
वैज्ञानिकों ने ग्लेशियरों के नीचे छिपे राज से पर्दा उठाया है। वैज्ञानिकों ने ग्लेशियरों के नीचे जमीन की बनावट का पता लगाया है। इसके लिए ग्लेशियरों के नीचे की जमीन का विस्तृत नक्शा तैयार किया गया है। स्वीडन, अमेरिका, स्विट्जरलैंड और नॉर्वे के शोधकर्ताओं ने पृथ्वी के सभी ग्लेशियरों (ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की बड़ी आइस शीट्स को छोड़कर) के नीचे की जमीन का विस्तृत नक्शा तैयार किया है। उप्साला यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता थॉमस फ्रैंक और उनके सहयोगियों ने बताया कि यह नक्शा 100-400 मीटर रिजोल्यूशन पर आधारित है। इससे ग्लेशियरों के नीचे बने घाटियों, गहरी बेसिन और संभावित झील क्षेत्रों की पहचान हुई है।
वैज्ञानिकों के इस अध्ययन ने जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के प्रभावों को लेकर नई चेतावनी जारी की है। शोध के अनुसार, ग्लेशियरों के पिघलने से दुनिया भर में 56,659 नई झीलें बन सकती हैं, जिनमें एशिया के हिमालय क्षेत्र सहित कई संवेदनशील इलाकों में बाढ़ और अन्य खतरे बढ़ सकते हैं। इस अध्यन की शोध टीम में स्वीडन की उप्साला यूनिवर्सिटी, अमेरिका की कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी, स्विट्जरलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ लॉजेन और नॉर्वे की यूनिवर्सिटी ऑफ ओस्लो के वैज्ञानिक शामिल हैं।
वैज्ञानिकों की टीम ने Instructed Glacier Model (IGM) नामक उन्नत 3D आइस फ्लो मॉडल का इस्तेमाल किया। यह सिस्टम GPU और डीप लर्निंग पर आधारित है। IGM मॉडल पारंपरिक तरीकों से हजार गुना तेज है और अधिक सटीक परिणाम देता है। इससे ग्लेशियरों के नीचे की टोपोग्राफी (भू-आकृति) का भौतिक रूप से सुसंगत वैश्विक नक्शा तैयार हुआ है।
GM मॉडल की खासियत है कि यह उच्च-क्रम (Higher-order) आइस फ्लो फिजिक्स को डीप लर्निंग के जरिए तेजी से लागू करता है। पारंपरिक मॉडल CPU पर बहुत धीमे चलते हैं, जबकि IGM GPU पर काम करता है। शोधकर्ताओं ने सतह की ऊंचाई, बर्फ की गति, मोटाई माप और अन्य डेटा का इस्तेमाल कर बेडरॉक (नीचे की जमीन) का अनुमान लगाया। इससे पहले ऐसी विस्तृत वैश्विक मैपिंग संभव नहीं थी। यह अध्ययन जलवायु मॉडलिंग के लिए नया आधार प्रदान करता है। इससे ग्लेशियरों के भविष्य के रिट्रीट (पीछे हटने) और पानी की उपलब्धता का बेहतर अनुमान लगाया जा सकेगा।
पूरी धरती पर लगभग 2 से 2.75 लाख ग्लेशियर हैं। यह सभी ग्लेशियर हिमालय, एंडीज, अलास्का, आर्कटिक और अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में फैले हुए हैं। ये ग्लेशियर धरती पर मौजूद कुल मीठे पानी का करीब 69% भंडार रखते हैं। अध्ययन के अनुसार, इन ग्लेशियरों का कुल आयतन 149.41 ± 29.28 × 10³ घन किलोमीटर है, जो समुद्र स्तर में 308 ± 60 मिलीमीटर की बढ़ोतरी के बराबर है।
ग्लेशियरों के पिघलने पर कम से कम 0.05 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र वाली 56,659 नई झीलें बनेंगी। ये झीलें कुल 40,647 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र घेर सकती हैं और इनमें 3,138 घन किलोमीटर पानी जमा हो सकता है। ग्लेशियरों के पिघलने पर जमा होने वाले पानी की यह मात्रा समुद्र स्तर में 7 मिलीमीटर के बराबर होगी। ये झीलें वर्तमान ग्लेशियर-ढके इलाकों में बनेंगी, जहां आज पूरी तरह बर्फ जमी हुई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लेशियरों के पिघलने से बड़ी मात्रा में पानी जमा होने से कई इलाके बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं। जिसकी वजह से लोगों को समस्या हो सकती है।
हिमालय क्षेत्र (एशिया) में प्रभाव : बर्फ के विशाल ग्लेशियर पिघलने से लाखों लोगों को होने वाली पानी की आपूर्ति प्रभावित होगी। बर्फ के पिघलने से बनने वाली नई झीलों के कारण ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का खतरा बढ़ेगा।
एंडीज क्षेत्र : ग्लेशियरों के पिघलने से दक्षिण अमेरिका के पर्वतीय इलाकों में पानी की कमी और बाढ़ दोनों समस्याएं हो सकती हैं।
अलास्का और आर्कटिक क्षेत्र : ग्लेशियर पिघलने पर पारिस्थितिकी तंत्र बदल जाएगा। इसके अलावा नए जलमार्ग बन सकते हैं। इससे स्थानीय समुदायों के लिए खतरा पैदा हो सकता है। वहीं, समुद्र तल की वृद्धि में करीब 7 मिमी तक कमी आएगी, क्योंकि पानी झीलों में रुकेगा, लेकिन स्थानीय आपदाएं बढ़ेंगी।
ग्लेशियर पृथ्वी के वॉटर टावर्स हैं। ग्लेशियर सिर्फ बर्फ नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता के भविष्य का आधार हैं। इनके पिघलने से न केवल समुद्र स्तर बढ़ेगा, बल्कि नदियों का प्रवाह अनियमित हो जाएगा। ग्लेशियरों के पिघलने से शुरुआत में बाढ़ और बाद में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है। ग्लेशियर पिघलने से व्यापक स्तर पर प्रभाव पड़ेगा। हिमालय से निकलने वाली नदियां (गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु आदि) पर निर्भर करीब 2 अरब से अधिक लोगों की जिंदगी प्रभावित होगी।
विश्व मौसम संगठन (WMO) और यूनेस्को पहले ही 2025 को ग्लेशियर संरक्षण वर्ष घोषित कर चुके हैं। इस अध्ययन से साफ है कि तत्काल कार्बन उत्सर्जन कम करना और अनुकूलन रणनीतियां बनाना जरूरी है। शोधकर्ताओं ने जोर दिया कि यह नक्शा न केवल वैज्ञानिकों, बल्कि नीति-निर्माताओं के लिए भी महत्वपूर्ण है। ग्लेशियरों के पिघलने से बनने वाली झीलों में बाढ़ प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और पर्यटन की योजना बनानी होगी।
हिमनद (Glacier) एक ऐसा शब्द है, जिसका प्रयोग बर्फ के एक विशाल पिंड का परिचय देने के लिए किया जाता है। ग्लेशियर, संपीड़ित बर्फ से बनते हैं और अपने ही भार के कारण गतिमान रहता है। हिमनद बहुत धीमी गति से चलते हैं और कभी-कभी इन्हें 'बर्फ की नदियां' भी कहा जाता है। हिमनद बहुत धीमी गति से चलते हैं और कभी-कभी इन्हें 'बर्फ की नदियां' भी कहा जाता है। पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले छोटे ग्लेशियर, जो केवल कुछ मीटर चौड़े हो सकते हैं। कुछ ग्लेशियर सैकड़ों व हजारों किलोमीटर तक फैले हो सकते हैं। इन्हें दो अलग-अलग प्रकारों सीमित ग्लेशियर और असीमित ग्लेशियर में विभाजित कर सकते हैं। सीमित ग्लेशियरों पर बर्फ चट्टान और आसपास की स्थलाकृति सीमित होती है। वहीं, असीमित ग्लेशियर की बर्फ, भूमि के विशाल क्षेत्रों में बहने में सक्षम होते हैं।