
Red Fort vande mataram 2026: क्या आप जानते हैं लाल किले का पुराना नाम, पहली बार यहां कब फहराया गया था तिरंगा 15 या 16 अगस्त को? (AI Creative)
Red Fort Vande Mataram 2026: लाल किला सिर्फ दिल्ली की एक ऐतिहासिक इमारत नहीं है। यह भारत की सत्ता, संघर्ष और आजादी के बदलते दौर का जीवंत दस्तावेज है। मुगल बादशाह शाहजहां के शाही वैभव से लेकर अंग्रेजी हुकूमत की सैन्य छावनी तक और फिर स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक उत्सव तक, इस किले ने इतिहास के कई निर्णायक मोड़ अपनी आंखों से देखे हैं। अब 15 अगस्त 2026 को इसकी प्राचीर एक और ऐतिहासिक क्षण की गवाह बनने जा रही है। पहली बार स्वतंत्रता दिवस समारोह में लाल किले की प्राचीर से वंदे मातरम् का सामूहिक गायन होगा।
भारत इस बार अपनी आजादी के 79 साल पूरे करते हुए 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार 2026 के समारोह में वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने और युवा शक्ति फॉर 'विकसित भारत@2047' को विशेष रूप से केंद्र में रखा गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले की प्राचीर से राष्ट्रीय ध्वज फहराएंगे और राष्ट्र को संबोधित करेंगे। इसके साथ ही पहली बार समारोह में 'वंदे मातरम्' का गायन होगा।
यही वह मौका है जब लाल किले की कहानी को सिर्फ एक स्मारक की कहानी के रूप में नहीं, बल्कि सत्ता से स्वतंत्रता और स्वतंत्रता से लोकतंत्र तक के भारत की कहानी के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।
लाल किले की कहानी मुगल बादशाह शाहजहां से शुरू होती है। शाहजहां ने अपनी नई राजधानी शाहजहानाबाद के लिए इस विशाल महल-किले का निर्माण कराया। इसका निर्माण अप्रैल 1639 में शुरू हुआ और 1648 में पूरा हुआ। विशाल लाल बलुआ पत्थर की दीवारों के कारण यह 'लाल किला' कहलाया, लेकिन इसका मूल नाम 'किला-ए-मुबारक' यानी शुभ किला था।
यह सिर्फ सुरक्षा के लिए बनाया गया दुर्ग नहीं था। यह मुगल सत्ता का शानदार शाही परिसर था। यूनेस्को के अनुसार लाल किले की वास्तुकला में फारसी, तैमूरी और भारतीय परंपराओं का अद्भुत मेल दिखाई देता है। यही वजह है कि इसे मुगल वास्तुकला की पराकाष्ठा के उदाहरणों में गिना जाता है। दिलचस्प बात यह कि लाल किले की कहानी अकेले इस किले से पूरी नहीं होती। इसके पास ही में 1546 में बना सलीमगढ़ किला है। दोनों मिलकर आज 'लाल किला परिसर' बनाते हैं।
आज जिस लाल किले को हम विशाल लाल दीवारों और प्राचीर के रूप में देखते हैं, उसके भीतर कभी शाही जीवन का बिल्कुल अलग संसार था। शाहजहां के निजी महलों और कक्षों को नहर-ए-बहिश्त यानी 'स्वर्ग की धारा' नाम की जलधारा जोड़ती थी। यूनेस्को के मुताबिक यह जलधारा महल के विभिन्न मंडपों से होकर गुजरती थी और पूरे परिसर की योजना में पानी की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
कहा जा सकता है कि लाल किला केवल सत्ता का किला नहीं था, बल्कि मुगल शाही कल्पना में धरती पर स्वर्ग की तरह रचा गया महल था। अपने चरम समय में इसके दरबारी परिसर में करीब 3,000 लोगों की गतिविधियां समाहित होती थीं। यानी आज की शांत और नियंत्रित विरासत-स्थली कभी हजारों लोगों से आबाद शाही दुनिया थी।
लाल किले की कहानी सिर्फ मुगल वैभव की कहानी नहीं है। 1857 के विद्रोह ने इसके इतिहास की दिशा बदल दी। बहादुर शाह जफर के समय दिल्ली 1857 के विद्रोह का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनी। भारत सरकार के 'डिक्शनरी ऑफ मार्टियर्स' में दर्ज विवरण के मुताबिक बहादुर शाह जफर को विद्रोह के दौरान प्रतीकात्मक रूप से नेतृत्वकारी भूमिका मिली और ब्रिटिश सेना ने दिल्ली पर दोबारा कब्जे के बाद उन्हें गिरफ्तार किया। बाद में उन पर सैन्य आयोग के सामने मुकदमा चला और उन्हें निर्वासित कर दिया गया।
इसके बाद अंग्रेजों ने लाल किले को सैन्य उपयोग के लिए बदल दिया। यूनेस्को के दस्तावेजों में जानकारी मिलती है कि 1857 के बाद किले की कई संरचनाएं गिरा दी गईं, उनकी जगह औपनिवेशिक शैली की सैन्य इमारतें बनाई गईं और मुगल बागों के स्वरूप में भी बदलाव किया गया। यानी जिस किले में कभी मुगल दरबार लगता था, उसी परिसर का एक बड़ा हिस्सा अंग्रेजी सैन्य व्यवस्था का हिस्सा बन गया।
लाल किले का अगला बड़ा अध्याय स्वतंत्रता आंदोलन और आजाद भारत से जुड़ा है। 1945-46 के आईएनए मुकदमों ने लाल किले को स्वतंत्रता संघर्ष की राजनीतिक स्मृति से भी जोड़ दिया। इसके बाद यही किला आजाद भारत की राष्ट्रीय कल्पना में एक नए अर्थ के साथ उभरा। यहां एक बेहद रोचक ऐतिहासिक तथ्य सामने आता है कि, आम तौर पर 15 अगस्त 1947 को लाल किले पर जवाहरलाल नेहरू के तिरंगा फहराने की तस्वीर और कहानी लोगों की स्मृति में दर्ज है।
लेकिन नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी के संग्रह में उपलब्ध तस्वीर को 16 अगस्त 1947 के रूप में दर्ज किया गया है। नेहरू आर्काइव में भी लाल किले से नेहरू के 'द ऑनर ऑफ द फ्लैग' भाषण की तारीख 16 अगस्त 1947 दी गई है। दूसरी ओर, 15 अगस्त 1947 को नेहरू द्वारा तिरंगा फहराए जाने का स्थान प्रिंसेस पार्क, इंडिया गेट के पास बताए जाने वाले ऐतिहासिक रिकॉर्ड भी मौजूद हैं। यानी आज की 15 अगस्त-लाल किला परंपरा के पीछे इतिहास का एक दिलचस्प दस्तावेजी अंतर छिपा है।
बाद के वर्षों में लाल किला स्वतंत्रता दिवस का स्थायी राष्ट्रीय मंच बन गया। भारत सरकार के अभिलेख भी लाल किले से प्रधानमंत्री द्वारा स्वतंत्रता दिवस पर ध्वजारोहण की परंपरा को रेखांकित करते हैं।
यही लाल किले की सबसे बड़ी ऐतिहासिक खूबी है। यूनेस्को ने भी लाल किले को केवल वास्तुकला की दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं माना है। उसके अनुसार यह किला शाहजहां के समय से सत्ता का प्रतीक रहा, उसने ब्रिटिश शासन में बदलाव देखा और भारतीय स्वतंत्रता के उत्सव का स्थल बना। आज भी स्वतंत्रता दिवस के राष्ट्रीय समारोह का केंद्र है। इससे स्पष्ट है कि लाल किला भारत के राजनीतिक इतिहास की एक तरह की समयरेखा बन जाता है
इसीलिए यह कहना तो बनता है कि लाल किला महज एक इमारत भर नहीं है, बल्कि लाल किले को समझना यानी भारत के बदलते इतिहास को समझना इतिहास का गवाह यह किला आजादी के बाद प्रधानमंत्री के राष्ट्र को संबोधित करने का मंच है। अब 15 अगस्त 2026 को जब इसकी प्राचीर से पहली बार स्वतंत्रता दिवस समारोह में वंदे मातरम् गूंजेगा, तो यह आवाज सिर्फ एक गीत की आवाज नहीं होगी।
यह उस लंबे इतिहास की गूंज होगी, जिसमें एक ही किले ने बादशाही वैभव, अंग्रेजी सत्ता, आजादी का सपना और लोकतांत्रिक भारत का सफर देखा है। हां यही वजह है कि लाल किले की दीवारें आज भी इतिहास सुनाती हैं। 15 अगस्त को याद दिलाती है कि सत्ता बदलती है और शासक भी लेकिन इतिहास अपने निशां छोड़ जाता है पीढ़ियों को अपना अस्तित्व समझाने के लिए।
Updated on:
14 Aug 2026 09:43 am
Published on:
14 Aug 2026 09:43 am
