
IIT NIT Fees Scholarship: IIT NIT की फीस उड़ाती है होश, सिर्फ कॉलेज में पढ़ाई लाखों रुपए का खर्च। तो क्या अमीरों का बनकर रह गया है इंजीनियरिंग का सपना? (AI Creative)
IIT NIT Fees and Scholarship: भारत में इंजीनियर बनने का सपना आज भी लाखों विद्यार्थियों की आंखों में है। किसी छोटे शहर के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला छात्र हो या महानगर के महंगे कोचिंग संस्थान में तैयारी कर रहा विद्यार्थी, आईआईटी और एनआईटी में प्रवेश को बेहतर करियर की सबसे बड़ी सीढ़ियों में माना जाता है। लेकिन इस सपने की राह में एक सवाल लगातार बड़ा होता जा रहा है, क्या देश में अच्छी इंजीनियरिंग शिक्षा तक पहुंच केवल परीक्षा में अच्छे अंक और रैंक से तय होती है या परिवार की आर्थिक क्षमता भी इसमें बड़ी भूमिका निभाने लगी है?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि, देश के सबसे प्रतिष्ठित सरकारी तकनीकी संस्थानों में सीटें सीमित हैं, जबकि इंजीनियरिंग पढ़ने की इच्छा रखने वाले विद्यार्थियों की संख्या कहीं ज्यादा।
2026-27 के लिए संयुक्त सीट आवंटन प्राधिकरण यानी जोसाआ के दायरे में 138 संस्थान हैं। इनमें 23 आईआईटी, आईआईएससी बेंगलुरु, 31 एनआईटी, आईआईईएसटी शिवपुर, 26 आईआईआईटी और 56 अन्य सरकारी वित्तपोषित तकनीकी संस्थान शामिल हैं। यह आंकड़ा बताता है कि देश में उच्च गुणवत्ता वाले सरकारी तकनीकी संस्थानों का नेटवर्क पहले से काफी बड़ा है। लेकिन दूसरी तस्वीर प्रवेश की प्रतिस्पर्धा दिखाती है।
2025 में जेईई एडवांस की परीक्षा में दोनों पेपर देने वाले 1,80,422 विद्यार्थी थे। इनमें से 54,378 विद्यार्थी ही सफल घोषित हुए। यानी आईआईटी तक पहुंचने की पहली बड़ी चुनौती ही इतनी कठिन है कि परीक्षा देने वाले हर विद्यार्थी के लिए यह रास्ता खुला नहीं रहता। और यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है कि, जेईई एडवांस में सफल होना और आईआईटी में सीट मिलना एक ही बात नहीं है। सीटें सीमित हैं और विद्यार्थियों को अपनी रैंक, पसंद, श्रेणी और उपलब्ध सीटों के आधार पर विकल्प मिलते हैं।
2025 में 23 आईआईटी में लगभग 18,160 स्नातक सीटें थीं। एनआईटी में लगभग 24,525 सीटें थीं। यानी केवल इन दोनों संस्थानों को देखें तो सीटों की संख्या उन लाखों विद्यार्थियों की तुलना में बहुत कम है जो, देशभर में इंजीनियरिंग को करियर के रूप में चुनना चाहते हैं।
लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि आईआईटी या एनआईटी में जगह न मिलने वाला विद्यार्थी इंजीनियर नहीं बन सकता। देश में राज्य सरकारों के इंजीनियरिंग कॉलेज, सरकारी विश्वविद्यालय, अन्य सरकारी वित्तपोषित संस्थान और बड़ी संख्या में निजी इंजीनियरिंग कॉलेज मौजूद हैं। लेकिन असल में यहां भी पेरेंट्स और इंजीनियरिंग की चाह रखने वाले बच्चों के सामने एक बड़ा सवाल है कि इन विकल्पों की गुणवत्ता और लागत में कितना अंतर है?
आईआईटी की फीस को देखकर अक्सर यह धारणा बनती है कि यहां पढ़ाई केवल आर्थिक रूप से मजबूत परिवारों के बच्चे ही कर सकते हैं। लेकिन वास्तविक तस्वीर इससे ज्यादा जटिल है।
उदाहरण के तौर पर आईआईटी मद्रास के 2026 के शुल्क नियमों में सामान्य, ओबीसी-एनसीएल और ईडब्ल्यूएस विद्यार्थियों के लिए पारिवारिक आय के आधार पर ट्यूशन फीस में छूट का प्रावधान है। एक लाख से पांच लाख रुपए वार्षिक पारिवारिक आय वाले विद्यार्थियों को ट्यूशन फीस में दो-तिहाई की छूट दी जाती है।
आईआईटी मद्रास में एक लाख रुपए से कम वार्षिक अभिभावकीय आय वाले विद्यार्थियों के लिए पूरी ट्यूशन फीस माफी की व्यवस्था भी बताई गई है। संस्थान विभिन्न छात्रवृत्तियों और वित्तीय सहायता योजनाओं के जरिए जरूरतमंद विद्यार्थियों की मदद करता है। इसका मतलब यह हुआ कि आईआईटी की घोषित फीस और विद्यार्थी द्वारा वास्तव में चुकाई जाने वाली फीस हमेशा एक जैसी नहीं होती।
हॉस्टल, भोजन, किताबें, कंप्यूटर या लैपटॉप, यात्रा और अन्य शैक्षणिक खर्च भी परिवार पर असर डालते हैं। इसलिए आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के लिए सवाल केवल 'फीस कितनी है' नहीं, बल्कि 'चार साल की पूरी पढ़ाई का कुल खर्च कितना होगा और उसमें कितनी सहायता मिलेगी' है।
सरकार ने आर्थिक कारणों से उच्च शिक्षा का सपना न टूटे, इसके लिए पीएम-विद्यालक्ष्मी योजना शुरू की है। इस योजना के तहत पात्र विद्यार्थियों को गुणवत्ता वाले उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश मिलने पर बिना संपार्श्विक और बिना गारंटर शिक्षा ऋण की सुविधा दी जा सकती है। सात लाख रुपए तक के ऋण पर सरकार 75 प्रतिशत की क्रेडिट गारंटी उपलब्ध कराती है।
इसके अलावा जिन विद्यार्थियों के परिवार की वार्षिक आय आठ लाख रुपए तक है, उनके लिए 10 लाख रुपए तक के शिक्षा ऋण पर तीन प्रतिशत ब्याज सहायता का प्रावधान है। हालांकि इसके लिए अन्य सरकारी छात्रवृत्ति या ब्याज सहायता का लाभ न लेने जैसी शर्तें भी हैं। यानी सरकार की नीति केवल छात्रवृत्ति देने तक सीमित नहीं है। फीस और अन्य शैक्षणिक खर्चों के लिए शिक्षा ऋण को भी एक माध्यम बनाया गया है।
समस्या को केवल 'आईआईटी की फीस बहुत ज्यादा है' कह देना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। पहली चुनौती है सीटों की संख्या। दूसरी है प्रवेश परीक्षा की बेहद कड़ी प्रतिस्पर्धा। और तीसरी है जेईई की तैयारी का खर्च।
परीक्षा की तैयारी के लिए कोचिंग, आवास, किताबें, परीक्षण श्रृंखला और दूसरे संसाधनों पर होने वाला खर्च परिवारों की आर्थिक क्षमता के अनुसार बहुत अलग हो सकता है। तब चौथी चुनौती सामने आती है आईआईटी या एनआईटी में जगह न मिलने के बाद का विकल्प।
अगर किसी विद्यार्थी को सरकारी कॉलेज में पसंद का पाठ्यक्रम नहीं मिलता और वह निजी संस्थान चुनता है, तो परिवार का आर्थिक बोझ कई मामलों में काफी बढ़ सकता है। यहां फीस कॉलेज, पाठ्यक्रम और शहर के हिसाब से बहुत अलग होती है। इसलिए पूरे निजी क्षेत्र को एक ही फीस के पैमाने से देखना भी सही नहीं होगा।
यह ऐसा सवाल है, जिसका जवाब हां या ना में नहीं दिया जा सकता। इसे समझना जरूरी होगा। दरअसल आईआईटी की सीट न मिलना इंजीनियर बनने का सपना खत्म होना नहीं है। आईआईटी और एनआईटी देश के इंजीनियरिंग शिक्षा तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन पूरा तंत्र केवल इन्हीं संस्थानों तक सीमित नहीं है।
वहीं दूसरा सच यह भी है कि देश के सबसे प्रतिष्ठित सरकारी संस्थानों में सीटों की संख्या सीमित है। 2025 में जेईई एडवांस में दोनों पेपर देने वाले 1.80 लाख से ज्यादा विद्यार्थियों के मुकाबले आईआईटी की सीटें करीब 18 हजार थीं। यही अंतर इस बहस को जन्म देता है कि क्या भारत में प्रतिभा के लिए पर्याप्त उच्च गुणवत्ता वाले और किफायती विकल्प उपलब्ध हैं?
भारत की व्यवस्था में आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए फीस माफी, छात्रवृत्ति, संस्थागत वित्तीय सहायता और शिक्षा ऋण जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि आईआईटी-एनआईटी केवल अमीर विद्यार्थियों के लिए हैं। हां लेकिन दूसरी तरफ यह सवाल भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि एक गरीब परिवार का विद्यार्थी और एक आर्थिक रूप से मजबूत परिवार का विद्यार्थी जेईई की तैयारी और इंजीनियरिंग शिक्षा की पूरी यात्रा में समान परिस्थितियों से गुजरते हैं या नहीं। यही वह स्थिति है जहां, भारत की इंजीनियरिंग शिक्षा व्यवस्था की अगली परीक्षा होती है।
ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि कितने विद्यार्थियों ने आईआईटी में प्रवेश पाया। सवाल यह भी होना चाहिए कि कितने मेधावी विद्यार्थी आर्थिक कारणों से महंगी कोचिंग नहीं ले पाए, कितनों को पसंद का सरकारी संस्थान नहीं मिला, कितनों ने निजी कॉलेज की फीस के कारण विषय या कॉलेज बदला और कितनों को शिक्षा ऋण लेना पड़ा।
अगर सरकार की योजनाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पैसे की कमी किसी प्रतिभाशाली विद्यार्थी को उच्च शिक्षा से दूर न करे, तो अगला कदम केवल योजनाएं बनाना नहीं बल्कि, यह देखना भी होना चाहिए कि जरूरतमंद विद्यार्थी वास्तव में इन योजनाओं तक कितनी आसानी से पहुंच पा रहे हैं। इसलिए आईआईटी-एनआईटी को 'अमीरों की शिक्षा' कहना शायद जल्दबाजी होगी। लेकिन यह पूछना पूरी तरह जायज है कि क्या भारत में हर मेधावी बच्चे के लिए इंजीनियरिंग शिक्षा की राह उसकी प्रतिभा के बराबर ही आर्थिक रूप से भी सुलभ है?
Updated on:
14 Aug 2026 11:06 am
Published on:
14 Aug 2026 11:06 am
