
जब भी किसी शहर की सुरक्षा की बात होती है, तो सबसे पहले जेहन में सड़कें, ड्रेनेज और बाढ़-नियंत्रण जैसी बुनियादी सुविधाएं आती हैं। लेकिन असल में कोई शहर कितना सुरक्षित है, यह सिर्फ इन भौतिक ढांचों से तय नहीं होता। इसे तय करती है शहर की “रेजिलिएंसी” यानी लचीलापन - यह क्षमता कि शहर, वहां की संस्थाएं और नागरिक मिलकर गर्मी, बाढ़, भारी बारिश जैसी चुनौतियों का किस तरह सामना करते हैं, और रोजमर्रा की जिंदगी को कितनी जल्दी पटरी पर लाते हैं।
शहरी लचीलापन का दायरा पानी, सफाई, स्वास्थ्य, परिवहन जैसी बुनियादी सेवाओं से कहीं ज्यादा बड़ा है। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि चेतावनी प्रणाली कितनी असरदार है, स्थानीय प्रशासन आपात स्थिति में कितनी तेजी से फैसले ले पाता है, कमजोर तबकों तक मदद कितनी जल्दी पहुंचती है, और नागरिक इन योजनाओं में कितने शामिल हैं। यानी सड़क और नाली अच्छी होने का मतलब यह नहीं कि शहर लचीला भी है।
भारत में बाढ़, हीटवेव, भारी बारिश जैसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं - मुंबई में मई 2025 की रिकॉर्ड बारिश ने यह साफ कर दिया कि सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर होना काफी नहीं, तैयारी और तालमेल भी उतना ही जरूरी है।
शहर की असली ताकत परखने के लिए इन बिंदुओं पर गौर करें:
सरकार और संस्थाएं इस दिशा में कई पहल कर रही हैं।
सुधार तो हो रहा है, लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता अब भी चुनौती
एक हालिया अध्ययन में मध्य भारत के 10 जिलों में जलवायु लचीलापन सूचकांक में सुधार पाया गया - खासकर अनुकूलन क्षमता और तेजी में। लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता में कोई खास बढ़ोतरी नहीं मिली, यानी शहर तात्कालिक झटकों से तो जल्दी उबर रहे हैं, पर स्थायी बदलाव अब भी अधूरा है।
एक अन्य शोध के मुताबिक मुंबई जैसे शहरों में बाढ़ से निपटने के लिए ड्रेनेज नेटवर्क मजबूत करना जरूरी तो है, पर यह अकेला उपाय काफी नहीं।
लचीलापन सिर्फ योजनाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, इसका असर आम नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी में दिखना चाहिए। अहमदाबाद में “कूल रूफ्स” और बस स्टॉप पर स्प्रिंकलर जैसी सस्ती और असरदार तकनीकों ने गर्मी से राहत दी और स्वास्थ्य जोखिम घटाया।
बेंगलुरु में विकसित “Neralu” नामक पोर्टेबल शेल्टर बाहरी कामगारों को तेज गर्मी से बचाने में मदद करता है - यह स्थानीय जरूरतों और सस्ती सामग्री से तैयार किया गया है।
अब जब पता चल गया कि शहर की सुरक्षा सिर्फ सड़क और ड्रेनेज का मामला नहीं, तो अपने शहर को ऊपर दिए गए बिंदुओं पर परखें - क्या वहां कोई क्लाइमेट एक्शन प्लान है, जोखिम आंकलन हुआ है, चेतावनी तंत्र मजबूत है, और स्थानीय भागीदारी हो रही है? यदि जवाब न में है, तो यही सही समय है स्थानीय प्रशासन से सवाल पूछने, सुझाव देने और नागरिकों को जागरूक करने का।