
पश्चिम एशिया में बना एक नया सैन्य गठजोड़ अब भारत के पड़ोस तक पहुंचता दिख रहा है। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच 7 अगस्त 2026 को हुए "मक्का संयुक्त रक्षा समझौते" (Mecca Joint Defence Agreement) में अब बांग्लादेश ने भी शामिल होने के स्पष्ट संकेत दिए हैं, जिससे नई दिल्ली की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।
पिछले महीने 7 अगस्त को मक्का में हुए एक शिखर सम्मेलन के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन ने इस रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसका मूल प्रावधान नाटो के अनुच्छेद-5 जैसा है। समझौते के तहत इन तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमले को तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इसके साथ ही तीनों देश आपस में रक्षा तकनीक भी साझा करेंगे।
दरअसल यह समझौता सितंबर 2025 में रियाद में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए द्विपक्षीय "सामरिक पारस्परिक रक्षा समझौते" का विस्तार है, जिसमें अब तुर्की को भी शामिल कर लिया गया है। कई विश्लेषक इसे "इस्लामिक नाटो" की शुरुआत बता रहे हैं, हालांकि अंतरराष्ट्रीय थिंक-टैंक जैसे अटलांटिक काउंसिल और मिडिल ईस्ट आई का आकलन है कि यह अभी नाटो जैसा सुसंगठित सैन्य गठबंधन नहीं है।
इन तीनों देशों के अलग-अलग सुरक्षा हित, सुन्नी नेतृत्व को लेकर आपसी होड़ और पाकिस्तान-तुर्की के ईरान के साथ जटिल रिश्ते इसे सीमित करते हैं। पाकिस्तान का परमाणु शस्त्रागार गठजोड़ को रणनीतिक वजन जरूर देता है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार इससे सऊदी अरब या तुर्की को स्वतः परमाणु छत्रछाया नहीं मिल जाती।
फरवरी 2026 में हुए आम चुनाव में बीएनपी की भारी जीत के बाद तारिक रहमान करीब दो दशक बाद पहली बार बांग्लादेश के प्रधानमंत्री बने। यानी करीब 35 साल बाद देश को पुरुष प्रधानमंत्री मिला। इसी सरकार के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने संसद में एक निर्दलीय सांसद के सवाल पर कहा था कि निमंत्रण मिलने पर बांग्लादेश मक्का समझौते में शामिल होने पर सकारात्मक रूप से विचार करेगा। रहमान ने इसे मुस्लिम परिवार का आंतरिक मामला बताते हुए कहा कि दूसरों को इस पर चिंता करने की जरूरत नहीं है।
इसके कुछ दिन बाद विदेश राज्य मंत्री और प्रधानमंत्री तारिक रहमान के विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर ने ढाका में सऊदी राजदूत अब्दुल्ला जफर बिन अबियाह से मुलाकात के बाद पत्रकारों से कहा कि इस समझौते में शामिल होने से बांग्लादेश के अन्य देशों के साथ संबंध प्रभावित नहीं होंगे। इसमें उसे कोई जोखिम नजर नहीं आता और यह नए अवसर पेश करने वाला अनूठा समझौता है।
कबीर के मुताबिक जेद्दा यात्रा के दौरान सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान के साथ भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई थी, जिसमें प्रतिक्रिया बेहद सकारात्मक रही। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि फिलहाल इस पर बातचीत जारी है और सभी द्विपक्षीय साझेदारों के साथ चर्चा सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है।
भारत सरकार ने अब तक बांग्लादेश के इन बयानों पर सीधी टिप्पणी नहीं की है। लेकिन दिल्ली में इस समझौते को लेकर पूछे गए सवाल पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग में कहा था कि भारत अपनी सुरक्षा को प्रभावित करने वाले सभी घटनाक्रमों पर करीबी नजर रखता है। उसे सुनिश्चित करने के लिए जरूरी कदम भी उठाता है। भू-राजनीतिक नजरिए से देखें तो पाकिस्तान इस समझौते में पहले से शामिल है।
अगर बांग्लादेश भी इसका हिस्सा बनता है, तो भारत खुद को पश्चिम में पाकिस्तान और पूर्व में बांग्लादेश दोनों तरफ इस त्रिपक्षीय गठजोड़ से जुड़े पड़ोसियों के बीच पाएगा। विश्लेषकों ने यह भी नोट किया है कि इस समझौते का असर सिर्फ दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं है। इससे इजरायल के साथ-साथ तुर्की के विस्तारित प्रभाव को लेकर ग्रीस और साइप्रस जैसे देश भी भारत के करीब आ सकते हैं, जो भारत-इजरायल रणनीतिक साझेदारी को नई गति दे सकता है।