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सोशल मीडिया के बढ़ते क्रेज से डिप्रेशन का खतरा: रोजाना 150 मिनट से ज्यादा मोबाइल स्क्रीन स्क्रॉल करना खतरनाक

स्मार्टफोन और सस्ते हाई-स्पीड इंटरनेट के इस दौर में सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करना हमारी रोजमर्रा की आदत बन चुकी है। वैज्ञानिक रिसर्च के मुताबिक, मोबाइल स्क्रीन पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अधिक समय स्क्रॉल करना हमारी सेहत पर बुरा असर डाल रहा है।
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Sep 01, 2026
social media disadvantages
सांकेतिक इमेज (सोर्स- Chatgpt)

स्मार्टफोन और सस्ते हाई-स्पीड इंटरनेट के डिजिटल युग में सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करना अब रोजमर्रा की आदत बन चुकी है। हाल ही में 'मेंटल हेल्थ रिसर्च' जर्नल मे प्रकाशित एक बड़े अध्ययन ने इस आदत को लेकर अहम चेतावनी दी गई है। अमेरिका की 'यूनिवर्सिटी ऑफ सिनसिनाटी और नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी' के शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया। यह अध्यन मार्टिन एल. ब्लॉक और उनके सहयोगियों द्वारा किया गया है।

11 सालों के डेटा पर हुई रिसर्स


शोधार्थियों ने यह अध्यन 2014 से 2024 तक, 11 सालों के डेटा के आधार पर किया है। इस अध्यन में करीब 1.83 लाख अमेरिकी वयस्कों (18 से 70 वर्ष आयु वर्ग) के 11 अलग-अलग वार्षिक सर्वेक्षणों का विश्लेषण किया गया। यानी यह वैश्विक नहीं, बल्कि अमेरिका-केंद्रित डेटा है। हालांकि इसके निष्कर्ष दुनिया भर के लिए प्रासंगिक माने जा रहे हैं।

स्टडी के मुताबिक, जैसे ही रोजाना सोशल मीडिया इस्तेमाल का समय करीब 150 मिनट (ढाई घंटे) के आसपास पहुंचता है तो इसका सेल्फ-रिपोर्टेड डिप्रेशन से संबंध लगभग न्यूट्रल से बदलकर सकारात्मक हो जाता है। शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि हर अतिरिक्त 1 घंटे के इस्तेमाल पर डिप्रेशन के लक्षण बताए जाने की संभावना करीब 17% बढ़ जाती है।

भारत में इस रिसर्च के क्या मायने हैं?


मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन के बाद भारत दुनिया का 'सबसे ज्यादा' सोशल मीडिया यूजर वाला देश है। फेसबुक और व्हाट्सऐप जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स पर भारत के यूजर्स की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है। भारत में फेसबुक के करीब 40 करोड़ और व्हाट्सऐप के करीब 53.5 करोड़ यूजर्स हैं।

डिजिटल इंडिया रिपोर्ट के अनुसार, भारतीयों का कुल इंटरनेट/स्क्रीन टाइम रोजाना करीब 6 घंटे 45 मिनट से 6 घंटे 49 मिनट तक है, लेकिन इसमें सिर्फ सोशल मीडिया पर बिताया गया समय करीब 2 घंटे 28 मिनट से 2 घंटे 44 मिनट के बीच है। यानी अमेरिकी स्टडी की 150 मिनट की सीमा के बेहद करीब, या उससे थोड़ी ज्यादा है।

भारत में रील और शॉर्ट वीडियो का चलन 2020 में टिकटॉक पर प्रतिबंध के बाद तेजी से बढ़ा है। साथ ही इंस्टाग्राम रील्स ने उस जगह को तेजी से भरा है। लगातार दूसरों की 'परफेक्ट लाइफ' देखने से तुलनात्मक हीनभावना और एंग्जायटी बढ़ने की आशंका जताई जाती रही है।

भारत में मानसिक स्वास्थ्य की चुनौती


भारत में मानसिक तनाव पर खुलकर बात करने में झिझक एक वास्तविक और दस्तावेजीकृत चुनौती है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा कराए गए राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NMHS 2015-16) के अनुसार, भारत में मानसिक बीमारियों के लिए इलाज का अंतर (ट्रीटमेंट गैप) 70% से 92% तक है।

यानी बड़ी संख्या में पीड़ित लोगों तक इलाज पहुंच ही नहीं पाता है। इसकी एक बड़ी वजह विशेषज्ञों की भारी कमी भी है। भारत में प्रति एक लाख नागरिकों पर सिर्फ 0.75 मनोचिकित्सक हैं, जबकि वैश्विक औसत 1.7 है। ऐसी स्थिति में जब लोग शुरुआती लक्षणों को पहचान नहीं पाते और सोशल मीडिया को ही तनाव दूर करने का जरिया मानकर उसमें और उलझ जाते हैं, तो यह चक्र मानसिक स्वास्थ्य संकट को और गहरा कर सकता है।

Updated on:
01 Sept 2026 07:34 pm
Published on:
01 Sept 2026 07:34 pm