
अरब देशों की पहचान मानी जाने वाली खजूर की खेती अब भारत के सूखे इलाकों में भी किसानों की किस्मत बदल रही है। खजूर की खेती भारत में विशेष रूप से गुजरात के कच्छ और पश्चिमी राजस्थान के शुष्क इलाकों में तेजी से बढ़ रही है। यह फसल 45 डिग्री सेल्सियस से अधिक की भीषण गर्मी, रेतीली मिट्टी और खारे पानी को सहन कर सकती है, जो अन्य फसलों के लिए कठिन होता है। टिश्यू कल्चर तकनीक से तैयार बरही जैसी नरम और मीठी किस्में तीन से चार वर्षों में फल देने लगती हैं, जबकि पारंपरिक बीज से पौधे में अधिक समय लगता है।
केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी), जोधपुर में हाल ही में किए गए एक अध्ययन में गुजरात की टिश्यू कल्चर एडीपी‑1 किस्म का मूल्यांकन किया गया। यह किस्म पश्चिमी राजस्थान की शुष्क जलवायु के लिए सबसे उपयुक्त पाई गई है। विशेष बात यह है कि इसके फल जून के पहले सप्ताह में ही डोका अवस्था (अर्ध-पके मीठे फल) में तैयार हो जाते हैं, जिससे मानसून से पहले कटाई और बिक्री का अवसर मिलता है और बारिश से होने वाले नुकसान से बचाव हो सकता है। इस प्रकार की सुगंधित और जल्दी पकने वाली किस्में किसानों को बेहतर बाजार मूल्य और जोखिम से सुरक्षा प्रदान करती हैं।
महाराष्ट्र के जलना जिले के तनवाड़ी गांव के किसान दामोदर शेंडगे ने तीन एकड़ में खजूर की खेती कर एक मिसाल कायम की है। 2019 में लगाए गए पौधों से उन्हें 2026 में लगभग 20 लाख रुपये की आमदनी होने की उम्मीद है। उन्होंने बताया कि तेज हवा, बारिश और ओलावृष्टि जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खजूर की फसल पर अन्य फसलों की तुलना में कम प्रभाव पड़ता है। यह सफलता ग्रामीण किसानों के लिए प्रेरणा बन रही है।
खजूर की खेती में सफल होने के लिए कुछ तकनीकी कदम आवश्यक हैं। खेत में बड़े गड्ढे खोदकर उनमें गोबर खाद और उपजाऊ मिट्टी मिलाकर पौधारोपण किया जाता है। ड्रिप सिंचाई से पानी की बचत होती है और पौधों को नियमित नमी मिलती है। परागण के लिए एक नर पौधे पर 25–50 मादा पौधों का अनुपात बनाए रखना चाहिए, या हाथ से परागण करना चाहिए। फलों को पक्षियों, धूल और बारिश से बचाने के लिए नेटिंग या बैगिंग की जाती है। साथ ही, बाग की सफाई, पुराने पत्तों को हटाना और संतुलित उर्वरक देना भी आवश्यक है।
ताजा खजूर, विशेषकर डोका और रुतब अवस्था में, उस समय बाज़ार में आती है जब आयातित खजूर कम होती है, इसलिए इसकी कीमत अच्छी मिलती है। इसके अलावा, सूखे खजूर, पेस्ट, अचार और चटनी जैसे मूल्य संवर्धित उत्पादों से किसानों की आय और बढ़ सकती है। किसान उत्पादक संगठन (FPO) और सहकारी समितियों के माध्यम से थोक बिक्री और शीत भंडारण सुविधाओं का लाभ भी लिया जा सकता है।
| विवरण (पार्ट) | जानकारी |
|---|---|
| फसल | खजूर |
| क्षेत्र | राजस्थान, गुजरात |
| खासियत | गर्मी सहनशील |
| मिट्टी | रेतीली जमीन |
| पानी | कम सिंचाई |
| तकनीक | टिश्यू कल्चर |
| फायदा | बेहतर आमदनी |
| बाजार | ताजा खजूर मांग |
| उत्पाद | पेस्ट, सूखी खजूर |
| भविष्य | लाभकारी खेती |
खजूर की खेती को बढ़ावा देने के लिए मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (MIDH) के तहत राज्य के बागवानी विभागों के माध्यम से टिश्यू कल्चर पौधों, ड्रिप सिंचाई और बाग स्थापना पर सब्सिडी दी जाती है। गुजरात के कच्छ क्षेत्र में टिश्यू कल्चर खजूर को बढ़ावा देने के लिए विशेष कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। काजरी का शोध और प्रदर्शन किसानों को नई किस्मों और फसल विविधीकरण से अवगत कराकर उनकी आमदनी को दोगुना करने की दिशा में कार्य कर रहा है।
खजूर की खेती ने ग्रामीण इलाकों में एक स्थिर और जोखिम-रहित आय का मार्ग खोल दिया है। यह खेती पारंपरिक फसलों की तुलना में कम पानी में, कठिन मौसम में भी बेहतर परिणाम देती है। सुगंधित और जल्दी पकने वाली किस्में किसानों को समय से पहले बाजार में पहुंचने का अवसर देती हैं। साथ ही, सरकारी सब्सिडी, अनुसंधान और मूल्य संवर्धन से यह खेती और भी आकर्षक बन रही है।
बहरहाल,खजूर की सुगंधित खेती ने ग्रामीण भारत में एक नई पहचान दी है-जहां सूखा, गर्मी और कठिन परिस्थितियों में भी किसान अपनी मेहनत और नई तकनीक से खुशहाली की राह पर अग्रसर हैं।
सरपंचों और पंचायतों को चाहिए कि वे किसानों को इस खेती के लाभ बताएं, काजरी और बागवानी विभाग से संपर्क कर प्रदर्शन खेत स्थापित करें, और किसान उत्पादक समूह बनाकर सामूहिक खरीद और बिक्री को बढ़ावा दें। इससे खेती का जोखिम कम होगा और लाभ बढ़ेगा।