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भारत के युवा क्यों हो रहे हार्ट अटैक का शिकार? डॉ. प्रताप सी रेड्डी ने बताया कारण, शेयर किया अनुभव

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में भारत में हार्ट अटैक के मामले बढ़े हैं। भारत की युवा आबादी में हार्ट अटैक के मामले अधिक दर्ज हुए हैं। डॉ. प्रताप सी रेड्डी ने भारतीय युवाओं में बढ़ रहे हार्ट अटैक के मामलों के पीछे का कारण बताया है।
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भारत

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Vinay Shakya

Aug 19, 2026

Heart Attack in Young Adults

सांकेतिक इमेज (सोर्स-AI Creative)

भारत की युवा आबादी में बढ़ते दिल के दौरे के मामलों ने स्वास्थ्य क्षेत्र में गंभीर चिंता पैदा कर दी है। अपोलो हॉस्पिटल्स ग्रुप के संस्थापक और वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रताप सी रेड्डी ने एक पुराना, लेकिन बेहद अहम अनुभव साझा किया है। डॉ. रेड्डी ने अपना अनुभव शेयर रकते हुए भारत की युवा आबादी में बढ़ते दिल के दौरे के मामलों की मुख्य वजह समझाने की कोशिश की है।

1991 की घटना ने डॉ. रेड्डी को झकझोर दिया

डॉ. प्रताप सी रेड्डी ने बताया कि जब वे भारत लौटे, तो उन्होंने बड़ी संख्या में युवाओं को दिल की गंभीर समस्याओं से जूझते देखा। उन्होंने एक चौंकाने वाली घटना का जिक्र किया, जब 1991 में 3 भारतीय डॉक्टरों की उनके ड्यूटी रूम में ही मौत हो गई थी। इस घटना ने उस वक्त पूरे मेडिकल समुदाय में हड़कंप मचा दिया था। शुरुआत में लोगों ने इसका कारण शारीरिक निष्क्रियता, घी और नारियल तेल के अधिक सेवन को माना।

बाद में घटना की जांच में सामने आया कि हार्ट अटैक की असली वजह कुछ और ही थी। डॉ. रेड्डी के मुताबिक, साबित हुआ कि करीब 3 शताब्दियों पहले पड़े एक भीषण अकाल ने दक्षिण एशियाई आबादी के जीन को स्थायी रूप से बदल दिया। जिसकी वजह से इस क्षेत्र के लोग बहुत कम उम्र में ही दिल के दौरे के प्रति संवेदनशील हो गए। डॉ. रेड्डी का कहना है कि यही आनुवांशिक कारण है कि भारतीयों को हृदय स्वास्थ्य को लेकर सामान्य वैश्विक मानकों से कहीं ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है।

क्या कहते हैं आंकड़े?

डॉ. रेड्डी का यह अनुभव अकेला नहीं है, बल्कि आधिकारिक आंकड़े भी इसी रुझान की पुष्टि करते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हृदयाघात से होने वाली मौतों में पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। साल 2022 में करीब 12.5 प्रतिशत हार्ट अटैक के मामले बढ़े। जिसमें 32 हजार से अधिक लोगों की जान गई।

इंडियन हार्ट एसोसिएशन की रिपोर्ट और भी चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय पुरुषों में होने वाले हर दूसरे हृदयाघात का शिकार 50 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति होता है, जबकि हर चौथा मामला 40 वर्ष से कम उम्र में सामने आता है। कोविड-19 महामारी के बाद के वर्षों में यह प्रवृत्ति और तेज हुई है, जिसे विशेषज्ञ बदलती जीवनशैली से भी जोड़कर देखते हैं।

दक्षिण एशियाई शरीर की खास बनावट

चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण एशियाई मूल के लोगों में हृदय रोग का जोखिम आनुवांशिक रूप से अधिक होता है। इस क्षेत्र से जुड़े हृदय रोग विशेषज्ञों के मुताबिक भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका जैसे देशों के लोगों में सामान्य कोलेस्ट्रॉल स्तर होने के बावजूद भी दिल का दौरा पड़ने का खतरा वैश्विक औसत से करीब एक दशक पहले ही शुरू हो जाता है। यही वजह है कि सामान्य दिखने वाली रिपोर्ट भी इस आबादी के लिए भ्रामक साबित हो सकती है।

हार्ट अटैक के कारण

विशेषज्ञ हार्ट अटैक के पीछे आनुवांशिक जोखिम के अलावा कई जीवनशैली संबंधी कारणों को भी जिम्मेदार मानते हैं। जयपुर स्थित SMS मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. दीपक माहेश्वरी ने हाल ही में एक सार्वजनिक चर्चा में कहा कि धूम्रपान, डायबिटीज, मोटापा, अनियंत्रित ब्लड प्रेशर, गलत जीवनशैली के साथ-साथ वायु प्रदूषण, मानसिक तनाव और शारीरिक निष्क्रियता भी युवाओं में हृदयाघात के प्रमुख कारण हैं। इसके अलावा अत्यधिक तला-भुना, प्रोसेस्ड और मीठा भोजन खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ाता है, जिससे ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर दोनों प्रभावित होते हैं। लगातार काम का दबाव, नींद की कमी और पारिवारिक-आर्थिक तनाव भी दिल पर सीधा असर डालते हैं। लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहने की आदत भी रक्त संचार को प्रभावित कर धमनियों पर दबाव बढ़ाती है।

बचाव और विशेषज्ञों की राय

चिकित्सकों के अनुसार, समय रहते सतर्कता बरत कर हृदयाघात के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए नियमित रूप से ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल की जांच कराना जरूरी है। खासकर 30 वर्ष की उम्र के बाद इन बातों को ध्यान रखना जरूरी है। धूम्रपान और तंबाकू सेवन से पूरी तरह परहेज करने की सलाह दी जाती है। सप्ताह में कम से कम 5 दिन नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित और कम तेल-घी वाला आहार, पर्याप्त नींद तथा तनाव प्रबंधन को हृदय स्वास्थ्य के लिए अहम माना जाता है।

विशेषज्ञ यह भी सुझाव देते हैं कि दक्षिण एशियाई मूल के लोगों को, भले ही उनकी सामान्य रिपोर्ट सामान्य दिखे, पारिवारिक इतिहास और आनुवांशिक जोखिम को ध्यान में रखते हुए समय-समय पर विशेष हृदय जांच जरूर करानी चाहिए। डॉ. प्रताप सी रेड्डी का अनुभव इस बात की याद दिलाता है कि भारत में हृदय स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत आदतों का मसला नहीं, बल्कि आनुवांशिक और सामाजिक कारकों से जुड़ा एक व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दा है। जिस पर जागरूकता और समय पर जांच के जरिए ही काबू पाया जा सकता है।