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क्या BCI अध्यक्ष NALSAR के छात्रों को एनरोलमेंट से रोक सकते हैं? जानिए अधिकार, कानून और उठ रहे सवाल

क्या आप जानते हैं कि एक प्रतिवेदन (representation) ने NALSAR के 2026 बैच के छात्रों के अधिवक्ता के ​लिए एनरोलमेंट पर रोक लगा दी थी? क्या यह कदम छात्रों के मौलिक अधिकारों पर हमला था? जानिए इस विवाद के पीछे की पूरी कानूनी कहानी।
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Bar Council of India

हैदराबाद की नालसर विधि विश्वविद्यालय के छात्रों पर रोक लगाने पर बवाल। (Photo: ChatGpt)

हैदराबाद की NALSAR University of Law के 2026 बैच के कानून छात्रों के नामांकन को लेकर बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) का हालिया घटनाक्रम कई गंभीर संवैधानिक और संस्थागत सवाल खड़े करता है। विवाद की शुरुआत उस प्रतिवेदन से हुई जिसमें विश्वविद्यालय के करीब 70 स्नातक छात्रों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि बनाए जाने पर आपत्ति जताई थी। इसके बाद 13 अगस्त को BCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने सभी State Bar Councils को निर्देश दिया कि NALSAR के 2026 बैच के स्नातकों को अगले आदेश तक अधिवक्ता के रूप में नामांकित न किया जाए और विश्वविद्यालय से अभियान में शामिल छात्रों की रिपोर्ट मांगी।

BCI अध्यक्ष ने एक घंटे बाद ही वापस लिया अपना आदेश

लगभग एक घंटे बाद ही मनन मिश्रा ने नामांकन पर रोक वापस ले ली। हालांकि उस वक्त उन्होंने अभियान आयोजित करने वालों के खिलाफ जांच जारी रखने की बात कही थी। इसके कुछ घंटे बाद 13-14 अगस्त की मध्यरात्रि को (12:37 बजे) मिश्रा ने X पर एक पोस्ट में कहा कि सीनियर एडवोकेट्स, बार के सदस्यों, लॉ छात्रों और आम नागरिकों की प्रतिक्रियाओं पर विचार करने के बाद BCI संतुष्ट है कि 2026 बैच की किसी भी "गड़बड़ी या आंदोलन" में कोई भूमिका नहीं थी, इसलिए कार्यवाही पूरी तरह बंद की जाती है। इसी बीच NALSAR के वाइस-चांसलर श्रीकृष्ण देव राव ने भी BCI को पत्र लिखकर कहा कि वे छात्रों के खिलाफ जांच का मामला विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद को भेजेंगे और इसके साथ ही ऐसी रिपोर्ट मांगे जाने पर ही सवाल उठाए।

कब शुरू हुआ था विवाद?

यह विवाद 23 जुलाई 2026 को शुरू हुआ, जब NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, हैदराबाद के 2026 पासआउट बैच के लगभग 70 छात्रों (कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार 450 से अधिक छात्रों ने भी हस्ताक्षर किए) ने वाइस-चांसलर, रजिस्ट्रार और फैकल्टी को एक ईमेल प्रतिवेदन भेजा। इसमें उन्होंने भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित न करने का अनुरोध किया।

NALSAR: छात्रों की क्या थीं आपत्तियां

  1. 22-23 जुलाई की सुनवाई - 20 जुलाई को "चलो संसद" मार्च के दौरान कथित पुलिस ज्यादती को लेकर दायर याचिका पर CJI सूर्यकांत की बेंच ने तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया था। जब वकील ने पुलिस कार्रवाई के वीडियो सबूत पेश करने की पेशकश की, तो CJI ने कहा कि कोर्ट के पास वीडियो देखने का समय नहीं है।
  2. 15 मई की टिप्पणी - फर्जी लॉ डिग्री से जुड़े एक मामले की सुनवाई में CJI सूर्यकांत की टिप्पणी को कुछ लोगों ने बेरोजगार युवाओं के लिए अपमानजनक ("तिलचट्टे") माना, हालांकि बाद में CJI ने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी केवल फर्जी डिग्रीधारकों पर लक्षित थी, युवाओं पर नहीं।

BCI अध्यक्ष ने कैंपस में गंदी राजनीति का लगाया आरोप

13 अगस्त 2026 को BCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने सभी राज्य बार काउंसिलों को एक आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया कि NALSAR के 2026 बैच के किसी भी छात्र को "अगले आदेश तक" अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत नहीं किया जाएगा। आदेश में शिक्षकों पर भी "कैंपस में गंदी राजनीति" करने का आरोप लगाया गया था।

आदेश मनमाना, अवैध और असंगत: अध्यक्ष

व्यापक आलोचना के बाद जिसमें सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह का यह बयान भी शामिल था कि यह आदेश "मनमाना, अवैध और असंगत" (arbitrary, illegal and disproportionate) है। BCI ने उसी दिन, लगभग एक घंटे के भीतर आदेश को संशोधित कर वापस ले लिया। नए आदेश में कहा गया कि "बहुसंख्य छात्र निर्दोष हैं" और सभी को अपनी पसंद की राज्य बार काउंसिल में पंजीकरण की अनुमति दी गई। हालांकि BCI ने यह भी कहा कि वह वाइस-चांसलर की जांच रिपोर्ट का इंतज़ार करेगा, जिसमें कुछ शिक्षकों और "बाहरी लोगों" की भूमिका की जांच होगी।

क्या BCI ऐसा आदेश जारी कर सकता है?

BCI को वकीलों के नामांकन और योग्यता को नियंत्रित करने का अधिकार Advocates Act, 1961 के तहत प्राप्त है। लेकिन इस कानून में किसी विशेष संस्थान के पूरे बैच को सामूहिक रूप से पंजीकरण से वंचित करने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। इसी आधार पर विकास सिंह ने भी बताया कि Advocates Act नामांकन और अयोग्यता के लिए वैधानिक ढाँचा तय करता है, और पूरे बैच पर रोक लगाना उस ढाँचे से बाहर जाना है।

'संवैधानिक अधिकारों का प्रश्न'

इस आदेश को कई लोग छात्रों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन मानते हैं क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत पेशा चुनने और उसका अभ्यास करने का अधिकार सभी को है। विकास सिंह ने भी स्पष्ट तौर पर कहा कि यह पूरे बैच पर लगाई गई रोक अनुच्छेद 19(1)(g) से जुड़ी चिंताएं पैदा करती है, और BCI जैसी शीर्ष नियामक संस्था को युवा स्नातकों के पेशेवर भविष्य को संस्थागत अनुशासन का हथियार नहीं बनाना चाहिए।

क्या उठ रहे मुख्य सवाल

  • क्या BCI ने अपनी वैधानिक सीमा से बाहर जाकर आदेश जारी किया?
  • क्या यह आदेश छात्रों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने का प्रयास था?
  • क्या इस तरह का आदेश भविष्य में अन्य संस्थानों या बैचों पर भी लागू हो सकता है?
  • क्या BCI को इस तरह के आदेश जारी करने से पहले उचित प्रक्रिया (due process) या न्यायिक समीक्षा का इंतज़ार करना चाहिए?

वाइस चांसलर की रिपोर्ट आने पर कार्रवाई की बात

आदेश वापस लिए जाने के बावजूद, मामला अभी भी पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। BCI ने वाइस-चांसलर की जांच रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की बात कही है, जिसका दायरा फैकल्टी, रिसर्च स्कॉलर्स, पूर्व छात्रों और "बाहरी लोगों" तक फैला हुआ बताया गया है। यह मामला संवैधानिक अधिकारों और नियामक संस्थाओं की सीमाओं पर सवाल खड़े करता है, और भविष्य में न्यायिक चुनौती का विषय बन सकता है।

जरूरी सुधार (मूल ड्राफ्ट बनाम तथ्य)

मूल ड्राफ्ट में क्या थातथ्यात्मक स्थिति
छात्रों ने दीक्षांत समारोह में "विरोध" कियाछात्रों ने समारोह से पहले (23 जुलाई) एक लिखित प्रतिवेदन/ईमेल भेजा था — यह सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि प्रशासन को संबोधित अनुरोध था
विरोध का कारण अस्पष्ट रखा गयाविरोध की जड़ें दो विशिष्ट घटनाओं में थीं: पुलिस ज्यादती याचिका पर तुरंत सुनवाई से इनकार, और मई की "तिलचट्टे" वाली टिप्पणी (जिसे बाद में CJI ने स्पष्ट किया)
BCI अध्यक्ष का नाम नहीं दिया गयाBCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा हैं
"कुछ ही समय बाद" आदेश वापस लिया गयाआदेश उसी दिन, करीब एक घंटे के भीतर वापस लिया गया
मामला पूरी तरह खत्म बताया गयाBCI ने वाइस-चांसलर की जांच रिपोर्ट लंबित रखी है — मामला अभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ