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हिंदुत्व या मुफ्त की योजनाएं? भारत में वोट दिलाने वाला असली ‘लाभार्थी मॉडल’ कितना मजबूत है

Beneficiary Model vs Ideology Indian Elections : भारतीय राजनीति में 'लाभार्थी मॉडल' और हिंदुत्व या सामाजिक न्याय जैसी विचारधाराओं के बीच का गणित समझें। जानिए कैसे सरकारी योजनाएं चुनाव में वोट दिलाने वाला सबसे मजबूत हथियार बन चुकी हैं।
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Aug 22, 2026
Beneficiary Model vs Ideology Indian Elections
Beneficiary Model vs Ideology Indian Elections : सरकार बनाने में योजनाएं कितनी कारगर, PC- Chatgpt

भारतीय राजनीति में लंबे समय तक चुनाव जाति, धर्म, क्षेत्र और नेतृत्व के मुद्दों पर लड़े जाते रहे हैं। लेकिन पिछले एक दशक में एक नया शब्द राजनीतिक शब्दकोश का हिस्सा बना है- ‘लाभार्थी वर्ग’ (Beneficiary Class)। यह उन करोड़ों लोगों का समूह है जिन्हें सरकार की किसी न किसी योजना का सीधा लाभ मिला है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या अब सड़क, राशन, मकान, गैस और नकद सहायता जैसी योजनाएं विचारधारा से भी बड़ा चुनावी मुद्दा बन गई हैं?

क्या है ‘लाभार्थी मॉडल’?

लाभार्थी मॉडल का मतलब है ऐसी सरकारी योजनाएं जिनका फायदा सीधे नागरिकों तक पहुंचे और वे सरकार के साथ एक प्रत्यक्ष जुड़ाव महसूस करें। केंद्र और राज्य सरकारों ने पिछले वर्षों में करोड़ों लोगों को राशन, मकान, गैस, शौचालय, नकद सहायता और स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाएं दी हैं।

कितने बड़े हैं ये लाभार्थी समूह(प्रमुख केंद्रीय योजनाएं)?

योजनालाभार्थी
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना / NFSA80 करोड़ से अधिक लोग
प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण + शहरी)4 करोड़ से अधिक मकान स्वीकृत/निर्मित
उज्ज्वला योजना10 करोड़ से अधिक LPG कनेक्शन
पीएम किसान सम्मान निधिलगभग 11 करोड़ किसान
आयुष्मान भारत55 करोड़ से अधिक पात्र आबादी
जल जीवन मिशन15 करोड़ से अधिक ग्रामीण घरों तक नल कनेक्शन

इन आंकड़ों से साफ है कि देश का बड़ा हिस्सा किसी न किसी सरकारी योजना से जुड़ा हुआ है।

भाजपा के लिए यह मॉडल क्यों महत्वपूर्ण है?

भाजपा ने हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के साथ-साथ ‘डिलीवरी आधारित राजनीति’ पर भी जोर दिया है। पार्टी का दावा है कि उसने योजनाओं का लाभ सीधे लाभार्थियों तक पहुंचाया है। यही कारण है कि चुनावी भाषणों में राम मंदिर, अनुच्छेद 370 और राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ उज्ज्वला, आवास, शौचालय और मुफ्त राशन का भी लगातार उल्लेख होता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने एक ऐसा सामाजिक गठबंधन बनाने की कोशिश की है जिसमें जातीय पहचान के साथ लाभार्थी पहचान भी जुड़ जाए।

विपक्ष का जवाब क्या है?

विपक्षी दल भी अब केवल सामाजिक न्याय या धर्मनिरपेक्षता की राजनीति तक सीमित नहीं हैं। वे रोजगार, महंगाई, जातिगत जनगणना और कल्याणकारी योजनाओं के विस्तार को बड़ा मुद्दा बना रहे हैं। कई राज्यों में विपक्ष ने नकद सहायता आधारित योजनाओं को चुनावी हथियार बनाया है।

कुछ प्रमुख राज्य योजनाएं

राज्यप्रमुख योजना
कर्नाटकगृह लक्ष्मी, अन्न भाग्य
तेलंगानामहालक्ष्मी, रायथु बंधु
तमिलनाडुमुफ्त बस यात्रा, सामाजिक सहायता योजनाएं
पश्चिम बंगाललक्ष्मी भंडार
मध्य प्रदेशलाड़ली बहना
महाराष्ट्रलाडकी बहिन
दिल्लीमुफ्त बिजली-पानी, महिला सहायता योजनाएं

क्या योजनाएं चुनाव जिताती हैं?

  • मध्य प्रदेश में लाड़ली बहना योजना को बड़ा राजनीतिक फैक्टर माना गया।
  • पश्चिम बंगाल में लक्ष्मी भंडार योजना को महिलाओं के बीच लोकप्रियता मिली।
  • कई राज्यों में मुफ्त राशन और नकद सहायता ने सरकारों को राजनीतिक लाभ पहुंचाया।

सवाल है कि क्या योजनाएं चुनाव जिताती हैं तो इसका उत्तर है कि नहीं, लेकिन थोड़ा-बहुत प्रभाव अवश्य डालती हैं। ऊपर दिए गए वह प्रदेश हैं जिनमें योजनाओं का असर दिखा।

ऐसे कई उदाहरण हैं जहां सरकारें योजनाएं चलाने के बावजूद चुनाव हार गईं। इसका मतलब है कि मतदाता केवल लाभ देखकर वोट नहीं करता। स्थानीय नेतृत्व, महंगाई, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था, जातीय समीकरण और राजनीतिक माहौल भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

विचारधारा बनाम लाभार्थी: क्या बदल रहा है?

राजनीति में अब यह मुकाबला "विचारधारा बनाम योजनाएं" नहीं बल्कि "विचारधारा + योजनाएं" बनता जा रहा है। मतदाता किसी पार्टी की वैचारिक पहचान से जुड़ सकता है, लेकिन उसे यह भी दिखना चाहिए कि सरकार उसके जीवन में क्या बदलाव ला रही है। यही कारण है कि आज चुनावी बहस में मंदिर और जाति के साथ राशन, मकान और नकद सहायता भी बराबर चर्चा में हैं।

क्या सड़क, राशन और मकान नया चुनावी मुद्दा बन चुके हैं?

काफी हद तक हां। आज का मतदाता सिर्फ वादे नहीं बल्कि अपने जीवन में दिखाई देने वाले बदलाव को भी महत्व देता है। पक्की सड़क, मुफ्त राशन, गैस सिलेंडर, मकान, नल का पानी और बैंक खाते में आने वाली सहायता राशि ऐसे मुद्दे बन गए हैं जो सीधे परिवारों को प्रभावित करते हैं।

हालांकि भारत जैसे विविध देश में चुनाव अब भी कई स्तरों पर लड़े जाते हैं। धर्म, जाति, नेतृत्व और स्थानीय मुद्दे पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं, लेकिन ‘लाभार्थी राजनीति’ ने खुद को एक नए और शक्तिशाली चुनावी कारक के रूप में स्थापित कर लिया है।

Updated on:
22 Aug 2026 04:20 pm
Published on:
22 Aug 2026 04:20 pm