
शहरों की चकाचौंध और तेज रफ्तार जिंदगी के बीच, आपराधिक आंकड़े भी बदल रहे हैं। आधुनिक तकनीक, जैसे- CCTV कैमरे, डेटा एनालिटिक्स, स्मार्ट सिटी सेंटर जैसी सुविधाएं इस बदलाव में एक अहम भूमिका निभा रही हैं। आइए जानते हैं कि क्या आधुनिक तकनीक अपराध को रोकने में मदद कर रही है? नए संसाधन अपराध रोकने में कितने कारगर हैं?
स्मार्ट सिटी मिशन के तहत 100 शहरों में इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर (ICCC) स्थापित किए गए हैं। यहां डेटा, निगरानी और रियल-टाइम मॉनिटरिंग का उपयोग होता है। इसमें 84,000 से अधिक सीसीटीवी कैमरे, 1,884 इमरजेंसी कॉल बॉक्स और 3,000 पब्लिक एड्रेस सिस्टम शामिल हैं। इस व्यवस्था का असर भी दिखाई देने लगा है।
सार्वजनिक रूप से प्रति व्यक्ति के हिसाब से अपराध के आंकड़े कम हुए हैं। शहरों में सीसीटीवी कैमरों की मौजूदगी से अपराधियों को पकड़ने में मदद मिल रही है। उदाहरण के लिए, चेन्नई में प्रति वर्ग मील 615 कैमरे हैं, जबकि बेंगलुरु में केवल 18; कोलकाता में 56, मुंबई में 145 कैमरे हैं। यह अंतर दर्शाता है कि तकनीकी कवरेज शहरों में भिन्न है, और इसका प्रभाव भी अलग-अलग हो सकता है।
तकनीक अपराध को रोकने में सहायक हो सकती है, लेकिन वही तकनीक नए अपराधों को जन्म भी दे रही है। उदाहरण के लिए, बेंगलुरु में 2024 में 17,561 साइबर अपराध दर्ज हुए। देश में सबसे अधिक, जबकि कोलकाता में केवल 21 मामले सामने आए। कुल मिलाकर, 2024 में पूरे देश में साइबर अपराधों में 17.9% की वृद्धि हुई, और कुल मामले 1,01,928 रहे। यह स्पष्ट है कि डिजिटल कनेक्टिविटी और ऑनलाइन लेन-देन जितना बढ़ा है, साइबर अपराध भी उसी अनुपात में बढ़े हैं। तकनीक ने अपराध की नई राहें खोल दी हैं। पहचान की चोरी, ऑनलाइन धोखाधड़ी, साइबर स्टॉकिंग जैसी घटनाएं अब आम हो गई हैं।
NCRB के आंकड़ों के अनुसार, 19 मेट्रो शहरों में 2022 में कुल आबादी का केवल 8.12% हिस्सा रहने के बावजूद, वे कुल अपराधों का 14.65% हिस्सा थे। यानी बड़े शहरों में अपराध की दर अपेक्षाकृत अधिक है। लेकिन यह भी ध्यान देने योग्य है कि रिपोर्टिंग बेहतर होने से अपराध दर अधिक दिख सकती है।
शहरों में पुलिस स्टेशन, जागरूकता और शिकायत की सुविधा बेहतर होती है, जिससे अपराध दर्ज होने की संभावना अधिक रहती है। कुछ शहरों में अपराध दर अपेक्षाकृत कम हैं। कोलकाता, पुणे और हैदराबाद जैसे शहरों में अपराध दर कम दर्ज की गई है। यह दर्शाता है कि तकनीकी निगरानी और बेहतर पुलिसिंग से अपराध को नियंत्रित किया जा सकता है।
तकनीक मददगार है, वहीं इसकी सीमाएं भी स्पष्ट हैं। उदाहरण के लिए, पुलिसकर्मियों की संख्या राष्ट्रीय औसत से कम है। पुलिसकर्मियों की संख्या 152 प्रति 1,00,000 लोग, जबकि संयुक्त राष्ट्र की सिफारिश 222 है। कुछ शहरों में यह संख्या अधिक है (जैसे दिल्ली और मुंबई), लेकिन कई पुलिसकर्मी वीआईपी सुरक्षा या ट्रैफिक जैसे कार्यों में लगे हैं, जिससे अपराध जांच और नियंत्रण पर असर पड़ता है।
इसके अलावा, तकनीक का उपयोग तभी प्रभावी होता है, जब उसे सही तरीके से लागू किया जाए। जैसे- GIS आधारित अपराध मैपिंग, रूट ऑप्टिमाइजेशन और इंटीग्रेटेड कमांड सिस्टम। बिना प्रशिक्षण और डेटा विश्लेषण के, तकनीक केवल दिखावे तक सीमित रह जाती है।
शहरी अपराध केवल तकनीकी कमी से नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक असमानता, बेरोजगारी और सामाजिक नियंत्रण के टूटने से भी जुड़ा है। एक अध्ययन में पाया गया कि शहरों में असमान विकास और कम सजा दर (conviction rate) अपराध को बढ़ावा देती है। इसलिए, सिर्फ तकनीक अपराध को नहीं रोक सकती है। इसके साथ सामाजिक सुधार, न्याय प्रणाली की मजबूती और पुलिसिंग में सुधार भी आवश्यक हैं।