2 सितंबर 2026,

बुधवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

Explainer: सिक्किम में ग्लेशियर झीलों पर क्यों लगाया अत्याधुनिक सेंसर का पहरा, क्या है GLOF आपदा, जानिए

सिक्किम सरकार ने हिमालयी ग्लेशियल झीलों पर अत्याधुनिक सेंसर लगाने शुरू कर दिए हैं। इससे GLOF जैसी प्राकृतिक आपदाओं की समय रहते सटीक चेतावनी मिल सकेगी।
2 min read
Google source verification

भारत

image

MI Zahir

Sep 02, 2026

Himalayan Hydropower Projects News

नेपाल में आई महाप्रलय से सबक लेकर अब हिमालयी हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स को सुरक्षा और पर्यावरण के लिहाज से नये सिरे से पुख्ता करने की जरूरत है। ( फोटो: Google Gemini .)

हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण असंतुलन के कारण उत्पन्न होने वाले खतरे अब विकराल रूप धारण करते जा रहे हैं। सिक्किम सरकार और सिक्किम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SSDMA) ने पड़ोसी क्षेत्रों की त्रासदियों से कड़ा सबक लेते हुए एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी कदम उठाया है। राज्य प्रशासन ने हिमालयी उच्च तुंगता (high-altitude) वाली ग्लेशियल झीलों पर अत्याधुनिक सेंसर और ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन स्थापित करने की एक व्यापक परियोजना शुरू की है, जिसका मुख्य उद्देश्य संभावित 'ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड' (GLOF) की पूर्व चेतावनी समय रहते प्राप्त करना है।

सिक्किम ग्लेशियर झील निगरानी और GLOF आपदा प्रबंधन प्रणाली

विषय / चरणप्रमाणिक तथ्य व विश्लेषण सामरिक व सुरक्षात्मक प्रभाव
भौगोलिक जोखिमराज्य में 400 से अधिक ग्लेशियल झीलें, जिनमें से 16 अतिसंवेदनशील चिह्नित।जलवायु परिवर्तन के कारण मोरेन टूटने और अचानक बाढ़ (GLOF) का निरंतर खतरा।
तकनीकी समाधानवाटर-लेवल सेंसर, प्रेशर प्रोब्स और ऑटोमैटिक वेदर स्टेशनों की स्थापना।दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों से रियल-टाइम डेटा और त्वरित चेतावनी प्राप्त करना संभव।
आपदा प्रबंधनसिक्किम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SSDMA) द्वारा संचालित निगरानी योजना।समय रहते निचले इलाकों को सुरक्षित करना और बड़ी जनहानि को रोकना।

सिक्किम के सामने क्यों है गंभीर जोखिम?

वैज्ञानिक शोधों और आधिकारिक रिपोर्ट्स के अनुसार, सिक्किम की भौगोलिक बनावट बेहद संवेदनशील है। चार अक्टूबर 2023 को दक्षिण ल्होनक झील (South Lhonak Lake) में अचानक आए सैलाब ने राज्य के उत्तरी जिलों में भीषण तबाही मचाई थी, जिसमें बुनियादी ढांचे और जनजीवन को भारी क्षति पहुंची थी। भूवैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण ग्लेशियर अत्यधिक तीव्र गति से पिघल रहे हैं, जिससे इन झीलों का दायरा और जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। झीलों के मुहाने पर बनी प्राकृतिक मलवे की दीवारें (मोरैन) इस बढ़ते जलदाब को लंबे समय तक रोकने में असमर्थ साबित हो सकती हैं, जिससे अचानक बाढ़ का खतरा हमेशा बना रहता है।

अति संवेदनशील झीलों की पहचान और तकनीकी निगरानी

आपदा प्रबंधन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, सिक्किम के पहाड़ी इलाकों में 400 से अधिक छोटी-बड़ी ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं। इनमें से 85 झीलों को जोखिम के दायरे में रखा गया है, जबकि 16 झीलों को अतिसंवेदनशील (Highly Vulnerable) श्रेणी में चिन्हित किया गया है। इन खतरनाक झीलों में से अधिकांश उत्तरी और पश्चिमी सिक्किम के दुर्गम क्षेत्रों में स्थित हैं। इन स्थलों पर अब आधुनिक तकनीक आधारित निगरानी प्रणालियां लगाई जा रही हैं ताकि किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए प्रशासन पूरी तरह तैयार रहे।

अत्याधुनिक सेंसर और अर्ली वार्निंग सिस्टम की कार्यप्रणाली

इन पर्वतीय झीलों पर तैनात किए जा रहे तकनीकी उपकरणों की कार्यप्रणाली पूरी तरह स्वचालित और रियल-टाइम डेटा पर आधारित है:

वाटर-लेवल सेंसर: ये उन्नत उपकरण झील के जलस्तर में होने वाले सूक्ष्म से सूक्ष्म बदलावों को मापते हैं और जलस्तर अचानक बढ़ने पर केंद्रीय नियंत्रण कक्ष को तुरंत संकेत भेजते हैं।

प्रेशर प्रोब्स और जियोटेक्निकल सेंसर: झीलों के किनारों और मोरेन की दीवारों पर पड़ने वाले जलदाब तथा भूगर्भीय हलचलों की सटीक जानकारी जुटाने में ये सहायक होते हैं।

ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन: अत्यधिक वर्षा, हिमस्खलन और तापमान में होने वाले उतार-चढ़ाव का पल-पल का ब्योरा दर्ज करते हैं।

अर्ली वार्निंग सायरन नेटवर्क: सेंसर से प्राप्त डेटा का विश्लेषण कर निचले इलाकों में बस्तियों और सैन्य चौकियों को खतरे की घंटी या सायरन के माध्यम से तुरंत अलर्ट किया जाता है।

सिक्किम का यह कदम अन्य हिमालयी राज्यों के लिए उदाहरण

विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की पुख्ता और वैज्ञानिक निगरानी प्रणाली से आपदा को टाला तो नहीं जा सकता, परंतु जनहानि को न्यूनतम करने में यह अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध होगी। सिक्किम का यह कदम देश के अन्य हिमालयी राज्यों के लिए भी एक अनुकरणीय उदाहरण बन रहा है।