्ञानेश्वर | 1965 | धार्मिक जीवनीपरक फिल्म |
| रातों का राजा | 1967 | रहस्य/अपराध शैली |
| किस्सा कुर्सी का | 1975/1978 | राजनीतिक व्यंग्य और सेंसरशिप विवाद |
नाहटा का जीवन केवल एक विवादित फिल्म की कहानी नहीं है। वे सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता, सांसद, लेखक, अनुवादक और सामाजिक कार्यकर्ता भी रहे। वे चौथी से छठी लोकसभा के सदस्य रहे और राजस्थान की बाड़मेर व पाली संसदीय सीटों का प्रतिनिधित्व करते रहे और 1977 से 1979 के दौरान लोकसभा की प्राक्कलन समिति के सदस्य भी रहे।
अमृत नाहटा का जन्म 16 मई 1928 को जोधपुर में हुआ। उन्होंने जोधपुर के जसवंत कॉलेज से कला संकाय में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की। उनका शुरुआती झुकाव शिक्षा, साहित्य और सामाजिक गतिविधियों की ओर रहा। बाद में यही रुचियां उनके सार्वजनिक जीवन की पहचान बनीं।
नाहटा को केवल फिल्मकार के रूप में याद करना उनके व्यक्तित्व को छोटा कर देना होगा। वे अनुवादक और लेखक भी थे। उन्होंने अंग्रेजी से हिंदी में कई पुस्तकों का अनुवाद किया। उपलब्ध जीवनी विवरणों में मैक्सिम गोर्की, जोसेफ़ स्टालिन, व्लादिमीर लेनिन, माओ त्से-तुंग और लीउ शाओची से संबंधित पुस्तकों के हिंदी अनुवाद का उल्लेख मिलता है। लोकसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी उन्हें ‘मैन ऑफ लेटर्स’ यानी साहित्यिक अभिरुचि वाला व्यक्ति बताया गया है।
उन्होंने अंग्रेजी साप्ताहिक ‘Aspect’ का संपादन किया और राजस्थान के प्रमुख समाचार-पत्रों के संपादकीय पृष्ठों में भी नियमित योगदान दिया। इस तरह उनकी सार्वजनिक भूमिका राजनीति तक सीमित नहीं थी।
अमृत नाहटा की राजनीतिक यात्रा कांग्रेस से जुड़ी रही। वे 1967 और 1971 में बाड़मेर से लोकसभा के लिए चुने गए। आपातकाल के बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और जनता पार्टी से जुड़े। सन 1977 के चुनाव में वे पाली से लोकसभा पहुंचे। इस तरह वे तीन बार संसद के सदस्य रहे।
संसद के बाहर भी उनका सामाजिक काम जारी रहा। लोकसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार वे 1969-70 में जोधपुर रेड क्रॉस सोसाइटी के सचिव और 1969-71 में ऑल इंडिया पीस काउंसिल से जुड़े रहे। उन्होंने सहकारिता आंदोलन, परिवार नियोजन, शहरी सामुदायिक विकास, सार्वजनिक स्वच्छता और निषेध जैसे सामाजिक कार्यक्रमों में भी भाग लिया।
यानी नाहटा का व्यक्तित्व उस दौर के उस सार्वजनिक बुद्धिजीवी की तस्वीर पेश करता है, जिसके लिए राजनीति केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं थी। लेखन, सामाजिक गतिविधियां और सार्वजनिक बहस उनके जीवन का हिस्सा थीं।
अमृत नाहटा का फिल्मी सफर लंबा नहीं था, लेकिन उनकी तीन फिल्मों का उल्लेख भारतीय सिनेमा के इतिहास में मिलता है। उनकी शुरुआती फिल्म ‘संत ज्ञानेश्वर’ 1965 में आई। यह संत ज्ञानेश्वर के जीवन पर आधारित धार्मिक जीवनीपरक फिल्म थी।
इसके बाद 1967 में ‘रातों का राजा’ आई, जिसे अपराध और रहस्य की शैली से जोड़ा जाता है। इसके लगभग एक दशक बाद उनकी तीसरी और सबसे चर्चित फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ सामने आई।
इन तीन फिल्मों में पहली दो मुख्यधारा के मनोरंजन और धार्मिक-कथात्मक सिनेमा की दिशा में थीं, जबकि तीसरी फिल्म सीधे राजनीतिक व्यवस्था पर व्यंग्य करती थी। यही फिल्म आगे चलकर अमृत नाहटा की पहचान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई।
‘किस्सा कुर्सी का’ की कहानी भारतीय राजनीति के तत्कालीन माहौल पर तीखा व्यंग्य थी। फिल्म में राजनीतिक सत्ता, उसके आसपास के लोगों और सत्ता के इस्तेमाल पर सवाल उठाए गए थे। समकालीन रिपोर्टों और बाद के फिल्म इतिहास लेखों में फिल्म को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी से जुड़े राजनीतिक माहौल पर व्यंग्य के रूप में वर्णित किया गया है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि फिल्म को आपातकाल लागू होने के बाद अचानक नहीं बनाया गया था। अमृत नाहटा ने बाद में स्पष्ट किया था कि फिल्म अप्रैल 1975 में पूरी हो चुकी थी, जबकि देश में आपातकाल जून 1975 में लगाया गया। उस समय फिल्म प्रमाणन की प्रक्रिया में थी।
फिल्म ने सेंसर बोर्ड के स्तर पर भी गंभीर आपत्तियों का सामना किया। सन 2026 में प्रकाशित एक विस्तृत मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अप्रेल 1975 में प्रमाणन के लिए जमा फिल्म पर 51 आपत्तियां उठाई गई थीं। आपातकाल घोषित होने के बाद फिल्म पर प्रतिबंध लगा और उसके प्रिंट जब्त कर लिए गए।
‘किस्सा कुर्सी का’ विवाद का सबसे गंभीर अध्याय इसके प्रिंट और नेगेटिव के गायब होने से जुड़ा था। फिल्म के प्रिंट और मास्टर सामग्री को लेकर मामला अदालत तक पहुंचा। बाद में यह आरोप सामने आया कि फिल्म की सामग्री को गुड़गांव स्थित मारुति कारखाने ले जाकर नष्ट किया गया।
इस मामले की जांच और मुकदमे ने इसे सिर्फ एक फिल्मी विवाद नहीं रहने दिया। यह आपातकाल के दौरान सत्ता और संस्थाओं के संबंधों का बड़ा मामला बन गया। मीडिया के अभिलेखीय लेखों में इस मामले को संजय गांधी और तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री वी.सी. शुक्ल से जुड़े मुकदमे के रूप में दर्ज किया गया है।
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी सावधानी भी जरूरी है। बाद के न्यायिक रिकॉर्ड में मामले के अलग-अलग पहलुओं और आरोपों पर न्यायिक निष्कर्ष दर्ज हैं। 1985 के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म के प्रिंट और नेगेटिव के नष्ट किए जाने से जुड़े एक पक्ष पर पूर्ववर्ती आपराधिक निर्णय को पलटते हुए आरोपितों को बरी किए जाने का उल्लेख किया। इसलिए इस पूरे प्रकरण को केवल एकतरफा राजनीतिक आरोप के रूप में लिखना ऐतिहासिक रूप से अधूरा होगा।
आपातकाल समाप्त होने और सत्ता परिवर्तन के बाद ‘किस्सा कुर्सी का’ प्रकरण की जांच का राजनीतिक महत्व और बढ़ गया। शाह आयोग का गठन आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों की जांच के लिए किया गया था। फिल्म के प्रिंट नष्ट किए जाने का मामला भी उस व्यापक दौर की जांच और उसके बाद की न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ा।
सन 1979 में दिल्ली की अदालत ने संजय गांधी और वी.सी. शुक्ल को फिल्म के प्रिंट नष्ट किए जाने के मामले में दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई। इंडिया टुडे के तत्कालीन अभिलेख में दोनों को दो वर्ष के कठोर कारावास की सजा दिए जाने का विवरण है। बाद में इस फैसले की न्यायिक स्थिति बदली और मामला आगे भी कानूनी प्रक्रिया से गुजरा।
इस पूरे प्रकरण ने भारतीय लोकतंत्र में एक बड़ा सवाल उठाया—क्या सत्ता के खिलाफ राजनीतिक व्यंग्य को सिर्फ इसलिए रोका जा सकता है क्योंकि वह सत्ताधारी नेतृत्व पर तीखी टिप्पणी करता है? इसी वजह से ‘किस्सा कुर्सी का’ आज भी भारतीय सिनेमा में सेंसरशिप और राजनीतिक व्यंग्य की चर्चा के दौरान याद की जाती है।
आपातकाल समाप्त होने के बाद अमृत नाहटा ने ‘किस्सा कुर्सी का’ को दोबारा बनाया। इस बार फिल्म नए कलाकारों के साथ तैयार हुई। उपलब्ध फिल्म अभिलेखों में शबाना आज़मी, राज बब्बर और उत्पल दत्त जैसे कलाकारों के नाम मिलते हैं। फिल्म को दोबारा सेंसर प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। नई फिल्म में भी कई कट मांगे गए और अंततः यह 16 फरवरी 1978 को सिनेमाघरों में पहुंची।
भारतीय सिनेमा के इतिहास में इस फिल्म की खासियत यह है कि इसका विवाद फिल्म की कहानी से कहीं आगे चला गया। फिल्म के मूल संस्करण का गायब होना, आपातकाल की सेंसर व्यवस्था, अदालतों में चली कानूनी लड़ाई और बाद में उसका दोबारा बनाया जाना-इन सबने इसे एक ऐतिहासिक दस्तावेज जैसा महत्व दिया।
अमृत नाहटा की पहचान केवल ‘किस्सा कुर्सी का’ तक सीमित नहीं थी। संसद के आधिकारिक रिकॉर्ड में उनके राजनीतिक और सामाजिक कामों का विस्तृत उल्लेख है। वे प्राक्कलन समिति के सदस्य रहे और राजस्थान से जुड़े कई सामाजिक क्षेत्रों में सक्रिय रहे। साहित्य और पत्रकारिता में भी उनका योगदान था।
सन 2001 में उनके निधन के समय प्रकाशित समाचार रिपोर्टों में भी उन्हें पूर्व सांसद और ‘किस्सा कुर्सी का’ के निर्माता के रूप में याद किया गया। उनका नई दिल्ली में उपचार के दौरान 26 अप्रेल 2002 को निधन हुआ। उस समय वे 73 वर्ष के थे।
राजस्थान की फिल्मी पहचान अक्सर अभिनेता, लोककला, राजस्थानी लोकेशन और हिंदी सिनेमा की शूटिंग से जोड़ी जाती है। अमृत नाहटा की कहानी इससे अलग है। वे राजस्थान की धरती से निकले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने फिल्म को सीधे राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का माध्यम बनाया।
उनकी फिल्में केवल तीन थीं, लेकिन ‘किस्सा कुर्सी का’ का प्रभाव उनकी फिल्म संख्या से नहीं, बल्कि उसके ऐतिहासिक संदर्भ से तय होता है। उन्होंने सिनेमा को सत्ता पर टिप्पणी करने वाले माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया। यही कारण है कि दशकों बाद भी भारतीय सिनेमा में राजनीतिक व्यंग्य, सेंसरशिप और आपातकाल की चर्चा होती है तो अमृत नाहटा का नाम सामने आता है।
नाहटा की विरासत इसलिए भी अलग है कि उनका जीवन तीन अलग-अलग संसारों—राजनीति, साहित्य और सिनेमा—को जोड़ता है। जोधपुर से शुरू हुई यह यात्रा लोकसभा तक पहुंची, साहित्यिक अनुवादों से गुजरी और अंततः ऐसी फिल्म तक पहुंची जिसने भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे विवादास्पद दौर पर सवाल खड़े किए।
बहरहाल,‘किस्सा कुर्सी का’ के कारण अमृत नाहटा भारतीय सिनेमा के इतिहास में हमेशा याद किए जाएंगे। लेकिन उनका पूरा जीवन बताता है कि वे केवल एक विवादित फिल्म के निर्माता नहीं थे। वे उस पीढ़ी के सार्वजनिक व्यक्तित्व थे, जिसने राजनीति को साहित्य, पत्रकारिता, सामाजिक काम और सिनेमा के साथ जोड़कर देखा। राजस्थान के सिनेमा इतिहास में इसी व्यापक पहचान के कारण अमृत नाहटा का स्थान विशिष्ट है।
Updated on:
23 Aug 2026 02:41 pm
Published on:
23 Aug 2026 02:38 pm
