
भारत में सरकारी नौकरी को लेकर सबसे बड़ा आकर्षण सिर्फ वेतन नहीं, बल्कि सरकारी आवास (Government Housing) भी है। रेलवे कॉलोनियों, सेना के आवासों, पुलिस लाइनों और सरकारी क्वार्टरों में लाखों कर्मचारी और उनके परिवार रहते हैं। लेकिन इन आवासों की संख्या कितनी है, कितने मकान खाली पड़े हैं और क्या सभी सरकारी कर्मचारियों को मकान मिलता है? इसका जवाब उतना सीधा नहीं है।
सरकारी मकान वे आवास होते हैं जिन्हें सरकार अपने कर्मचारियों को नौकरी के दौरान रहने के लिए उपलब्ध कराती है।
इनमें शामिल हैं:
केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए सबसे बड़ा आवास नेटवर्क General Pool Residential Accommodation (GPRA) कहलाता है। सरकार ने 2014 में संसद को बताया था कि दिल्ली में GPRA के तहत 59,293 सरकारी आवास उपलब्ध थे। उसी समय इन आवासों की मांग एक लाख से अधिक थी, यानी उपलब्ध मकानों की तुलना में जरूरत काफी ज्यादा थी। यही वजह है कि सरकार लगातार नई सरकारी कॉलोनियां और आवासीय परियोजनाएं विकसित करती रही है।
दिल्ली का उदाहरण बताता है कि सरकारी मकानों की मांग आज भी अधिक है। लोकसभा में 2010 में दिए गए एक जवाब के अनुसार:
| विवरण | संख्या |
|---|---|
| Type-IV आवासों का कुल स्टॉक | 5,300 |
| आवंटित मकान | 5,072 |
| प्रतीक्षा सूची में कर्मचारी | 2,200 |
इससे पता चलता है कि कई श्रेणियों में आज भी कर्मचारियों को आवास के लिए इंतजार करना पड़ता है।
भारतीय रेलवे देश के सबसे बड़े नियोक्ताओं में से एक है। 2023 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार रेलवे में लगभग 11.75 लाख नियमित कर्मचारी कार्यरत थे। रेलवे के पास देशभर में विशाल आवासीय नेटवर्क है, जिसमें रेलवे क्वार्टर, रेलवे कॉलोनियां और कर्मचारी आवास शामिल हैं।
हालांकि रेलवे कॉलोनियों की कुल संख्या का कोई एक राष्ट्रीय आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन रेलवे भारत के सबसे बड़े सरकारी आवास प्रदाताओं में शामिल है।
भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के लिए अलग आवासीय व्यवस्था होती है। इनमें प्रमुख हैं:
इन योजनाओं के तहत लाखों सैनिकों और अधिकारियों के परिवारों को आवास उपलब्ध कराया जाता है।
सरकारी आवासों की कहानी का दूसरा पहलू खाली पड़े मकान हैं। आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) की Affordable Rental Housing Complex (ARHC) योजना के तहत देशभर में 83,534 सरकारी वित्तपोषित मकान खाली पाए गए थे।
| राज्य | खाली मकान |
|---|---|
| महाराष्ट्र | 32,345 |
| दिल्ली | 29,112 |
| उत्तर प्रदेश | 5,232 |
| Rajasthan | 4,884 |
| गुजरात | 4,414 |
यह आंकड़ा केवल ARHC योजना के तहत पहचाने गए सरकारी वित्तपोषित आवासों का है, सभी सरकारी क्वार्टरों का नहीं।
नहीं। भारत में ऐसा कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है जो बताता हो कि कुल कितने सरकारी कर्मचारी सरकारी आवास में रहते हैं। कई कर्मचारियों को HRA (House Rent Allowance) मिलता है। निजी मकान किराए पर लेना पड़ता है। स्वयं का घर होता है। इसलिए सरकारी नौकरी होने का मतलब यह नहीं कि कर्मचारी को सरकारी मकान भी मिलेगा।
सरकारी मकान पूरी तरह मुफ्त नहीं होते। इन पर लाइसेंस फीस (License Fee) ली जाती है, जिसे आम बोलचाल में सरकारी किराया कहा जाता है। सरकारी आवासों का किराया कर्मचारी के पद पर, आवास की श्रेणी (Type-I से Type-VI), शहर और स्थान पर भी निर्भर करता है। आमतौर पर यह बाजार दर से काफी कम होता है, इसलिए इसे सरकारी नौकरी का एक बड़ा लाभ माना जाता है।
बहुत से लोग मानते हैं कि सभी सरकारी कर्मचारियों को सरकारी मकान मिलता है। वास्तविकता यह है कि
यानी भारत में एक तरफ आवास की मांग है, तो दूसरी तरफ कुछ स्थानों पर सरकारी मकान खाली भी पड़े हैं।