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सिर्फ सड़कें और ड्रेनेज नहीं, ये चीजें तय करती हैं कितना सेफ है आपका शहर, ऐसे परखें उसकी ‘रेजिलिएंसी’

क्या आपके शहर में जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने की ताकत है? जानिए, कैसे लचीलापन आपके जीवन को सुरक्षित और सुविधाजनक बना सकता है, और क्या कदम उठाए जा रहे हैं इस दिशा में!
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Aug 18, 2026
city future plan
प्रतीकात्मक तस्वीर | ChatGPT

जब भी किसी शहर की सुरक्षा की बात होती है, तो सबसे पहले जेहन में सड़कें, ड्रेनेज और बाढ़-नियंत्रण जैसी बुनियादी सुविधाएं आती हैं। लेकिन असल में कोई शहर कितना सुरक्षित है, यह सिर्फ इन भौतिक ढांचों से तय नहीं होता। इसे तय करती है शहर की “रेजिलिएंसी” यानी लचीलापन - यह क्षमता कि शहर, वहां की संस्थाएं और नागरिक मिलकर गर्मी, बाढ़, भारी बारिश जैसी चुनौतियों का किस तरह सामना करते हैं, और रोजमर्रा की जिंदगी को कितनी जल्दी पटरी पर लाते हैं।

रेजिलिएंसी को समझिए

शहरी लचीलापन का दायरा पानी, सफाई, स्वास्थ्य, परिवहन जैसी बुनियादी सेवाओं से कहीं ज्यादा बड़ा है। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि चेतावनी प्रणाली कितनी असरदार है, स्थानीय प्रशासन आपात स्थिति में कितनी तेजी से फैसले ले पाता है, कमजोर तबकों तक मदद कितनी जल्दी पहुंचती है, और नागरिक इन योजनाओं में कितने शामिल हैं। यानी सड़क और नाली अच्छी होने का मतलब यह नहीं कि शहर लचीला भी है।

भारत में बाढ़, हीटवेव, भारी बारिश जैसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं - मुंबई में मई 2025 की रिकॉर्ड बारिश ने यह साफ कर दिया कि सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर होना काफी नहीं, तैयारी और तालमेल भी उतना ही जरूरी है।

अपने शहर की रेजिलिएंसी ऐसे परखें

शहर की असली ताकत परखने के लिए इन बिंदुओं पर गौर करें:

  • योजना है या नहीं: क्या आपके नगर निगम या विकास प्राधिकरण के पास कोई क्लाइमेट एक्शन प्लान या लचीलापन रणनीति है?
  • जोखिम आंकलन: क्या शहर ने अपने जलवायु जोखिम, एक्सपोजर और संवेदनशीलता की पहचान की है (जैसे CHVA जैसे फ्रेमवर्क से)?
  • चेतावनी और प्रतिक्रिया तंत्र: बाढ़ या हीटवेव जैसी स्थिति में चेतावनी कितनी जल्दी और किस माध्यम से लोगों तक पहुंचती है?
  • स्थानीय भागीदारी: क्या योजनाएं बनाते समय स्थानीय निवासियों, खासकर कमजोर तबकों की राय ली जाती है?
  • सस्ती, जमीनी तकनीकें: क्या कूल रूफ्स, छायादार बस स्टॉप, स्प्रिंकलर, हरियाली जैसे उपाय अपनाए जा रहे हैं?
  • दीर्घकालिक स्थिरता: क्या सुधार सिर्फ तात्कालिक राहत तक सीमित हैं, या लंबी अवधि में टिकाऊ बदलाव की तरफ बढ़ रहे हैं?

देश में हो रहे प्रयास

सरकार और संस्थाएं इस दिशा में कई पहल कर रही हैं।

  • CapaCITIES कार्यक्रम, जो 2016 में शुरू हुआ था, भारतीय शहरों को कम कार्बन और जलवायु-लचीले विकास के लिए उपकरण और ज्ञान देता आ रहा है। 14 जुलाई 2026 को दिल्ली में इसके दस साल पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम में तीन नए ज्ञान उत्पाद लॉन्च किए गए।
  • WRI इंडिया ने महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल में “Climate Hazard and Vulnerability Assessment (CHVA)” फ्रेमवर्क पेश किया है, जो शहरों को जलवायु जोखिम, एक्सपोजर और संवेदनशीलता समझने में मदद करता है।
  • ACCCRN (Asian Cities Climate Change Resilience Network) के तहत 20 शहरों — धर्मशाला, देहरादून, पटना, कोची आदि — में स्थानीय कमजोरियों के आधार पर लचीलापन रणनीतियां बनाई गईं।
  • कुछ शहरों में ठोस कदम भी दिख रहे हैं: सूरत में क्लाइमेट चेंज ट्रस्ट, चेतावनी प्रणाली और स्वास्थ्य-लचीलापन केंद्र बनाए गए; इंदौर में झीलों की बहाली, कूल रूफ्स और जल प्रबंधन जैसे उपाय हुए; गोरखपुर में कृषि, जलवायु-लचीले घर और स्थानीय योजना शामिल की गई।
  • मुंबई ने 2050 तक नेट-जीरो लक्ष्य के साथ अपना पहला क्लाइमेट एक्शन प्लान तैयार किया है, जिसमें बाढ़ और पानी निकासी जैसे मुद्दों पर काम हो रहा है।

सुधार तो हो रहा है, लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता अब भी चुनौती

एक हालिया अध्ययन में मध्य भारत के 10 जिलों में जलवायु लचीलापन सूचकांक में सुधार पाया गया - खासकर अनुकूलन क्षमता और तेजी में। लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता में कोई खास बढ़ोतरी नहीं मिली, यानी शहर तात्कालिक झटकों से तो जल्दी उबर रहे हैं, पर स्थायी बदलाव अब भी अधूरा है।

एक अन्य शोध के मुताबिक मुंबई जैसे शहरों में बाढ़ से निपटने के लिए ड्रेनेज नेटवर्क मजबूत करना जरूरी तो है, पर यह अकेला उपाय काफी नहीं।

नागरिकों की जिंदगी में असली फर्क

लचीलापन सिर्फ योजनाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, इसका असर आम नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी में दिखना चाहिए। अहमदाबाद में “कूल रूफ्स” और बस स्टॉप पर स्प्रिंकलर जैसी सस्ती और असरदार तकनीकों ने गर्मी से राहत दी और स्वास्थ्य जोखिम घटाया।

बेंगलुरु में विकसित “Neralu” नामक पोर्टेबल शेल्टर बाहरी कामगारों को तेज गर्मी से बचाने में मदद करता है - यह स्थानीय जरूरतों और सस्ती सामग्री से तैयार किया गया है।

अब जब पता चल गया कि शहर की सुरक्षा सिर्फ सड़क और ड्रेनेज का मामला नहीं, तो अपने शहर को ऊपर दिए गए बिंदुओं पर परखें - क्या वहां कोई क्लाइमेट एक्शन प्लान है, जोखिम आंकलन हुआ है, चेतावनी तंत्र मजबूत है, और स्थानीय भागीदारी हो रही है? यदि जवाब न में है, तो यही सही समय है स्थानीय प्रशासन से सवाल पूछने, सुझाव देने और नागरिकों को जागरूक करने का।

Updated on:
18 Aug 2026 05:13 pm
Published on:
18 Aug 2026 05:13 pm