
बारिश की अनिश्चितता, बढ़ती लागत और मंडी भावों के उतार-चढ़ाव के बीच दाल की खेती किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर उभरी है। देश में दालों की बढ़ती मांग और आयात पर निर्भरता कम करने की सरकारी कोशिशों ने भी इस क्षेत्र को नई गति दी है। ऐसे में सवाल है कि क्या अभी दाल की खेती में निवेश करना समझदारी भरा फैसला होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि इसका जवाब केवल बाजार भाव में नहीं, बल्कि मौसम, फसल चक्र और सरकारी समर्थन को एक साथ समझने में छिपा है।
केंद्र सरकार ने वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक के लिए ‘आत्मनिर्भरता मिशन फॉर पल्सेज’ शुरू किया है। मिशन का लक्ष्य 2030-31 तक दालों का उत्पादन 350 लाख टन और खेती का रकबा 310 लाख हेक्टेयर तक बढ़ाना है। इसके तहत किसानों को उन्नत बीज उपलब्ध कराने, मुफ्त बीज किट वितरित करने, प्रसंस्करण अवसंरचना विकसित करने और एमएसपी आधारित खरीद को मजबूत करने पर जोर दिया गया है। सरकार ने 1,000 दाल प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना और बड़े पैमाने पर प्रमाणित बीज वितरण का भी लक्ष्य रखा है।
दालों की खेती का लाभ काफी हद तक मौसम पर निर्भर करता है। खरीफ सीजन की फसलें मानसून पर आधारित होती हैं, इसलिए बारिश में देरी या कमी उत्पादन को प्रभावित कर सकती है। वहीं रबी दालें अपेक्षाकृत स्थिर मानी जाती हैं क्योंकि इनमें नमी की आवश्यकता कम होती है और कई क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध रहती है।
इसी वजह से कृषि विशेषज्ञ किसानों को स्थानीय मौसम पूर्वानुमान और जल उपलब्धता को ध्यान में रखकर निवेश का निर्णय लेने की सलाह देते हैं।
दालों की खेती तीन प्रमुख मौसमों में की जाती है। खरीफ में अरहर, मूंग और उड़द जैसी दालों की बुवाई मानसून के साथ होती है। इन फसलों में मौसम का जोखिम अपेक्षाकृत अधिक रहता है। रबी में चना, मसूर और मटर प्रमुख दालें हैं। इनकी उत्पादकता सामान्यतः अधिक मानी जाती है और बाजार में इनकी मांग भी स्थिर रहती है।
कुल्थी (हॉर्स ग्राम) जैसी दालें कम वर्षा वाले इलाकों में भी अच्छी उपज दे सकती हैं। सूखा सहन करने की क्षमता के कारण यह फसल जोखिम कम करने में मदद करती है।
दाल की खेती में लाभ केवल अच्छी पैदावार से तय नहीं होता। कटाई के समय बाजार में आवक बढ़ने से कई बार कीमतों पर दबाव आता है। जिन किसानों के पास भंडारण की सुविधा होती है, वे बाजार की स्थिति देखकर बाद में बिक्री कर बेहतर मूल्य प्राप्त कर सकते हैं।
हालांकि यह निर्णय स्थानीय बाजार, भंडारण लागत और नकदी की जरूरत को ध्यान में रखकर ही लेना चाहिए।
आत्मनिर्भरता मिशन के तहत किसानों को उन्नत बीज, प्रशिक्षण, तकनीकी सलाह, प्रसंस्करण सुविधाओं और खरीद व्यवस्था से जोड़ने की योजना है। मिशन का उद्देश्य उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करना और किसानों की आय में सुधार लाना भी है।
दाल की खेती में निवेश का सही समय वही है जब किसान मौसम, बाजार और सरकारी योजनाओं को साथ लेकर निर्णय करे। मौजूदा सरकारी समर्थन, बढ़ती मांग और आत्मनिर्भरता मिशन के कारण दाल क्षेत्र में अवसर बढ़े हैं। हालांकि लाभ सुनिश्चित करने के लिए फसल चयन, बुवाई का समय और बाजार रणनीति उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी अच्छी पैदावार। ऐसे में स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया गया निवेश किसानों के लिए बेहतर आय का आधार बन सकता है।