
भारत में हर सरकार के साथ नई योजनाओं और नए मिशन की घोषणा होती है। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि पुरानी योजनाएं खत्म हो जाती हैं?
नहीं। सरकारी योजनाओं की दुनिया में अक्सर एक योजना पूरी तरह बंद होने के बजाय उसका नाम बदलता है, दूसरी योजना में विलय होता है, उसका दायरा बदला जाता है या उसे नए मिशन के तहत जारी रखा जाता है।
इसी वजह से आज भी ऐसी कई सरकारी योजनाओं की बुनियादी सोच दिखाई देती है, जिनकी शुरुआत आजादी के शुरुआती दशकों में हुई थी।
लेकिन एक जरूरी बात समझनी होगी, भारत में सरकारी योजनाओं की कोई तय “उम्र” नहीं होती। किसी योजना को जारी रखने का फैसला उसके उद्देश्य, परिणाम, बजट और सरकार की प्राथमिकताओं के आधार पर समय-समय पर लिया जाता है। केंद्र सरकार ने 2025 में भी केंद्रीय क्षेत्र और केंद्र प्रायोजित योजनाओं के अगले पांच साल के लिए मूल्यांकन और मंजूरी की प्रक्रिया शुरू की थी। नया चक्र 1 अप्रैल 2026 से शुरू होना था।
आजादी के बाद सरकार का सबसे बड़ा लक्ष्य था, गरीबी कम करना, गांवों में बुनियादी सुविधाएं पहुंचाना, रोजगार बढ़ाना, शिक्षा और स्वास्थ्य का विस्तार करना। 1951 में पहला पंचवर्षीय योजना शुरू हुआ। इसके बाद ग्रामीण विकास, सिंचाई, पेयजल, स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी कई योजनाएं शुरू हुईं।
उदाहरण के लिए ग्रामीण पेयजल की कहानी देखें। 1954 में National Water Supply Programme शुरू हुआ था। बाद में ग्रामीण जलापूर्ति के कई कार्यक्रम आए और अंततः इसी लंबे सरकारी प्रयास की अगली कड़ी के रूप में जल जीवन मिशन आया। यानी 1954 की योजना आज उसी नाम से नहीं चल रही, लेकिन समस्या और सरकारी हस्तक्षेप की निरंतरता बनी हुई है।
इसी तरह ग्रामीण विकास के लिए शुरुआती दौर में Community Development Programme शुरू हुआ था। बाद में इसकी जगह और इसके उद्देश्यों के आसपास कई नई योजनाएं आती गईं।
कुछ योजनाएं ऐसी हैं जिनका मूल ढांचा दशकों बाद भी दिखाई देता है।
| पुरानी पहल/योजना | शुरुआत | आज की स्थिति |
|---|---|---|
| ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम | 1954 | कई चरणों से गुजरकर आज जल जीवन मिशन |
| ICDS | 1975 | आंगनवाड़ी सेवाओं के रूप में जारी |
| 20-सूत्रीय कार्यक्रम | 1975 | सरकारी निगरानी कार्यक्रम के रूप में जारी |
| मिड-डे मील | 1995 | अब PM POSHAN के रूप में |
| NSAP | 1995 | सामाजिक सहायता कार्यक्रम के रूप में जारी |
| PMGSY | 2000 | ग्रामीण सड़क योजना के रूप में जारी |
| IAY | 1985 | PMAY-G में पुनर्गठित |
इनमें से ICDS 1975 में शुरू हुआ था और आज भी आंगनवाड़ी सेवाओं सहित व्यापक पोषण एवं बाल विकास ढांचे का हिस्सा है। केंद्र की योजनाओं की सूची में ICDS को शामिल किया गया है।
इसी तरह 1975 में शुरू किया गया 20-सूत्रीय कार्यक्रम समय के साथ कई बार बदला गया, लेकिन इसका मूल ढांचा आज भी सरकारी निगरानी व्यवस्था में मौजूद है।
इंदिरा आवास योजना → प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण
ग्रामीण गरीबों को घर देने वाली इंदिरा आवास योजना (IAY) 1985 में शुरू हुई थी। इसे 2016 से पुनर्गठित करके प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (PMAY-G) बनाया गया। यानी पुरानी योजना का उद्देश्य खत्म नहीं हुआ, बल्कि उसका ढांचा और नाम बदल गया।
मिड-डे मील → PM POSHAN
स्कूलों में बच्चों को भोजन उपलब्ध कराने की राष्ट्रीय योजना 1995 में शुरू हुई। बाद में इसे नए स्वरूप और नाम PM POSHAN के तहत जारी रखा गया।
ग्रामीण विद्युतीकरण की योजना → DDUGJY
Rajiv Gandhi Grameen Vidyutikaran Yojana (RGGVY) को 2015 में Deen Dayal Upadhyaya Gram Jyoti Yojana (DDUGJY) में समाहित कर दिया गया। यानी योजना का नाम और प्रशासनिक ढांचा बदला, लेकिन ग्रामीण विद्युतीकरण का लक्ष्य जारी रहा। यही वजह है कि केवल नाम देखकर यह कहना गलत होगा कि कोई योजना पूरी तरह नई है।
कुछ योजनाएं वास्तव में खत्म भी होती हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं-
उदाहरण के लिए सरकार ने समय-समय पर योजनाओं को rationalise यानी कम और एकीकृत करने की कोशिश की है। 2017 में केंद्र ने बताया था कि 28 केंद्र प्रायोजित योजनाओं में से अधिकांश के लिए ‘sunset date’ यानी समीक्षा/समापन की समयसीमा तय थी। उस समय MGNREGA को अलग स्थिति में रखा गया था क्योंकि यह कानून पर आधारित रोजगार गारंटी कार्यक्रम है। यानी सरकार की कोशिश यह रही है कि हर योजना हमेशा के लिए बजट में बनी न रहे।
इसका कोई एक जवाब नहीं है। किसी योजना की उम्र कुछ साल हो सकती है, जबकि कोई कार्यक्रम दशकों तक अलग-अलग नाम और स्वरूप में चल सकता है। इसे तीन तरह से समझ सकते हैं—
क्योंकि हर सरकार शून्य से शुरुआत नहीं कर सकती। गरीबी, पोषण, ग्रामीण सड़क, पेयजल, आवास, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी समस्याएं पांच या दस साल में खत्म नहीं होतीं। इसलिए सरकार बदलने के बावजूद इन योजनाओं की जरूरत बनी रहती है।
दूसरी वजह प्रशासनिक ढांचा है। किसी योजना को अचानक बंद करने से लाभार्थी, कर्मचारी और राज्यों की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है और तीसरी वजह राजनीति भी है। नई सरकार पुरानी योजना को नया नाम देकर यह संदेश देना चाहती है कि अब इसी समस्या को नए तरीके से हल किया जाएगा।
दोनों होता है, लेकिन भारतीय योजनाओं का इतिहास बताता है कि कई बार योजना का नाम बदलता है, ढांचा बदलता है और दूसरी योजना में विलय हो जाता है, जबकि उसका मूल उद्देश्य वर्षों तक चलता रहता है।
इसलिए यह पूछना ज्यादा सही है कि 'कौन-सी योजना कब शुरू हुई?' के साथ-साथ यह भी पूछा जाए कि 'उस योजना का मूल उद्देश्य आज किस योजना के तहत चल रहा है?'
यही नजरिया बताता है कि भारत में सरकारी योजनाएं सिर्फ बजट की घोषणाएं नहीं हैं। वे एक लंबी प्रशासनिक यात्रा हैं-1950 के दशक के ग्रामीण विकास और पेयजल कार्यक्रमों से लेकर आज के PMAY, PM POSHAN और जल जीवन मिशन तक।
नाम बदलते रहे, सरकारें बदलती रहीं, लेकिन कई समस्याओं के समाधान की सरकारी कोशिश आज भी जारी है।