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धान की बालियों पर हल्दी गांठ का प्रकोप: फाल्स स्मट और गंधी बग ने बढ़ाई किसानों की धड़कन, जानें कारण और बचाव

फाल्स स्मट और गंधी बग के प्रकोप से धान की फसल खराब हो रही है। इसकी वजह से किसानों की चिंता बढ़ गई है। जानिए, फाल्स स्मट और गंधी बग से फसल को बचाने के उपाय और वैज्ञानिकों की सलाह।
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Sep 10, 2026
false smut and stink bug in paddy crop
सांकेतिक इमेज (सोर्स- Chatgpt)

धान की पकाई के समय देश के कई हिस्सों से फसल पर फाल्स स्मट यानी हल्दिया रोग (कंडुआ रोग) और गंधी बग कीट के प्रकोप की खबरें आने लगी हैं। हल्दिया रोग (कंडुआ रोग) और गंधी बग कीट के प्रकोप से धान की फसल खराब हो रही है।

किन इलाकों में रोग का असर?

हरियाणा के कैथल जिले के पूंडरी क्षेत्र में धान की बालियों पर पीले और नारंगी रंग के फफूंदनुमा गोले दिखाई देने से किसानों ने कृषि विभाग से खेतों के निरीक्षण की मांग की है। वहीं, उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर के तराई क्षेत्र में भी बालियों पर पीली और काली-हरी फफूंद की गांठें बनने से उपज घटने की आशंका जताई जा रही है। छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार में भी कृषि वैज्ञानिकों ने मौजूदा नमी भरे मौसम को देखते हुए किसानों को धान, अरहर और मक्का की नियमित निगरानी की सलाह दी है।

क्या है फाल्स स्मट और गंधी बग?

फाल्स स्मट यानी हल्दिया या कंडुआ रोग एक फफूंद जनित बीमारी है, जो अंग्रेजी में "फाल्स स्मट" और वैज्ञानिक भाषा में अस्टीलेजिनॉइडिया वाइरेंस नामक कवक से होती है। यह असल में सच्चा कंडुआ नहीं, बल्कि दाने के भीतर विकसित होने वाला मिथ्या कवक-गोला है। इसलिए इसे "मिथ्या कंडुआ" भी कहा जाता है। पुष्पीकरण के दौरान बालियों में कुछ दाने पीले-नारंगी फफूंदी गोलों में बदल जाते हैं, जो बाद में हरे-काले रंग के हो जाते हैं।

गंधी बग (वैज्ञानिक नाम लेप्टोकोरिसा एक्यूटा) एक कीट है जो धान का प्रमुख शत्रु माना जाता है। इसके शरीर से एक विशेष दुर्गंध निकलती है, जिस वजह से इसे "गंधी बग" कहा जाता है। यह पतला, हरा-पीला कीट शुरुआत में कोमल पत्तियों व तनों का रस चूसता है और बाद में बालियों में दूध भरने की अवस्था में दानों को चूसकर खोखला व हल्का बना देता है।

फसल को कितना नुकसान होता है?

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अधीन राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, कटक के वैज्ञानिकों द्वारा ओडिशा में किए गए एक खरीफ मौसम के अध्ययन में विभिन्न धान किस्मों में फाल्स स्मट का प्रकोप 6 से 33 प्रतिशत तक और रोग की गंभीरता की सीमा काफी व्यापक पाई गई। एक अन्य समीक्षा अध्ययन के अनुसार, अनुकूल परिस्थितियों में रोग प्रकोप 5 से 85 प्रतिशत तक और उपज हानि लगभग 0.2 से 49 प्रतिशत तक जा सकती है।

ऊधम सिंह नगर में कृषि रक्षा अधिकारी के हवाले से बताया गया कि यदि एक बाली में 5 से 10 दाने भी खराब हो जाएं, तो प्रति एकड़ दो से तीन क्विंटल तक पैदावार घट जाती है। रोगग्रस्त धान का चावल गुणवत्ता में कमजोर होने से मंडी में कम भाव पाता है और मिलर ऐसी उपज खरीदने से बचते हैं। यह रोग बीज जनित भी है, यानी संक्रमित बीज अगली फसल में भी रोग फैला सकते हैं। गंधी बग भी बालियों का रस चूसकर दानों को खोखला कर देता है, जिससे उपज और गुणवत्ता दोनों पर सीधा असर पड़ता है।

ये रोग-कीट क्यों फैलते हैं?

कैथल के खंड कृषि अधिकारी डॉ. बलवान सिंह के अनुसार, फूल आने के समय बारिश, अधिक नमी, बादल छाए रहना और नाइट्रोजन उर्वरक का अत्यधिक प्रयोग फाल्स स्मट के फैलने की प्रमुख वजहें हैं। ऊधम सिंह नगर के कृषि अधिकारियों ने भी बताया कि जलभराव वाले क्षेत्रों में अधिक नमी, लगातार बारिश और वायुमंडलीय आर्द्रता बढ़ने से यह रोग तेजी से पनपता है। यह रोग हवा के जरिये तथा मिट्टी में मौजूद फफूंद के बीजाणुओं से भी फैलता है। गंधी बग कीट सामान्यतः जून से नवंबर के बीच सक्रिय रहता है और दिन में पौधों की छाया वाले हिस्सों में छिपकर सुबह-शाम अधिक सक्रिय होता है।

रोग से बचाव के क्या उपाय हैं?

कृषि विशेषज्ञों की सलाह है कि बालियां निकलने और फूल आने से पहले ही 500 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड को 200 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें, या प्रोपिकोनाजोल 25 प्रतिशत घोल 500-600 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें। साथ ही खेत में नाइट्रोजन/यूरिया की अधिक मात्रा से बचने और संतुलित उर्वरक अपनाने की सलाह दी जाती है।

गंधी बग के नियंत्रण के लिए सुबह 8 बजे से पहले या शाम 5 बजे के बाद कीटनाशकों का छिड़काव कारगर माना जाता है, क्योंकि इसी समय कीट सक्रिय रहता है। खेत के आसपास के खरपतवार नष्ट करना, जैविक नियंत्रण के लिए नीम बीज चूर्ण के घोल का छिड़काव, तथा स्वस्थ व प्रमाणित बीज का उपयोग भी रोग-कीट के प्रकोप को कम करने में सहायक बताया गया है।

किसानों के लिए सुझाव

कृषि अधिकारियों ने किसानों से अपील की है कि फसल में लक्षण दिखते ही स्थानीय कृषि विशेषज्ञों या कृषि विज्ञान केंद्र से तुरंत संपर्क करें, क्योंकि छिड़काव का सही समय पुष्पीकरण से ठीक पहले का होता है और देरी होने पर नुकसान बढ़ सकता है। खेतों की नियमित निगरानी, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और जलनिकासी का उचित प्रबंध कर इन दोनों समस्याओं से काफी हद तक बचा जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते सतर्कता बरतने से ही किसान इस सीजन में अपनी मेहनत की फसल को सुरक्षित रख पाएंगे।

Updated on:
10 Sept 2026 04:24 pm
Published on:
10 Sept 2026 04:24 pm