
असम और नागालैंड की सीमा पर जमीन के नीचे छिपे तेल और प्राकृतिक गैस को निकालने का रास्ता करीब तीन दशक बाद खुला है। 11 जून 2026 को केंद्र, असम और नागालैंड ने त्रिपक्षीय समझौता किया, जिसके बाद दोनों राज्यों की विवादित सीमा के तय हिस्सों में तेल-गैस की खोज और उत्पादन को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हुआ। यह समझौता करीब 1,000 वर्ग किमी से ज्यादा क्षेत्र और छह चिन्हित क्षेत्रों से जुड़ा है।
लेकिन बड़ा सवाल यही है, इतने साल तक तेल जमीन के नीचे क्यों पड़ा रहा और अब इससे असम-नागालैंड को कितनी कमाई हो सकती है?
अभी यह कहना सही नहीं होगा कि जमीन के नीचे निश्चित रूप से कितना तेल और गैस मौजूद है, क्योंकि नई खोज और मूल्यांकन के बाद ही वास्तविक भंडार का पता चलेगा।
हालांकि उपलब्ध आकलन काफी दिलचस्प हैं। उद्योग से जुड़े अनुमानों के मुताबिक विवादित क्षेत्र में लगभग 250 मिलियन बैरल तक इन-प्लेस तेल भंडार हो सकता है। इसमें से करीब 30-40% ही तकनीकी और आर्थिक रूप से निकाला जा सकने वाला हिस्सा हो सकता है। सरकार ने छह चिन्हित हाइड्रोकार्बन क्षेत्रों से ₹15,000 करोड़ से ज्यादा की संभावित रिकवरी वैल्यू बताई है।
यानी यह कोई छोटा तेल क्षेत्र नहीं है, लेकिन इसे सीधे “250 मिलियन बैरल पक्का भंडार” कहना भी गलत होगा। यह अनुमान है, प्रमाणित उत्पादन योग्य भंडार नहीं।
गृहमंत्री अमित शाह के मुताबिक इस क्षेत्र में मौजूदा तेल निकासी क्षमता करीब 1,000-1,500 बैरल प्रतिदिन है और नए समझौते के बाद इसे 10 गुना से ज्यादा बढ़ाने की संभावना है।
| आंकड़ा | स्थिति |
|---|---|
| विवादित क्षेत्र | 1,000+ वर्ग किमी |
| चिन्हित क्षेत्र | 6 |
| मौजूदा निकासी | 1,000-1,500 बैरल/दिन |
| संभावित वृद्धि | 10 गुना से अधिक |
| एक क्षेत्र की संभावित रिकवरी | ₹15,000 करोड़+ |
| अनुमानित इन-प्लेस तेल | करीब 250 मिलियन बैरल |
असम और नागालैंड के बीच सीमा विवाद नया नहीं है। दोनों राज्य करीब 512 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं। सीमा को लेकर विवाद सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित है। असम सरकार ने 1988 में मूल वाद दायर किया था। विवादित इलाकों को Disputed Area Belt यानी DAB कहा जाता है।
समस्या यह थी कि जिन इलाकों में तेल और गैस मौजूद थे, वहां यह तय करना आसान नहीं था कि प्रशासनिक और राजस्व अधिकार किस राज्य के माने जाएं।
इसका असर तेल कंपनियों के काम पर भी पड़ा। नागालैंड के Changpang तेल क्षेत्र में ONGC का संचालन मई 1994 से बंद है। संसद के एक रिकॉर्ड के मुताबिक नागालैंड में ONGC ने 2.69 मिलियन टन तेल का स्थापित भंडार बताया था, लेकिन गतिविधियां 1994 में निलंबित हो गई थीं। यानी मामला सिर्फ सीमा विवाद का नहीं था। इसमें भूमि अधिकार, रॉयल्टी, पर्यावरण, सुरक्षा और स्थानीय लोगों की सहमति जैसे सवाल भी जुड़े थे।
2026 का समझौता सीमा विवाद को खत्म नहीं करता। यह महत्वपूर्ण बात है। MoU के तहत दोनों राज्यों ने तय किया कि विवादित सीमा के चिन्हित क्षेत्रों में तेल और गैस गतिविधियां आगे बढ़ाई जा सकती हैं, जबकि दोनों राज्यों के क्षेत्रीय दावे और सुप्रीम कोर्ट में चल रही कार्यवाही प्रभावित नहीं होगी।
यानी सरल भाषा में: सीमा विवाद अपनी जगह → तेल-गैस की खोज अपनी जगह। इस व्यवस्था से कंपनियों को काम करने के लिए ज्यादा स्पष्टता मिलेगी और दोनों राज्य संयुक्त रूप से प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकेंगे।
यह समझौते का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। MoU में तय व्यवस्था के अनुसार चिन्हित क्षेत्र में खनिज तेल गतिविधियों से मिलने वाली रॉयल्टी, शुल्क, कर और दूसरी वैधानिक रकम असम और नागालैंड के बीच 50:50 के अनुपात में साझा की जाएगी। यानी अगर किसी चिन्हित क्षेत्र से राजस्व आता है तो दोनों राज्यों को बराबर हिस्सा मिलेगा।
यह नागालैंड के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है। राज्य लंबे समय से विवादित क्षेत्रों से निकलने वाले तेल की रॉयल्टी में हिस्सेदारी की मांग करता रहा है। 2025 में भी राज्य सरकार ने बताया था कि विवादित क्षेत्र के तेल से मिलने वाली रॉयल्टी साझा करने का मुद्दा बातचीत में था।
यहीं इस पूरी योजना की अगली परीक्षा होगी। तेल की कमाई सिर्फ सरकारों के खाते में पहुंचना पर्याप्त नहीं है। जिन इलाकों में ड्रिलिंग होगी, वहां रहने वाले लोगों को जमीन, रोजगार, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और स्थानीय विकास के रूप में वास्तविक फायदा मिलना जरूरी है।
नागालैंड में स्थानीय संगठनों ने पहले ही मांग उठाई है कि खोज शुरू करने से पहले भूमि मालिकों के अधिकार, स्थानीय सहमति और पर्यावरणीय सुरक्षा स्पष्ट की जाए। इसलिए आगे तीन सवाल महत्वपूर्ण होंगे:
कुछ हद तक मदद जरूर मिल सकती है, लेकिन इसे भारत की तेल जरूरत का बड़ा समाधान कहना जल्दबाजी होगी। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 88% से ज्यादा आयात करता है। ऐसे में घरेलू उत्पादन का हर अतिरिक्त बैरल महत्वपूर्ण है।लेकिन अगर इस क्षेत्र की मौजूदा क्षमता 1,000-1,500 बैरल प्रतिदिन से 10 गुना भी बढ़ती है, तब भी यह भारत की कुल खपत की तुलना में सीमित मात्रा होगी। इसका बड़ा फायदा शायद स्थानीय अर्थव्यवस्था, पूर्वोत्तर की ऊर्जा व्यवस्था और क्षेत्र में निवेश के रूप में दिखाई दे।
समझौता हो गया है, लेकिन जमीन के नीचे से तेल निकालना आसान नहीं होगा। क्षेत्र का बड़ा हिस्सा पहाड़ी, वन क्षेत्र और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाला है। भारी ड्रिलिंग मशीनें पहुंचाना, सड़क बनाना, पर्यावरणीय मंजूरी लेना और स्थानीय स्तर पर सहमति बनाना बड़ी चुनौतियां होंगी।
30 साल तक तेल इसलिए नहीं रुका था कि तेल खत्म हो गया था, बल्कि सीमा, अधिकार और सुरक्षा का विवाद रास्ते में था। अब 2026 का समझौता उस राजनीतिक अड़चन को हटाने की कोशिश है। जमीन के नीचे कितना वास्तविक तेल-गैस है, इसका जवाब नई खोज और ड्रिलिंग के बाद ही मिलेगा। फिलहाल उपलब्ध आकलन 250 मिलियन बैरल तक इन-प्लेस संसाधन और छह क्षेत्रों से ₹15,000 करोड़ से अधिक संभावित रिकवरी की ओर इशारा करते हैं।
अगर खोज सफल होती है तो असम और नागालैंड दोनों को 50:50 राजस्व हिस्सेदारी, केंद्र को घरेलू ऊर्जा उत्पादन का फायदा और स्थानीय लोगों को रोजगार व विकास के अवसर मिल सकते हैं।
लेकिन असली सफलता तब मानी जाएगी जब तेल जमीन के नीचे से निकले और उसका फायदा जमीन के ऊपर रहने वाले लोगों तक भी पहुंचे।