
रूसी तेल की बढ़ती खरीद से भारत को ऊर्जा सुरक्षा में सहारा मिला है, लेकिन अमेरिकी दबाव और वैश्विक बाज़ार की अनिश्चितता चुनौती बनी हुई है। ( फोटो: AI. )
पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक तेल आपूर्ति पर मंडराते जोखिमों के बीच भारत की कच्चे तेल खरीद रणनीति में रूस की भूमिका तेजी से बढ़ी है। जुलाई 2026 में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी रिकॉर्ड 50.83 प्रतिशत तक पहुंच गई। इस दौरान रूस से भारत ने करीब 2.47 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल खरीदा, जो पिछले साल जुलाई के मुकाबले 62.4 प्रतिशत अधिक था। जून में यह मात्रा लगभग 2.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन रही थी।
यह बढ़ोतरी सिर्फ सस्ते तेल की तलाश नहीं मानी जा सकती। इसके पीछे भारत की ऊर्जा सुरक्षा, रिफाइनरियों की जरूरत, पश्चिम एशिया में आपूर्ति जोखिम और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बीच लागत को नियंत्रित रखने की रणनीति एक साथ काम कर रही है।
रूसी तेल से ऊर्जा सुरक्षा, अमेरिका का दबाव और पेट्रोल-डीज़ल पर असर
| रूसी तेल | ग्लोबल प्रेशर | फ्यूल प्राइस |
|---|
| जुलाई में 50.83% हिस्सेदारी | अमेरिकी प्रतिबंध का जोखिम | पेट्रोल-डीज़ल पर सीधा असर नहीं |
| 2.47 मिलियन बैरल/दिन | संभावित अतिरिक्त टैरिफ | कच्चे तेल और रुपये की चाल अहम |
| सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता | वैकल्पिक स्रोत जरूरी | कर व रिफाइनिंग लागत भी महत्वपूर्ण |
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयातित कच्चे तेल पर निर्भर है। ऐसे में किसी प्रमुख समुद्री मार्ग में व्यवधान या पश्चिम एशिया से आपूर्ति में कमी सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकती है। इसी पृष्ठभूमि में रूसी तेल भारतीय रिफाइनरों के लिए वैकल्पिक और बड़े आपूर्ति स्रोत के रूप में उभरा है।
अप्रैल-जुलाई 2026 के दौरान भारत के कच्चे तेल आयात में रूस की औसत हिस्सेदारी 43.25 प्रतिशत रही, जो एक साल पहले करीब 37 प्रतिशत थी। इसी अवधि में मध्य-पूर्व की हिस्सेदारी 43 प्रतिशत से घटकर करीब 30 प्रतिशत हो गई। यानी भारत ने केवल रूस से खरीद नहीं बढ़ाई, बल्कि अपने आपूर्तिकर्ताओं का मिश्रण भी बदला है। लैटिन अमेरिकी देशों से आने वाले तेल की हिस्सेदारी भी बढ़कर करीब 12.7 प्रतिशत रही।
रूसी कच्चे तेल की प्रतिस्पर्धी कीमत भारतीय रिफाइनरों के लिए लंबे समय से आकर्षण का केंद्र रही है। भारत की बड़ी और जटिल रिफाइनिंग क्षमता अलग-अलग ग्रेड के कच्चे तेल को संसाधित कर सकती है। इससे रिफाइनरों को कच्चे माल की लागत और तैयार पेट्रोलियम उत्पादों के कारोबार के बीच बेहतर संतुलन बनाने में मदद मिलती है।
हालांकि सस्ता कच्चा तेल अपने आप सस्ता पेट्रोल-डीज़ल सुनिश्चित नहीं करता। अंतिम कीमत पर अंतरराष्ट्रीय तेल दर, रुपये की विनिमय दर, रिफाइनिंग लागत, कर और घरेलू मूल्य निर्धारण जैसे कई कारकों का असर होता है।
रूस से रिकॉर्ड खरीद के साथ भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल पश्चिमी प्रतिबंधों का है। अमेरिका में रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने से संबंधित कड़े प्रस्तावों ने भारतीय रिफाइनरों के लिए अनिश्चितता बढ़ाई है। अमेरिकी सीनेट ने रूसी तेल के खरीदारों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ का प्रावधान रखने वाले कानून को आगे बढ़ाया है, हालांकि इसे लागू होने के लिए आगे की विधायी प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
इसका मतलब है कि रूसी तेल की वास्तविक आर्थिक उपयोगिता केवल खरीद मूल्य से तय नहीं होगी। शिपिंग, बीमा, भुगतान व्यवस्था, प्रतिबंधों का अनुपालन और संभावित व्यापार शुल्क भी इसकी कुल लागत को प्रभावित कर सकते हैं।
रूस से अधिक तेल खरीदने का सीधा अर्थ यह नहीं है कि देश में पेट्रोल और डीज़ल की कीमत तत्काल घट जाएगी। भारत में खुदरा ईंधन कीमतों पर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत, रुपये की स्थिति, कर और तेल विपणन कंपनियों की लागत जैसे कई तत्व प्रभाव डालते हैं।
फिर भी रूसी तेल से मिलने वाली प्रतिस्पर्धी खरीद लागत वैश्विक तेल कीमतों में अचानक उछाल के असर को कुछ हद तक सीमित करने में मदद कर सकती है। इसके उलट, यदि प्रतिबंधों या व्यापार शुल्क के कारण रूसी तेल की लागत बढ़ती है, तो रिफाइनरों को दूसरे स्रोतों से महंगा कच्चा तेल खरीदना पड़ सकता है।
फिलहाल PPAC के अनुसार 28 अगस्त 2026 को दिल्ली में पेट्रोल की खुदरा कीमत 102.12 रुपये और डीज़ल की कीमत 95.20 रुपये प्रति लीटर थी। इससे स्पष्ट है कि रूसी तेल की रिकॉर्ड खरीद का असर घरेलू पंप कीमतों में सीधे और उसी अनुपात में दिखाई देना जरूरी नहीं है।
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात रूस से रिकॉर्ड खरीद से ज्यादा यह है कि वह अपनी ऊर्जा आपूर्ति को कई स्रोतों में बांट रहा है। रूस की हिस्सेदारी बढ़ी है, लेकिन मध्य-पूर्व के साथ-साथ लैटिन अमेरिका और अन्य आपूर्तिकर्ताओं से खरीद भी जारी है। यही विविधीकरण भारत को किसी एक देश या समुद्री मार्ग पर अत्यधिक निर्भर होने से बचा सकता है।
इसलिए मौजूदा रणनीति को केवल रूस पर निर्भरता कहना सही नहीं होगा। इसे भारत के बहु-स्रोत ऊर्जा सुरक्षा मॉडल के रूप में देखना ज्यादा उपयुक्त है।
आगे की दिशा तीन चीजें तय करेंगी-रूसी तेल पर पश्चिमी प्रतिबंधों की सख्ती, वैश्विक कच्चे तेल की कीमत और पश्चिम एशिया की स्थिति। यदि भारत प्रतिस्पर्धी कीमत पर कई स्रोतों से तेल हासिल करता रहता है, तो यह रणनीति ऊर्जा सुरक्षा के लिए मजबूत कवच बन सकती है। लेकिन रूस पर अत्यधिक निर्भरता के साथ भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ना भी उतना ही बड़ा सवाल रहेगा।
Updated on:
30 Aug 2026 10:22 am
Published on:
30 Aug 2026 10:22 am
