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हाथों में हुनर और आंखों में सपने, जानिए लोककला कैसे बदल रही गांवों की तस्वीर

Indian Village Folk Art: आपने भी बुजुर्गों को हमेशा कहते सुना होगा कि हुनर कभी भूखा नहीं रहने देता। क्या आप मानते हैं आज बुजुर्गों की ये सीख बड़े काम की साबित हो रही है। जरा जरूरत है तो इसे और तराशने, निखारने की और बाजार में उतारने की प्रक्रिया समझने की, क्यों कि लोककला का हिस्सा हस्तशिल्प भारत के गांवों की नई ईबारत लिख रहा है। यहां जानिए राजस्थान समेत देशभर के कई गांवों में लोककला कैसे बिखेर रही है जादू और रची जा रही नई प्रेरक कहानियां
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 26, 2026

Indian Folk Art

Indian Folk Art: जानिए हस्तशिल्प कला खासतौर पर हैंडलूम का हुनर कैसे बदल रहा भारत के गांवों की तस्वीर? (AI creative)

Indian village folk art: राजस्थान हो, गुजरात समेत देश के कई गांव लोककला की समृद्धि और संपनन्ता की तस्वीर दिखाने लगे हैं। खासतौर पर हैंडलूम के जरिए ग्रामीणों का हुनर कैसे इन गांवों में बेहतर होती आर्थिक स्थिति का पर्याय बन रहा है। ग्रामीण महिलाएं अपने घर-परिवार से शुरू कर भारतीय बाजार तक अपनी पहुंच बढ़ा पा रही हैं। क्या आप जानते हैं कैसे हुनर से तराशी जा रही है किस्मत की रेखा?

अपने हाथों से अपनी तकदीर बुनती हैं ये महिलाएं, राजस्थान के एक गांव हैं हस्तशिल्प क्रांति

क्या आपने कभी सोचा है कि एक गांव की कलात्मकता कैसे उसकी पहचान और समृद्धि का रास्ता बना सकती है? राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में लोककला और हस्तशिल्प सिर्फ कला नहीं, बल्कि पहचान और आजीविका का माध्यम है। हाल के वर्षों में कई गांवों ने अपनी पारंपरिक हस्तशिल्प कला को नए रूप में जीवित कर, न सिर्फ अपनी पहचान बनाई है, बल्कि ग्रामीणों के लिए रोजगार और आत्मसम्मान का स्रोत भी बना दिया है।

हस्तशिल्प के जरिए पहचान, देशभर से मिलते-जुलते उदाहरण

राजस्थान के कई गांवों ने अपनी हस्तशिल्प कला, खासतौर पर हाथ से बने वस्त्रों (हैंडलूम) के जरिए अपनी पहचान बनाई है। इस तरह की पहलें देशभर में कई जगह देखी जा रही हैं। जो दिखाती हैं कि यह मॉडल कितना असरदार हो सकता है। इनके उदारण के रूप में हम असम के कोकराझार जिले में कुछ गांवों में जहां पहले हिंसा और गरीबी का माहौल था, वहां हथकरघे से बुनाई शुरू होने के बाद परिवारों की आमदनी में सुधार की बातें सामने आई हैं।

इसी तरह महाराष्ट्र में पैठनी साड़ी बुनने वाली महिलाओं, ओडिशा के मयूरभंज में सांथाली साड़ी को पुनर्जीवित करती आदिवासी महिलाओं और हिमाचल प्रदेश में मास्टर ट्रेनर बन चुकी महिला बुनकरों की कहानियां भी इसी दिशा में मिलती हैं। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि गांवों में लोककला का उत्थान सिर्फ कला की रक्षा नहीं, बल्कि ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति सुधारने का रास्ता भी है।

राजस्थान की लोककला, गांव की सांस्कृतिक पहचान

राजस्थान की लोककला- जैसे मांडणा, सांझी, पिछवाई, बंधेज, कावड़, कठपुतली, गांवों की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं। मांडणा में महिलाएं त्योहारों पर गोबर और रंगों से ज्यामितीय चित्र बनाती हैं। सांझी में कन्याएं माता पार्वती की आकृति बनाकर अच्छे वर की कामना करती हैं, पिछवाई चित्रित कपड़े मंदिरों के पीछे टांगे जाते हैं। बंधेज और कोटा डोरिया जैसे वस्त्रों को भौगोलिक संकेत (GI) टैग भी मिला है। जो इन्हें नकल से कानूनी सुरक्षा और बाजार में विशिष्ट पहचान देता है। इससे कारीगरों को बेहतर कीमत मिलने की गुंजाइश बनती है।

जब गांव अपनी लोककला को जीवित रखते हैं, तो वे अपनी सांस्कृतिक विरासत बचाते ही हैं, साथ ही स्थानीय युवाओं को रोजगार और आत्मनिर्भरता का अवसर भी देते हैं।

सरकार और संस्थाओं की भूमिका

सरकार और संस्थाएं भी हस्तशिल्प को बढ़ावा देने में सक्रिय हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने ग्रामीण जिलों में खादी रिटेल स्टोर खोलकर ग्रामीण बुनकरों और महिला स्वयं सहायता समूहों को सीधे बाजार से जोड़ने की पहल की है। ये स्टोर बिक्री केंद्र होने के साथ-साथ प्रशिक्षण केंद्र भी हैं, जहां बुनकर आधुनिक डिज़ाइन और गुणवत्ता सुधार सीख सकते हैं।

इसके अलावा केंद्र सरकार की 'वोकल फॉर लोकल' पहल ने स्थानीय हस्तशिल्प को बढ़ावा देने का व्यापक संदेश दिया है, जिससे ग्रामीण हस्तशिल्प को पहचान मिली है। राजस्थान में भी कारीगरों को PM Vishwakarma Yojana जैसी योजनाओं के तहत प्रशिक्षण और लोन सहायता मिल सकती है।

गांव स्तर पर क्या किया जा सकता है

गांवों में लोककला को जीवित रखने और पहचान बनाने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए जा सकते हैं-

  • स्थानीय कला की पहचान और दस्तावेजीकरण- गांव की कला, डिजाइन, तकनीक और इतिहास को लिखित या डिजिटल रूप में सुरक्षित करें।
  • प्रशिक्षण और कौशल विकास- युवाओं और महिलाओं को पारंपरिक तकनीक सिखाकर आजीविका से जोड़ें।
  • बाजार से जोड़ना- खादी स्टोर, मेलों, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के ज़रिए उत्पादों की बिक्री सुनिश्चित करें।
  • सांस्कृतिक पर्यटन- गांव में हस्तशिल्प केंद्र या कला-गांव बनाकर पर्यटकों को आकर्षित करें।
  • सरकारी योजनाओं का लाभ- खादी, हस्तशिल्प और ग्रामीण उद्योगों से जुड़ी योजनाओं का फायदा उठाएं।

सफलता की और भी मिसालें

गुजरात के कच्छ जिले में कच्छी कढ़ाई और ब्लॉक प्रिंटिंग ने स्थानीय महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया है। पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन में बटिक प्रिंटिंग और लेदर वर्क ने स्थानीय कारीगरों को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है। यह दिखाता है कि सही सहयोग और बाज़ार तक पहुंच मिलने पर पारंपरिक कला किसी भी राज्य में नई ज़िंदगी पा सकती है।

अगर आपका गांव भी लोककला में समृद्ध है, तो सबसे पहले अपने गांव की कला को पहचानें और उसे दस्तावेजी रूप दें। फिर स्थानीय युवाओं और महिलाओं को प्रशिक्षण दें, उन्हें बाजार से जोड़ें और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाएं। इससे न सिर्फ कला बचेगी, बल्कि गांव की पहचान और आर्थिक स्थिति भी मजबूत होगी। लोककला सिर्फ कला नहीं, गांव की आत्मा है। इसे बचाना और बढ़ाना ही गांव की प्रगति का रास्ता है।