Patrika+

FRA बनाम टाइगर रिजर्व: जंगल किसका, अधिकार किसका और संरक्षण कैसे होगा?

Forest Rights Act and Tiger Reserves : जानें वन अधिकार कानून (FRA) और टाइगर रिजर्व के बीच टकराव क्यों होता है। आदिवासियों के अधिकार, ग्राम सभा की सहमति और बाघों के संरक्षण के बीच संतुलन के मुद्दे को विस्तार से समझें।
5 min read
Aug 20, 2026
FRA
क्या है वन अधिकार कानून, PC- Chatgpt

भारत में जंगल बचाने और जंगल पर निर्भर लोगों के अधिकारों के बीच टकराव कोई नया मुद्दा नहीं है। वन अधिकार कानून (FRA), 2006 ने आदिवासी और अन्य पारंपरिक वनवासियों के उन अधिकारों को कानूनी मान्यता दी, जो पीढ़ियों से जंगल और उसके संसाधनों पर निर्भर रहे हैं। दूसरी तरफ टाइगर रिजर्व का उद्देश्य बाघों के साथ पूरे वन पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखना है।

विवाद तब पैदा होता है जब किसी टाइगर रिजर्व के कोर या क्रिटिकल हैबिटेट में रहने वाले लोगों को हटाकर जंगल को वन्यजीवों के लिए ‘अविघ्न क्षेत्र’ बनाने की योजना सामने आती है। सवाल यह है कि क्या बाघों के लिए जंगल खाली कराया जा सकता है? अगर हां, तो किन शर्तों पर?

असल विवाद 'आदिवासी बनाम बाघ' नहीं, बल्कि यह तय करने का है कि संरक्षण और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

FRA ने आदिवासियों को कौन से अधिकार दिए?

वन अधिकार कानून का उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से जंगल पर निर्भर समुदायों के साथ हुए अन्याय को दूर करना था। कानून व्यक्तिगत और सामुदायिक दोनों तरह के अधिकारों को मान्यता देता है। इनमें शामिल हैं:

  • जंगल में निवास और खेती का अधिकार
  • लघु वनोपज तक पहुंच
  • चराई और पानी के इस्तेमाल से जुड़े अधिकार
  • सामुदायिक वन संसाधनों के संरक्षण और प्रबंधन का अधिकार
  • पारंपरिक आजीविका से जुड़े अधिकार
  • कुछ समुदायों के लिए आवास और सांस्कृतिक अधिकार

महत्वपूर्ण बात यह है कि FRA सिर्फ जंगल से संसाधन लेने का अधिकार नहीं देता। इसके तहत ग्राम सभा और वन अधिकार धारकों को वन, वन्यजीव और जैव विविधता की रक्षा की जिम्मेदारी भी दी गई है। यानी कानून का मूल विचार यह है कि स्थानीय समुदाय जंगल के दुश्मन नहीं, बल्कि उसके संरक्षण का हिस्सा हो सकते हैं।

फिर टाइगर रिजर्व में समस्या कहां आती है?

टाइगर रिजर्व का एक कोर या क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट ऐसा क्षेत्र होता है जिसे बाघों और दूसरे वन्यजीवों के लिए ज्यादा सुरक्षित और कम मानवीय हस्तक्षेप वाला रखा जाता है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के मुताबिक बाघों की स्थायी आबादी के लिए बड़े और अपेक्षाकृत अविघ्न वन क्षेत्र जरूरी हैं। इसी कारण कुछ कोर क्षेत्रों से गांवों के स्वैच्छिक पुनर्वास की योजना बनाई जाती है। लेकिन यहां FRA का सवाल सामने आता है।

अगर किसी गांव के लोगों के वन अधिकार पहले से मान्य हैं, तो उन्हें सिर्फ यह कहकर नहीं हटाया जा सकता कि यह टाइगर रिजर्व है। कानून ने इसके लिए खास प्रक्रिया तय की है।

क्या टाइगर रिजर्व से लोगों को हटाया जा सकता है?

हां, लेकिन बहुत कड़ी शर्तों के साथ। FRA की धारा 4(2) के तहत क्रिटिकल वाइल्डलाइफ हैबिटेट में मान्यता प्राप्त वन अधिकारों को बदला या पुनर्वासित किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए कई शर्तें पूरी करनी होंगी।

सबसे पहले उस इलाके में वन अधिकारों की पहचान और उनका निपटारा पूरा होना जरूरी है। इसके बाद वैज्ञानिक आधार पर यह साबित करना होगा कि वहां लोगों की मौजूदगी से वन्यजीवों या उनके आवास को गंभीर और अपरिवर्तनीय नुकसान का खतरा है।

तीसरी महत्वपूर्ण शर्त है कि सरकार को यह निष्कर्ष निकालना होगा कि सह-अस्तित्व यानी लोगों और वन्यजीवों को साथ रखने का कोई दूसरा उचित विकल्प उपलब्ध नहीं है। इसके बाद ही पुनर्वास की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।

ग्राम सभा की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

FRA में ग्राम सभा को बेहद महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है। अगर किसी समुदाय को टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र से हटाने की योजना है तो प्रभावित ग्राम सभा की मुक्त, पूर्व और सूचित सहमति लिखित रूप में लेना जरूरी है। साथ ही पुनर्वास का ऐसा पैकेज होना चाहिए जिससे प्रभावित परिवारों की आजीविका सुरक्षित रहे।

सबसे महत्वपूर्ण बात- सिर्फ पैसा देने से पुनर्वास पूरा नहीं माना जाता। कानून के मुताबिक नए स्थान पर जमीन और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध होने के बाद ही लोगों को हटाया जा सकता है। यही वह बिंदु है जहां जमीन पर सबसे ज्यादा विवाद दिखाई देता है।

सरकार का तर्क क्या है?

वन विभाग और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े अधिकारियों का तर्क है कि कुछ अत्यंत संवेदनशील कोर क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियां कम करना जरूरी है। लोगों और वन्यजीवों की लगातार नजदीकी से:

  • मानव-बाघ संघर्ष बढ़ सकता है
  • पशुओं पर बाघों के हमले हो सकते हैं
  • जंगल में चराई का दबाव बढ़ सकता है
  • पर्यटन और दूसरी मानवीय गतिविधियां बढ़ सकती हैं
  • बाघों के प्रजनन और आवागमन वाले क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं

NTCA भी Voluntary Village Relocation Programme चला रहा है, जिसका उद्देश्य एक तरफ बाघों के लिए अविघ्न क्षेत्र बनाना और दूसरी तरफ प्रभावित समुदायों को बेहतर पुनर्वास और विकास के अवसर देना है।

आदिवासी समुदायों की आपत्ति क्या है?

समुदायों की सबसे बड़ी चिंता यह होती है कि जंगल उनके लिए सिर्फ जमीन नहीं है। उनकी आजीविका, संस्कृति, धार्मिक परंपराएं और सामाजिक जीवन जंगल से जुड़े होते हैं। पीढ़ियों से जंगल में रहने वाले परिवारों के लिए दूसरे स्थान पर घर और जमीन देना हमेशा उनके पुराने जीवन की भरपाई नहीं कर पाता। दूसरी चिंता प्रक्रिया को लेकर होती है।

अगर वन अधिकारों की पहचान पूरी किए बिना लोगों को हटाया जाता है या ग्राम सभा की भूमिका को कमजोर किया जाता है, तो यह FRA की भावना के खिलाफ होगा। यही वजह है कि कई जगह विवाद पुनर्वास की जरूरत से ज्यादा उसके तरीके को लेकर होता है।

सरकार और समुदाय के तर्क को ऐसे समझिए

संरक्षण का पक्षसमुदाय का पक्ष
बाघों के लिए अविघ्न क्षेत्र जरूरीजंगल पर पारंपरिक अधिकार जरूरी
मानव-बाघ संघर्ष कम करनालोगों को जबरन न हटाया जाए
संवेदनशील कोर क्षेत्र में गतिविधियां सीमित होंग्राम सभा की सहमति जरूरी
पुनर्वास से दोनों पक्षों को फायदा हो सकता हैपुनर्वास में जमीन और आजीविका सुरक्षित हो
वैज्ञानिक संरक्षण जरूरीस्थानीय पारंपरिक ज्ञान को भी महत्व मिले

क्या समाधान लोगों को जंगल से बाहर करना ही है?

जरूरी नहीं। FRA खुद सह-अस्तित्व को एक विकल्प के रूप में मानता है। अगर वैज्ञानिक तरीके से यह संभव हो कि किसी इलाके में समुदाय और वन्यजीव साथ रह सकते हैं, तो लोगों को हटाना पहला विकल्प नहीं होना चाहिए।

दूसरी तरफ ऐसे क्षेत्र भी हो सकते हैं जहां बाघों की सुरक्षा के लिए मानवीय गतिविधियां वास्तव में गंभीर समस्या पैदा कर रही हों। वहां स्वैच्छिक पुनर्वास उचित हो सकता है, लेकिन तभी जब कानून की प्रक्रिया, अधिकारों की पहचान, सहमति और पुनर्वास की शर्तें पूरी हों।

NTCA की मौजूदा व्यवस्था में पुनर्वास के लिए दो विकल्प रखे गए हैं- परिवार को निर्धारित पैकेज की राशि देना या सरकार की ओर से पुनर्वास की व्यवस्था करना। 2021 में पुनर्वास सहायता को बढ़ाकर 15 लाख रुपये प्रति परिवार किया गया था।

राज्यों में विवाद क्यों बढ़ते हैं?

भारत में जंगल, वन्यजीव और स्थानीय समुदायों की परिस्थितियां हर राज्य में अलग हैं। इसलिए एक ही मॉडल हर जगह लागू करना मुश्किल है। कहीं गांव टाइगर रिजर्व के बीचोंबीच हैं, कहीं लोग पीढ़ियों से जंगल की सीमा पर रहते हैं और कहीं पर्यटन, सड़क, खनन या दूसरे विकास कार्य भी जंगल पर दबाव बढ़ा रहे हैं।

इसीलिए विवाद अक्सर तीन स्तरों पर होता है-

  • पहला, वन अधिकारों की पहचान और रिकॉर्ड को लेकर।
  • दूसरा, ग्राम सभा की सहमति और पुनर्वास की प्रक्रिया को लेकर।
  • तीसरा, यह तय करने को लेकर कि किसी इलाके में वास्तव में लोगों की मौजूदगी वन्यजीवों के लिए कितनी बड़ी समस्या है।

2026 में सुप्रीम कोर्ट के सामने तमिलनाडु के श्रीविल्लिपुथुर-मेघमलाई टाइगर रिजर्व से जुड़ा मामला भी आया, जिसमें संरक्षित क्षेत्र, अतिक्रमण और विस्थापन जैसे सवाल उठे। इससे साफ है कि संरक्षण और मानव बस्तियों के बीच संतुलन का मुद्दा अभी भी अदालतों तक पहुंच रहा है।

असली सवाल क्या है?

FRA और टाइगर रिजर्व को एक-दूसरे के विरोधी कानून के रूप में देखना सही नहीं होगा। FRA जंगल पर निर्भर लोगों के अधिकारों को मान्यता देता है, जबकि वन्यजीव कानून बाघ और उसके आवास की रक्षा करता है। दोनों का उद्देश्य अलग है, लेकिन दोनों की सीमा एक ही जगह पर आ जाती है जंगल।

इसलिए असली चुनौती यह है कि जहां संरक्षण के लिए लोगों को हटाना जरूरी हो, वहां उन्हें अधिकारों से वंचित किए बिना कैसे पुनर्वासित किया जाए; और जहां लोग और वन्यजीव साथ रह सकते हैं, वहां समुदाय को संरक्षण की व्यवस्था में भागीदार कैसे बनाया जाए। आखिरकार सवाल 'बाघ या आदिवासी?' का नहीं होना चाहिए।

सवाल यह होना चाहिए कि बाघ भी बचे, जंगल भी बचे और जंगल पर पीढ़ियों से निर्भर लोगों के अधिकार भी सुरक्षित रहें-यह संतुलन कैसे बनाया जाए?' यही वन अधिकार कानून और टाइगर रिजर्व के बीच असली विवाद और सबसे बड़ी चुनौती है।

Updated on:
20 Aug 2026 05:37 pm
Published on:
20 Aug 2026 05:24 pm