
Drinking water safety standards India: हाल के कुछ वर्षों में देशभर की सरकारों और अदालतों का ध्यान स्वच्छ जल के लिए कई मोर्चों पर शुरू किया। नए अपडेच हुए और अदालतें सख्त दिखीं। लेकिन अब भी बड़ा सवाल ये है कि इस सख्ती और सरकारी हलचलों के बाद क्या आपके नलों तक साफ पानी पहुंच रहा है? या सिर्फ कागजों में ही सुधार नजर आ रहा है। जानिए किन-किन शहरों में बढ़ी शिकायतें, कहां सुधरे हालात,जानिए क्या आपके शहर का पानी है सुरक्षित?
इंदौर- सबसे बड़ा मामला: इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दिसंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच सामने आया, यहां दूषित पानी से 36 लोगों की मौत हुई। जलापूर्ति लाइन में सीवर का पानी मिलने और पानी के नमूनों में ई-कोलाई पाए जाने की पुष्टि हुई।
NGT की सेंट्रल जोन बेंच ने मामले पर 6 सदस्यीय हाई-लेवल जांच कमेटी बनाई, इसमें IIT इंदौर, CPCB भोपाल और राज्य पर्यावरण विभाग के प्रतिनिधि शामिल हैं।
NGT ने जिम्मेदारी तय करने का निर्देश भी दिया। रिपोर्ट में नगर निगम अधिकारियों की लापरवाही को कारण बताया गया।
गांधीनगर: दूषित पानी से टाइफाइड के 108 मामले, 2 लोगों की मौत।
हैदराबाद: लिए गए 6 सैंपल में से 4 में सीवेज, कॉलिफॉर्म बैक्टीरिया और औद्योगिक कचरा पाया गया।
ग्रेटर नोएडा: गंदा पानी पीने से उल्टी, बुखार, पेट दर्द के मामले सामने आए।
रोहतक और झज्जर (हरियाणा): गंदे-बदबूदार पानी की शिकायतें, लोग पानी खरीदने को मजबूर।
देश में पीने के पानी की गुणवत्ता के लिए भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने IS 10500:2012 मानक निर्धारित किया है, जिसका पालन शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) और जल बोर्डों को हर घर तक पहुंचने वाले पानी की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए करना होता है।
वैश्विक स्तर पर भी हलचल हुई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 18 जून 2026 को अपनी पेयजल गुणवत्ता गाइडलाइंस (Guidelines for Drinking Water Quality) का नया अपडेट जारी किया। इसमें छोटे जल-आपूर्ति स्रोतों के लिए जोखिम-आधारित प्रबंधन और सैनिटरी इंस्पेक्शन पर खास जोर दिया गया है।
WHO के मुताबिक, दुनियाभर में अब भी करीब 2.1 अरब लोगों को सुरक्षित रूप से प्रबंधित पेयजल नहीं मिलता, जिनमें से 10.6 करोड़ लोग सीधे नदी, झील या अन्य सतही जल-स्रोतों से पानी पीने को मजबूर हैं। यह अपडेट भारत जैसे देश के लिए खास तौर पर प्रासंगिक है, जहां छोटे कस्बों और गांवों में जल-आपूर्ति की चुनौतियां शहरों से अलग होती हैं।
जल जीवन मिशन (JJM) के तहत 2025-26 में लगभग 24.89 लाख नमूनों की लैब में जांच की गई और 21.92 लाख नमूनों की फील्ड टेस्टिंग किट (FTK) से जांच हुई, जो 3.92 लाख और 1.52 लाख गांवों से संबंधित थे। इससे स्पष्ट होता है कि निगरानी का दायरा बढ़ा है और स्थानीय स्तर पर पानी की गुणवत्ता पर नजर रखी जा रही है।
राज्य स्तर पर भी निगरानी का ढांचा मजबूत हो रहा है। उदाहरण के लिए, पश्चिम बंगाल में PHED का वॉटर क्वालिटी डैशबोर्ड बताता है कि वित्तीय वर्ष 2026-27 में 1,09,766 स्रोतों से नमूने लिए गए, जिनमें से 48,161 सुरक्षित और 61,605 असुरक्षित पाए गए। यह आंकड़ा बताता है कि समस्या का पैमाना अभी भी व्यापक है, लेकिन निगरानी की पहुंच बढ़ी है।
कुछ शहरों में पानी की गुणवत्ता को लेकर गंभीर शिकायतें भी सामने आई हैं। जून 2026 में, नोएडा, इंदौर, गांधीनगर, पुणे और बेंगलुरु में नालियों से मिलते पानी की आपूर्ति की शिकायतें राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) तक पहुंचीं। NGT ने संबंधित नगर निगमों को चार सप्ताह में सुधारात्मक कार्रवाई करने और रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है। मामले में अगली सुनवाई 9 सितंबर 2026 को तय हुई है।
इंदौर में हाल ही में गंदे पानी से होने वाली बीमारियों के चलते मौतें और अस्पताल में भर्ती होने की घटनाएं हुईं, जिसके बाद कई वरिष्ठ अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया था। यह दर्शाता है कि प्रशासनिक जवाबदेही पर भी अब ध्यान दिया जा रहा है।
इंदौर- सबसे ठोस प्रशासनिक कदम, लेकिन नतीजा अभी अधूरा
यह जानने के लिए कि आपके शहर में पानी की गुणवत्ता में सुधार हो रहा है या नहीं, आप निम्नलिखित कदम उठा सकते हैं:
डायरिया/पेट के रोगों में कमी- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, सुरक्षित पेयजल, स्वच्छता (सैनिटेशन) और हाइजीन में सुधार से डायरिया से होने वाली बीमारियों में काफी बड़ी कमी आ सकती है। यह दुनिया भर में बच्चों की मौत के प्रमुख कारणों में से एक है।
बच्चों की मृत्यु दर में कमी- 5 साल से कम उम्र के बच्चों में डायरिया एक प्रमुख जानलेवा बीमारी है और इसका बड़ा हिस्सा असुरक्षित पानी, खराब स्वच्छता और हाइजीन की कमी से जुड़ा है।
कुपोषण में कमी- बार-बार होने वाला डायरिया शरीर से पोषक तत्व बहा ले जाता है, जिससे बच्चों में स्टंटिंग (कद न बढ़ना) और कुपोषण बढ़ता है। साफ पानी मिलने से यह चक्र टूटता है।
टाइफाइड और हैजा जैसी महामारियों पर नियंत्रण- जैसे गांधीनगर में टाइफाइड के 108 मामले सामने आए, वैसी घटनाएं सीधे दूषित पानी से जुड़ी होती हैं। साफ पानी से इनका प्रकोप रुकता है।
लंबी अवधि में क्रॉनिक बीमारियों से बचाव- पानी में मौजूद भारी धातुएं (जैसे आर्सेनिक, फ्लोराइड, नाइट्रेट) लंबे समय तक शरीर में जमा होकर किडनी की बीमारी, हड्डियों की समस्या (फ्लोरोसिस) और कैंसर के खतरे तक को बढ़ा सकती हैं। साफ पानी इस दीर्घकालिक जोखिम को कम करता है।
स्कूल जाने की दर और उत्पादकता पर असर- बार-बार बीमार पड़ने से बच्चों की स्कूल में उपस्थिति और वयस्कों की काम पर उपस्थिति प्रभावित होती है। साफ पानी अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षा और आर्थिक उत्पादकता को भी सहारा देता है।
पानी की गुणवत्ता को लेकर अब कई स्तरों पर सुधार की दिशा में काम हो रहा है। चाहे वह मानकों का अद्यतन हो, निगरानी का विस्तार हो, न्यायिक हस्तक्षेप हो या प्रशासनिक जवाबदेही। लेकिन यह सुधार अभी पूरे देश में समान रूप से नहीं दिख रहा है। आपके शहर में यह बदलाव हो रहा है या नहीं, यह जानना और इसकी मांग करना आपकी जिम्मेदारी है। यदि आप अपने शहर के पानी की गुणवत्ता में सुधार देख रहे हैं, तो यह एक सकारात्मक संकेत है। यदि नहीं, तो शिकायत दर्ज कराना और जागरूकता बढ़ाना ही अगला कदम हो सकता है।