
सांकेतिक इमेज (सोर्स- gemini)
अमेरिका की चीन के साथ व्यापार में सख्ती, जैसे- टैरिफ बढ़ाना और आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव के बीच भारत को क्या लाभ मिल सकता है? यह सवाल अब वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक परिदृश्य में अहम हो गया है। हाल के घटनाक्रमों से स्पष्ट होता है कि इस तनावपूर्ण स्थिति में भारत के लिए अवसर भी हैं, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। अमेरिका ने चीन पर टैरिफ बढ़ाकर और तकनीकी निर्यात नियंत्रण कड़े करके चीन पर निर्भरता कम करने की रणनीति अपनाई है।
इस नीति का असर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर पड़ा है। भारत ने इस बदलाव को अवसर के रूप में देखा और अपनी व्यापार नीति तथा रणनीति में बदलाव किए। उदाहरण के लिए, भारत- अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते में 'रूल्स ऑफ ओरिजिन' को कड़ा किया गया, ताकि चीन से आने वाले हिस्सों को तीसरे देशों के माध्यम से भारत के रास्ते अमेरिका में प्रवेश करने से रोका जा सके।
एक आर्थिक मॉडल (CGE मॉडल) पर आधारित हालिया शोध से पता चलता है कि यदि अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ बढ़ते हैं, तो इससे भारत को घरेलू मांग में वृद्धि के रूप में लाभ हो सकता है। लेकिन यदि भारत स्वयं अपने टैरिफ में कटौती करे, जैसे- सभी व्यापारिक साझेदारों पर समान रूप से 25% कटौती तो उसका आर्थिक लाभ और भी दोगुना हो सकता है।
भारत–अमेरिका व्यापार समझौते से भी भारत को लाभ हुआ है। फरवरी 2026 में अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर लगने वाले टैरिफ को 50% से घटाकर 18% कर दिया। इससे भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा का बेहतर अवसर मिला। इस नए ढांचे में भारत की टैरिफ दर अन्य एशियाई देशों, जैसे- इंडोनेशिया (19%), बांग्लादेश और वियतनाम (20%) की तुलना में कम है, जबकि चीन पर यह दर लगभग 34% है। इससे भारत को अमेरिकी बाजार में एक स्पष्ट प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिली है।
अमेरिका-चीन के ट्रेड वार के बीच भारत के लिए लाभ और जोखिम दोनों की संभावना है। एक अध्ययन में पाया गया कि यदि अमेरिका चीन पर टैरिफ बढ़ाता है, तो भारत की GDP $1.56 बिलियन तक बढ़ सकती है, लेकिन यदि अमेरिका स्टील और एल्यूमिनियम पर 25% टैरिफ लगाता है, तो भारत के निर्यात में $1.32 बिलियन की गिरावट और GDP में $154 मिलियन का नुकसान हो सकता है। यह दर्शाता है कि लाभ और जोखिम दोनों मौजूद हैं। विशेषकर उस स्थिति में जब अमेरिकी नीतियां अचानक बदलती हैं।
नीति और रणनीति की दृष्टि से, भारत ने अमेरिका की चीन से दूरी बनाने की नीति को पूरी तरह अपनाने के बजाय एक अलग रास्ता चुना है। उसने चीन पर निर्भरता कम करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं, लेकिन पूरी तरह अलगाव (decoupling) नहीं किया है। इसके साथ ही, भारत ने अमेरिका के साथ कूटनीतिक संबंधों को बनाए रखते हुए अपने व्यापार समझौतों को तेज किया है।
अमेरिका–चीन व्यापार तनाव ने भारत को एक अवसर दिया है। विशेषकर आपूर्ति श्रृंखला में विविधता लाने, अमेरिकी बाजार में बेहतर पहुंच बनाने और घरेलू आर्थिक सुधारों को गति देने का। लेकिन यह लाभ तभी टिकाऊ होगा, जब भारत अपनी नीतियों में संतुलन बनाए रखे, घरेलू सुधारों को आगे बढ़ाए और वैश्विक व्यापार में सक्रिय भूमिका निभाए। अमेरिका–चीन व्यापार तनाव ने भारत को एक रणनीतिक मोड़ पर ला खड़ा किया है। यदि भारत समझदारी से काम करे, नीतिगत सुधार, व्यापार विस्तार और वैश्विक साझेदारी में संतुलन बनाए रखे तो यह मोड़ भारत के लिए एक अवसर बन सकता है।
Updated on:
29 Aug 2026 09:30 pm
Published on:
29 Aug 2026 09:30 pm
