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जंगल में 2 महीने तक बारिश न हो तो क्या होगा? एरिजोना के ‘कांच के जंगल’ में वैज्ञानिकों ने अनोखे प्रयोग से खोजा जवाब

पौधों के लिए बारिश का पानी बेहद जरूरी है, लेकिन अगर किसी जंगल में लगातार 9.5 हफ्तों तक एक बूंद पानी न बरसे तो क्या होगा? इसी सवाल का जवाब खोजने के लिए अमेरिका के एरिजोना स्थित बायोस्फियर 2 रिसर्च फैसिलिटी में वैज्ञानिकों ने एक अनोखा प्रयोग किया था।
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भारत

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Vinay Shakya

Sep 11, 2026

unique experiment on plants

सांकेतिक इमेज (सोर्स- Chatgpt)

पौधों के लिए बारिश का पानी बेहद जरूरी है, लेकिन अगर किसी जंगल में लगातार 9.5 हफ्तों तक एक बूंद पानी न बरसे तो क्या होगा? इसी सवाल का जवाब खोजने के लिए अमेरिका के एरिजोना स्थित बायोस्फियर 2 रिसर्च फैसिलिटी में वैज्ञानिकों ने एक अनोखा प्रयोग किया था। यह कोई प्राकृतिक जंगल नहीं, बल्कि एरिजोना विश्वविद्यालय द्वारा तैयार किया गया 'कांच और स्टील' से बना एक पूरी तरह से बंद (एनक्लोज्ड) इकोलॉजिकल रिसर्च कॉम्प्लेक्स है, जो टक्सन शहर से करीब एक घंटे की दूरी पर सोनोरन रेगिस्तान की कैटालिना पर्वत श्रृंखला में स्थित है। इसके अंदर बनाई गई कृत्रिम ट्रॉपिकल रेनफॉरेस्ट में ही यह सूखे का प्रयोग किया गया था।

वैज्ञानिकों ने क्या प्रयोग किया?


वैज्ञानिकों ने पौधों पर यह प्रयोग 2019 में किया था। इसे नाम दिया गया था "वॉटर, एटमॉसफियर एंड लाइफ डायनेमिक्स", जिसे संक्षेप में WALD है। जर्मन भाषा में WALD का अर्थ जंगल है। फिज.ऑर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2019 में रेनफॉरेस्ट बायोम को आम पर्यटकों के लिए बंद कर दिया गया था और अक्टूबर 2019 से वैज्ञानिकों ने पानी की आपूर्ति पूरी तरह रोक दी।

यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना न्यूज तथा साइंस जर्नल में प्रकाशित शोध के अनुसार, पौधों को पूरे 65 दिन यानी करीब 9.5 हफ्तों तक बिल्कुल भी पानी नहीं दिया गया, जबकि पूरी परियोजना सितंबर 2019 से जनवरी 2020 तक, यानी करीब 4 महीने चली।

किसने और क्यों किया यह प्रयोग?

इस अंतरराष्ट्रीय परियोजना का नेतृत्व 3 वैज्ञानिकों ने किया। एरिजोना विश्वविद्यालय की रेनफॉरेस्ट साइंस डायरेक्टर लॉरा मेरेडिथ, जर्मनी की फ्राइबुर्ग यूनिवर्सिटी की क्रिस्टियाने वर्नर और नेमिया लैड ने प्रयोग किया। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, 4 देशों के 13 संस्थानों से जुड़े करीब 80 वैज्ञानिकों की टीम ने इसमें हिस्सा लिया।

इसे जर्मनी की यूरोपियन रिसर्च काउंसिल (ERC) से मिले 21 लाख डॉलर (करीब 2.1 मिलियन डॉलर) के अनुदान से फंड किया गया था। इस प्रयोग का मकसद यह समझना था कि जलवायु परिवर्तन के चलते गर्म और सूखी होती परिस्थितियों में उष्णकटिबंधीय जंगल किस तरह प्रतिक्रिया देंगे। क्या सूखे में जंगल कार्बन छोड़कर जलवायु संकट को और बढ़ाएंगे, या कार्बन को रोककर उसे धीमा करने में मदद करेंगे?

जंगल का आकार और निगरानी तंत्र

यह कृत्रिम रेनफॉरेस्ट करीब 3 एकड़ (लगभग 7 टेनिस कोर्ट के बराबर) क्षेत्र में फैला है। इसमें पौधों की 90 प्रजातियां मौजूद हैं, जिनमें बड़े पेड़ भी शामिल हैं। प्रयोग के दौरान मिट्टी, पौधों और वातावरण में पानी व कार्बन की स्थिति नापने के लिए करीब 133 सेंसर और लगभग दो मील लंबी टेफ्लॉन ट्यूबिंग बिछाई गई थी। वैज्ञानिकों ने सूखे से पहले और सूखे के दौरान कार्बन-13 (एक आइसोटोप ट्रेसर) मिली हुई कार्बन डाइऑक्साइड भी जंगल में छोड़ी, ताकि यह ट्रैक किया जा सके कि पौधे और मिट्टी के सूक्ष्मजीव कार्बन का इस्तेमाल कैसे करते हैं।

प्रयोग के नतीजे: 70% कार्बन घटा

साइंस जर्नल में प्रकाशित नतीजों और एरिजोना यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट के अनुसार, सूखे के दौरान जंगल की कार्बन भंडारण क्षमता में करीब 70% की गिरावट दर्ज की गई, जो जलवायु परिवर्तन के दौर में जंगलों की कार्बन सोखने की क्षमता को लेकर चिंता बढ़ाती है। लेकिन साथ ही यह भी सामने आया कि जंगल का इकोसिस्टम सूखे के आगे पूरी तरह नहीं झुका।

अलग-अलग पौधों ने पानी के इस्तेमाल की अलग-अलग रणनीतियां अपनाईं। कुछ पेड़ों ने मिट्टी की ऊपरी सतह सूखते ही पानी का इस्तेमाल घटा दिया, जबकि गहरी जड़ों वाले कुछ बड़े पेड़ जमीन के भीतर तीन मीटर से भी ज्यादा गहराई तक जमा पानी तक पहुंच गए। कुछ पौधे खुद फलते-फूलते हुए छोटे पौधों को छांव भी देते रहे। शोधकर्ताओं का अनुमान था कि सूखे से प्रभावित पेड़ तुरंत गहरे पानी का सहारा लेंगे, लेकिन असल में ऐसा सिर्फ सबसे ज्यादा सूखे वाले हिस्सों में ही देखा गया। यानी हर पेड़ पर सूखे का असर एक जैसा नहीं पड़ा।

प्रयोग के दौरान पहली कृत्रिम बारिश

एरिजोना यूनिवर्सिटी की आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक, प्रयोग के अंत में वैज्ञानिकों ने मुख्य वॉल्व खोलकर करीब 12,000 गैलन पानी जंगल में छोड़ा। यह दो महीने से ज्यादा समय में जंगल की पहली "बारिश" थी। इसके बाद वैज्ञानिकों ने जंगल के दोबारा हरा-भरा होने और मिट्टी-सूक्ष्मजीवों की रिकवरी को भी करीब से नापा।

बायोस्फियर 2 क्यों खास है?

बायोस्फियर 2 दुनिया की इकलौती ऐसी सुविधा, जहां किसी पूरे जंगल को कांच के गुंबद में बंद कर उसकी बारिश, तापमान और नमी को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है। यह काम खुले प्राकृतिक जंगलों में संभव नहीं। यही वजह है कि यह प्रयोग खुले वर्षावनों की बजाय यहां किया गया। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस तरह के नियंत्रित प्रयोगों से मिले आंकड़े भविष्य में जलवायु परिवर्तन के मॉडल बेहतर बनाने में मदद करेंगे, ताकि यह समझा जा सके कि असली अमेजन जैसे वर्षावन बढ़ते सूखे और गर्मी के दौर में किस तरह टिके रहेंगे।

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