
राजस्थान में सामने आए हालिया साइबर ठगी के मामले बताते हैं कि अपराधियों के तरीके तेजी से बदल रहे हैं। कहीं फर्जी सिम और सोशल मीडिया प्रोफाइल के जरिए लोगों को निशाना बनाया जा रहा है, तो कहीं नकली कॉल सेंटर, व्हाट्सऐप पर अधिकारी या बॉस बनकर संदेश और रिश्तेदार बनकर भावनात्मक दबाव डाला जा रहा है। सरकारी योजनाओं से जुड़ी गड़बड़ियां भी इस समस्या का दूसरा पहलू सामने लाती हैं। इन मामलों में पुलिस की कार्रवाई हुई है, लेकिन घटनाएं यह भी बताती हैं कि डिजिटल सतर्कता अब हर नागरिक के लिए जरूरी हो गई है।
टोंक में पुलिस ने हाल ही में एक साइबर ठगी गिरोह का पर्दाफाश किया। पुलिस के अनुसार, नेटवर्क में 399 सिम कार्ड और कई बैंक खातों का इस्तेमाल किया गया था। 81 शिकायतों से जुड़े इस मामले में 11 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और ठगी की रकम करीब 2 करोड़ रुपये बताई गई है। गिरोह फर्जी प्रोफाइल और सोशल मीडिया के जरिए लोगों को अपने जाल में फंसाता था।
यह मामला दिखाता है कि साइबर अपराध अब केवल एक मोबाइल नंबर या एक फर्जी खाते तक सीमित नहीं है। अपराधी बड़ी संख्या में सिम, खातों और डिजिटल पहचान का इस्तेमाल कर नेटवर्क तैयार कर रहे हैं।
जयपुर के भांकरोटा इलाके में पुलिस ने अगस्त 2026 में एक फर्जी कॉल सेंटर का भंडाफोड़ किया। यह कार्रवाई राजस्थान पुलिस के ‘साइबर शील्ड’ अभियान के तहत हुई। पुलिस ने पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया। आरोप है कि गिरोह ऑनलाइन गेमिंग और निवेश के नाम पर लोगों को फंसाता था। जांच में आरोपियों से जुड़े खातों में 1 करोड़ रुपये से अधिक के संदिग्ध लेन-देन का पता चला। मोबाइल, लैपटॉप और अन्य डिजिटल उपकरण भी जब्त किए गए। यहां ठगी का सबसे बड़ा हथियार लालच था-जल्दी और ज्यादा मुनाफे का भरोसा। निवेश से जुड़ी किसी भी योजना में बिना सत्यापन पैसा लगाना इसी तरह के जोखिम को बढ़ा सकता है।
जयपुर में अप्रैल 2026 में सामने आया मामला साइबर ठगों की पहचान की नकल करने वाली रणनीति को उजागर करता है। एक कंपनी के अकाउंटेंट को व्हाट्सऐप पर कंपनी के चेयरमैन के नाम और फोटो वाले खाते से संदेश भेजे गए। अकाउंटेंट को लगा कि निर्देश कंपनी के शीर्ष अधिकारी की ओर से आए हैं और उसने बताए गए बैंक खातों में 5.30 करोड़ रुपये ट्रांसफर कर दिए। इस मामले में राजस्थान पुलिस ने 17 आरोपियों को गिरफ्तार किया।
इस घटना की सबसे बड़ी सीख है कि केवल प्रोफाइल फोटो, नाम या व्हाट्सऐप संदेश देखकर किसी भुगतान निर्देश को सही नहीं माना जा सकता। बड़ी रकम के मामले में दूसरे माध्यम से पुष्टि करना जरूरी है।
साइबर ठगी का सबसे खतरनाक पहलू उसका मनोवैज्ञानिक रूप भी है। राजस्थान हाईकोर्ट के अप्रैल 2026 के आदेश में 83 वर्षीय महिला से कथित ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ के नाम पर करीब 80 लाख रुपये ट्रांसफर कराने का मामला सामने आया। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, महिला को गंभीर मानसिक आघात हुआ और वह इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती भी हुई। अदालत ने मामले की गंभीरता और कथित संगठित साइबर अपराध को देखते हुए आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।
‘डिजिटल गिरफ्तारी’ कोई वास्तविक कानूनी प्रक्रिया नहीं है। पुलिस या कोई जांच एजेंसी वीडियो कॉल पर किसी व्यक्ति को घर में नजरबंद करके पैसे ट्रांसफर करने का आदेश नहीं देती।
राजस्थान के झालावाड़ से सामने आया सरकारी योजनाओं से जुड़ा घोटाला साइबर अपराध के एक अलग रूप को सामने लाता है। जांच में पीएम-किसान योजना में कम से कम 14.81 करोड़ रुपये की गड़बड़ी, राजस्थान डिजास्टर मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम में 3.62 करोड़ रुपये के संदिग्ध हस्तांतरण और झालावाड़ की पेंशन योजना में भी लगभग 3.62 करोड़ रुपये की अवैध निकासी का पता चला। जांच में 51 गिरफ्तारियां हुईं और 48 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई।
यह मामला केवल ऑनलाइन ठगी नहीं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड और लाभार्थी व्यवस्था में सेंध की गंभीर चुनौती को भी दिखाता है।
सवाई माधोपुर में पुलिस ने ऐसे आरोपी को गिरफ्तार किया, जो सोशल मीडिया पर सगाई और शादी से जुड़ी पोस्ट देखकर परिवार और रिश्तेदारों की जानकारी जुटाता था। इसके बाद वह लड़की की आवाज में फोन कर खुद को ‘साली’ बताता और बातचीत के जरिए भरोसा जीतकर पैसे ट्रांसफर करवाता था। पुलिस के मुताबिक, इस मामले से जुड़े संदिग्ध खातों पर साइबर हेल्पलाइन 1930 पर करीब 10 शिकायतें मिली थीं।
यह घटना बताती है कि सोशल मीडिया पर सार्वजनिक की गई छोटी-छोटी निजी जानकारियां भी ठगों के लिए उपयोगी हो सकती हैं।
इन घटनाओं में एक बात समान है-ठग पहले भरोसा पैदा करते हैं और फिर जल्दबाजी, डर या लालच का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए कुछ सावधानियां बेहद जरूरी हैं।
राजस्थान में सामने आए ये मामले बताते हैं कि साइबर ठगी अब सिर्फ तकनीकी धोखे का मामला नहीं रही। अपराधी तकनीक के साथ-साथ इंसानी मनोविज्ञान का इस्तेमाल कर रहे हैं। कभी लालच, कभी डर और कभी रिश्ते का भरोसा-हर बार निशाना व्यक्ति का विश्वास बनता है।
पुलिस की कार्रवाई जरूरी है, लेकिन शुरुआती कुछ मिनटों में पीड़ित की सतर्कता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। किसी भी संदिग्ध लेन-देन में देरी न करें, तुरंत बैंक और 1930 को सूचना दें। डिजिटल दुनिया में सावधानी ही ठगी के खिलाफ सबसे मजबूत सुरक्षा है।